तीसरा भाग हम कहाँ जा रहे हैं? · अध्याय 4

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) क्रांति हमें कहाँ ले जा रही है: ध्रुवीकरण बनाम शूज़ी (術治)

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1) दोधारी तलवार, एआई क्रांति: उत्पादकता में वृद्धि और ध्रुवीकरण का विस्तार

हम आज एआई क्रांति के बीच में हैं। कुछ स्थितियों को व्यवस्थित करते हुए हमें मनुष्य के सामने आई मूलभूत समस्या का स्वरूप समझना होगा। सबसे अधिक चर्चित प्रश्न ये परिदृश्य हैं कि एआई मनुष्य का स्थान ले लेगी, या एआई पर नियंत्रण रखने वाले मनुष्य दूसरे मनुष्यों पर प्रभुत्व जमाएँगे। इन प्रश्नों के संबंध में जिस पर अवश्य विचार करना होगा, वह मानव-स्वभाव है। होमो सेपियंस के रूप में हमारे पास जो मानव-स्वभाव है, उसके विश्लेषण से ही इन प्रश्नों तक पहुँचा जा सकता है।

मानव-स्वभाव की चर्चा में हमें पश्चिम के आधुनिक दर्शन के पिता कहे जाने वाले देकार्त (1596-1650) के चिंतन पर दृष्टि डालनी होगी। अपने चिंतन के चरम पर उन्होंने दो कृतियाँ प्रकाशित कीं: विधि पर विमर्श (Discours de la méthode, 1637) और दर्शन के सिद्धांत (Principia Philosophiae, 1644)। इनमें उन्होंने “मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ” की प्रस्थापना के द्वारा मनुष्य के मन को हर चिंतन का निश्चित आरंभ-बिंदु बनाया। उन्होंने इस पर बल दिया कि प्रकृति को गणितीय और यांत्रिक नियमों से समझाया जा सकता है, और मनुष्य बुद्धि के द्वारा प्रकृति पर प्रभुत्व जमा सकता है। उन्होंने भौतिक संसार को मन से भिन्न, विस्तार (延長) को गुण के रूप में रखने वाली सत्ता (res extensa) के रूप में परिभाषित किया, और प्रकृति को यांत्रिक नियमों के अनुसार चलने वाली वस्तु के रूप में समझाया। उनका मानना था कि ईश्वर की पूर्णता के अनुरूप ढला मनुष्य का मन प्रकृति को समझने और नियंत्रित करने की क्षमता रखता है। इस प्रकार उन्होंने अपनी प्रकृति-दृष्टि के केंद्र के रूप में यांत्रिक विश्व-दृष्टि प्रस्तुत की। उन्होंने समझाया कि प्रकृति एक जटिल मशीन जैसी है, और यदि उसके सिद्धांत ज्ञात हों, तो उसे चलाया और नियंत्रित किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त उन्होंने मानवकेंद्रवाद (人間主義, anthropocentrism) में यह व्याख्या की कि मनुष्य की बुद्धि में ईश्वर की व्यवस्था का अनुकरण करने की शक्ति है, और इसलिए उसे प्रकृति पर प्रभुत्व का अधिकार है।

इस प्रकार देकार्त ने आधुनिक विज्ञान के विकास में बड़ा सकारात्मक योगदान दिया, और साथ ही विचारधाराओं के युग के मानवकेंद्रवाद को खोलने में नकारात्मक योगदान भी दिया। यहाँ हमें ध्यान देना होगा कि देकार्त के मानव-स्वभाव के विश्लेषण ने “बुद्धिवाद” के रूप में पश्चिम के आधुनिक दर्शन का नेतृत्व कैसे किया। लगता है उनके बुद्धिवाद ने स्पिनोज़ा या डेविड ह्यूम जैसे उसके विरोधी विचारकों के महत्त्व के बावजूद पश्चिम में उन्हें पछाड़ दिया। पर जब विचारधाराओं के युग में मानवकेंद्रवाद ने मानव-समाज को विनाश के कगार तक पहुँचा दिया, तो मन-केंद्रित पश्चिमी चिंतन-व्यवस्था को गंभीर चुनौती मिली। इन उतार-चढ़ावों के बावजूद देकार्त का बुद्धिवाद आज भी पश्चिमी लोगों के मन में गहराई से बसा है। उस पर टिके लोग आज भी यह सोचते रहते हैं कि मनुष्य की शक्ति से प्रकृति, या मानव-स्वभाव, को नए सिरे से गढ़ा जा सकता है।

