इक्कीसवीं शताब्दी में प्रवेश करते हुए “हम कहाँ जा रहे हैं” का प्रश्न हमारे सामने पहले से कहीं बड़ा होकर आता है। क्योंकि हम उथल-पुथल के युग में जी रहे हैं। पश्चिम के विश्व-प्रभुत्व का युग ढल रहा है। साथ ही जलवायु परिवर्तन हमारे पारिस्थितिकी-तंत्र के लिए ख़तरा बन रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) क्रांति हमें ऐसी स्थिति में धकेल रही है जिसमें यह आँकना कठिन है कि भविष्य कैसे बदलेगा।
औद्योगिक क्रांति और व्यापार के वैश्वीकरण नामक नए प्रतिमान के आगमन ने मानव-जीवन को सुविधाजनक बनाया और भविष्य के लिए बहुत सी संभावनाएँ खोलीं। साथ ही मानवता उस लोभ के मार्ग पर चल पड़ी जिसे औद्योगिक क्रांति और व्यापार के प्रसार ने भड़काया। अतीत में हम यह आशावादी अनुमान रखते थे कि पूरा संसार साथ मिलकर विकसित हो सकता है: तरह-तरह के भविष्य का वचन देने वाला बीसवीं शताब्दी का विचारधाराओं का युग इसी का रूप था। पर अब हमें न केवल वह आशावादी अनुमान त्यागना पड़ रहा है, बल्कि हम ऐसी स्थिति में आ पहुँचे हैं जहाँ मनुष्य के लोभ के कारण मानवता के भविष्य की चिंता करनी पड़ रही है।
औद्योगिक क्रांति से पहले मनुष्य की आर्थिक गतिविधि इस बड़ी मान्यता के तहत चलती थी कि मनुष्य प्रकृति को हानि नहीं पहुँचा सकता। इसी सीमा के भीतर पूर्व और पश्चिम का राजनीतिक-आर्थिक चिंतन दो भिन्न प्रतिरूपों में, अपनी-अपनी शक्तियों और दुर्बलताओं के साथ, विकसित हुआ। पर औद्योगिक क्रांति के दो सौ वर्ष बाद आज हम, अनजाने में ही, पहली बार उन समस्याओं से सीधे टकरा रहे हैं जो औद्योगिक क्रांति मनुष्य के लिए लाई। वैश्विक समस्याओं के अचानक उभरने के साथ मनुष्य ऐसी स्थिति में पहुँच गया है जहाँ वह उनके उचित उपाय नहीं जुटा पा रहा।
औद्योगिक क्रांति से पहले व्यापार परस्पर लाभ के लिए वस्तुओं के आदान-प्रदान तक सीमित था। पर औद्योगिक क्रांति के बाद उन्नत प्रौद्योगिकी और विज्ञान के उपयोग के साथ मनुष्य और प्रकृति, तथा राष्ट्रों के बीच के संबंध क्रांतिकारी रूप से बदल गए। सबसे पहले, मनुष्य पृथ्वी के संसाधनों का बड़े पैमाने पर उपयोग करके उन्हें तेज़ी से अस्थायी अवस्था की ओर धकेल रहा है। यहाँ वह लोभ काम कर रहा है जो केवल मनुष्य में है और किसी अन्य पशु में नहीं। राष्ट्रों के स्तर पर संसाधन और वस्तुएँ परस्पर लाभकारी आदान-प्रदान से आगे बढ़कर लोभ का विषय बनने वाले संबंध में पहुँच गई हैं। विकसित और विकासशील देशों के बीच अमीर-गरीब की बढ़ती खाई, वैश्विक तापवृद्धि, और उससे उपजने वाली महामारियाँ, इन सबकी पृष्ठभूमि में वही लोभ है जो केवल मनुष्य में है। औद्योगिक क्रांति के बाद विशाल पूँजी और उसे सहारा देने वाली राष्ट्रीय शक्ति के मिलकर संसार भर में फैलने से निर्मम लाभ-खोज संभव हो गई।
जलवायु परिवर्तन मनुष्य द्वारा उत्पन्न समस्या है, जो मनुष्य के जीने के ढंग पर, और उससे आगे उसके जीवित रह पाने की संभावना पर, सीधा प्रभाव डाल रहा है। मनुष्य प्रकृति का अंश है। पृथ्वी पर रहने वाली हर पीढ़ी को पर्यावरण की भली-भाँति रक्षा करके उसे अगली पीढ़ी को सौंपना चाहिए। पर वर्तमान पीढ़ी इस भूमिका में पूरी तरह विफल हो रही है। वह अपनी संतानों को ऐसी स्थिति सौंप रही है जिसमें विशाल जलवायु परिवर्तन की क्षति अब दैनिक बात बन चुकी है। वह प्रकृति का “शोषण” करने के ढंग से अपने स्वार्थ को चला रही है, और उस पर नियंत्रण नहीं कर पा रही। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से उस पश्चिमी सभ्यता में प्रबल है जिसने प्रकृति को “विजय और प्रबंधन की वस्तु” माना। प्रकाशित धर्मों का प्रकृति-विजय का सिद्धांत देकार्त के इस विचार में जारी रहता है कि हमें “प्रकृति के स्वामी और अधिपति” बनना चाहिए। मनुष्य और प्रकृति के इस संबंध में पूर्वी चिंतन दूसरी दिशा लेता है। पूर्व मनुष्य को प्रकृति का अंश समझता है और मनुष्य तथा प्रकृति के सामंजस्य और परस्पर फलने-फूलने पर बल देता है।
पूर्व की भूमिका का महत्त्वपूर्ण हो जाना एक-दो शताब्दियों में अचानक हुई घटना नहीं। इसका संबंध पूर्वी सभ्यता से है। पूर्व ने पश्चिम से लगभग दो हज़ार वर्ष पहले ही राष्ट्र-राज्य बना लिए थे। (निस्संदेह, चूँकि पूर्व ने पश्चिमी लोकतंत्र से नेताओं के शांतिपूर्ण परिवर्तन की संस्था सीखी है, इसलिए राष्ट्र-राज्य और लोकतांत्रिक राज्य में भेद करना आवश्यक है।) राष्ट्र-राज्य के गठन में अनिवार्य रूप से मिनबेन (民本主義, जनता के लिए शासन) की राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था जन्म लेती और विकसित होती है। पश्चिम ने 1648 की वेस्टफ़ेलिया संधियों के बाद ही राष्ट्र-राज्य बनाना आरंभ किया। पश्चिम को देखें, तो यूनान और रोम विजेता राज्यों की शासन-व्यवस्थाएँ थे, और मध्य युग के हज़ार वर्ष प्रकाशित धर्म की व्यवस्था में बीते। प्रबोधन-काल में ही पश्चिम की आँखें पूर्वी चिंतन के प्रति खुलीं। उस समय पश्चिमी विचारक पूर्व के “प्रकृति-दर्शन” पर मुग्ध हो गए। राजनीतिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र में पश्चिम ने दाओवाद के अकर्म (वू वेई, 無爲) के विचार से गहरा प्रभाव ग्रहण करके अहस्तक्षेप (लेसे-फ़ेयर, laissez-faire) की नीति स्थापित की। इसमें फ़्रांस के प्रकृतितंत्रवादियों (फ़िज़ियोक्रेट्स) का बड़ा प्रभाव था।
इस प्रक्रिया में पूर्व और पश्चिम की राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्थाओं ने भिन्न रूप ले लिए। पूर्व ने अकर्म का विचार सामने रखा, जो इस सिद्धांत के तहत व्यक्ति की स्वायत्तता का प्रबंधन करता है कि निजी हित और लोकहित टकराते हैं। पश्चिम ने राज्य के हस्तक्षेप से बचते हुए व्यक्ति की स्वायत्तता को उसके हाल पर छोड़ दिया। एडम स्मिथ का “अदृश्य हाथ” (invisible hand) का सिद्धांत इसका प्रतिनिधि बना: यह सिद्धांत कि लोकहित और निजी हित अभिसरित होते हैं। पूर्व का राजनीतिक अर्थशास्त्र अदृश्य हाथ नहीं, बल्कि इस बात को आगे रखता है कि “हड़पने वाले हाथ” का प्रबंधन कैसे करके व्यक्ति की स्वायत्तता सुनिश्चित की जाए। यही अकर्म के विचार का सार है।
पूर्व और पश्चिम की राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्थाओं के बीच की इस खाई ने धीरे-धीरे अपने परिणाम दिखाए। पश्चिम में अमीर-गरीब की खाई दिन-ब-दिन बढ़ने से समाज का ध्रुवीकरण हो रहा है। यह पश्चिमी राजनीति और अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी बाधा बनता जा रहा है। कुछ लोगों का अनुमान है कि ध्रुवीकरण का बढ़ना अंततः उस उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमज़ोर कर देगा जिसका पश्चिम पक्षधर है।
राष्ट्रों की होड़ में विजेता के सब कुछ ले जाने वाली लोभ-खोज विशेष रूप से पश्चिम की विश्व-विजय के युग में चर्चा के केंद्र में रही। समय की दृष्टि से औद्योगिक क्रांति के साथ मेल खाने के कारण पश्चिम संसार पर प्रभुत्व जमाने लगा। पिछली कुछ शताब्दियाँ पश्चिम के विश्व-प्रभुत्व के रूप में बीतीं। पर अब इक्कीसवीं शताब्दी में संसार एक नए चरण में प्रवेश कर गया है। पश्चिम की विश्व-विजय के बीच पूर्व के उदय ने संसार को एक नए चरण में ला खड़ा किया है। औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप व्यापार के संसार भर में फैलने से जलवायु परिवर्तन हुआ। साथ ही व्यापार का विस्तार संसार भर के मानवीय और भौतिक संसाधनों की लोभ-खोज तक पहुँचा, और अब एआई क्रांति के युग में प्रवेश कर रहा है।
औद्योगिक क्रांति से आरंभ हुआ पश्चिम का विश्व-प्रभुत्व इक्कीसवीं शताब्दी में प्रवेश करते हुए बहुत कमज़ोर पड़ रहा है। आगे का संसार कैसा होगा? आगे के संसार की तस्वीर बनाने में पूर्व का उदय बड़ी भूमिका निभाता है। पश्चिम के विश्व-प्रभुत्व को संभव बनाने वाली औद्योगिक क्रांति पश्चिम की अपनी विशिष्ट संपत्ति थी। पर अब उभर रही एआई क्रांति की कल्पना चीन, कोरिया, जापान आदि पूर्वी देशों के प्रभाव के बिना करना कठिन है। यदि औद्योगिक क्रांति “मांसपेशियों की क्रांति” थी, तो एआई क्रांति “मन की क्रांति” है। तरह-तरह के परिणाम और व्याख्याएँ संभव हैं, पर दोनों क्रांतियों से होकर गुज़रने वाली एक परिघटना है: उत्पादकता में वृद्धि के साथ-साथ अमीर-गरीब की खाई का गहराना, यानी समाज का ध्रुवीकरण। दोधारी तलवार से उपमित एआई क्रांति का सामना हम कैसे करेंगे?