एआई क्रांति मानवता के मानसिक कार्यों से जुड़ा प्रश्न है। औद्योगिक क्रांति “मांसपेशियों की क्रांति” है, और एआई क्रांति “मन की क्रांति”। औद्योगिक क्रांति वह घटना थी जिसमें मशीनों ने मनुष्य के शारीरिक श्रम का स्थान लेकर उत्पादक शक्ति को विस्फोटक रूप से बढ़ाया। भाप का इंजन, बिजली और बड़े पैमाने के उत्पादन की व्यवस्थाएँ मनुष्य की “मांसपेशियों” के स्थान पर उद्योग चलाने लगीं। होमो सेपियंस के उदय से मानवता जिन मनुष्यों और पशुओं की मांसपेशियों पर टिकी थी, उनका स्थान उद्योग की शक्ति ने ले लिया। इसके विपरीत एआई क्रांति “मन की क्रांति” है। मनुष्य की बौद्धिक और संज्ञानात्मक गतिविधि में सहायता करके या उसका स्थान लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक नए आयाम का नवाचार रच रही है। एआई क्रांति वह धारा है जो मनुष्य की अपनी विशिष्ट मानसिक क्षमताओं को बढ़ाते हुए समाज, अर्थव्यवस्था और संस्कृति को समग्र रूप से मूलतः बदल रही है। यह डेटा और कंप्यूटिंग के आधारभूत ढाँचे, स्वायत्त निर्णय-प्रक्रिया, भौतिक संसार के साथ एकीकरण, और मनुष्य की जीवन-शैली में परिवर्तन लाती है। एआई क्रांति को कैसे देखा जाए?

एआई कितनी भी विकसित हो जाए, वह उसे रचने वाले मानव-स्वभाव के भीतर ही चलेगी। होमो सेपियंस के सामने आने वाला ख़तरा उस एआई में नहीं जो मनुष्य का स्थान ले ले, यानी मानव-स्वभाव को नए सिरे से गढ़ दे। यदि एआई मानव-स्वभाव का पुनर्गठन कर सके, तो होमो सेपियंस का इतिहास वहीं समाप्त है। होमो सेपियंस द्वारा अब तक संचित सारे धर्म, नैतिकताएँ, विकासवाद, विज्ञान और दार्शनिक व्यवस्थाएँ निरर्थक हो जाएँगी। यह होमो सेपियंस का नहीं, किसी नई प्रकार की मानव-जाति का नया इतिहास होगा। मानव-स्वभाव के साथ होमो सेपियंस के सारे अस्तित्व और चिंतन का लुप्त होना होमो सेपियंस की मृत्यु के समान होगा। होमो सेपियंस के रूप में हमें कन्फ़्यूशियस और स्पिनोज़ा के दर्शन को याद करना चाहिए: “मृत्यु के बारे में सोचने की आवश्यकता नहीं। हमारी प्रज्ञा मृत्यु पर नहीं, जीवन पर चिंतन से आती है।” इसलिए एआई के मनुष्य का स्थान लेने की परिकल्पना को दर्शन के क्षेत्र को नहीं, विज्ञान-कथा के क्षेत्र को सौंप देना चाहिए।

यह परिदृश्य भी कि एआई क्रांति पर नियंत्रण रखने वाले मनुष्य दूसरे मनुष्यों पर प्रभुत्व जमाएँगे, मानव-स्वभाव को केंद्र में रखकर ही विश्लेषित करना होगा। एआई विकसित हो जाए, तब भी वह मानव-स्वभाव नामक व्यवस्था के भीतर ही चलेगी। प्रबल स्वार्थ और दुर्बल परोपकार, और उनका प्रबंधन करना चाहने वाली नैतिकता और क़ानून, यह व्यवस्था एआई क्रांति पर भी शासन करती रहेगी। आज तक किसी प्रकाशित धर्म, किसी तत्त्वमीमांसीय तर्क या किसी विचारधारा ने मानव-स्वभाव नामक प्राकृतिक नियम से बाहर निकलकर मानव-जगत पर शासन नहीं किया। एआई भी इसी व्यवस्था के भीतर रहेगी। इसलिए एआई के द्वारा मनुष्यों के दूसरे मनुष्यों पर पूर्ण प्रभुत्व की संभावना को भी दर्शन के क्षेत्र में नहीं, विज्ञान-कथा के क्षेत्र में छोड़ देना ही अच्छा है।

इन संभावनाओं से अधिक, एआई क्रांति जो समस्याएँ लाएगी, वे ऐसी हो सकती हैं जिनका हमने पूर्वानुमान नहीं किया। औद्योगिक क्रांति ऐसा जलवायु परिवर्तन लाई जिसकी किसी ने अपेक्षा नहीं की थी, और वह हमारे जीवन पर व्यापक प्रभाव डाल रहा है। औद्योगिक क्रांति जलवायु परिवर्तन का दूरवर्ती कारण (遠因) है। औद्योगिक क्रांति न होती, तो जलवायु परिवर्तन भी न होता। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटेन में आरंभ हुई औद्योगिक क्रांति ने कोयले और तेल जैसे जीवाश्म ईंधनों का उपयोग विस्फोटक रूप से बढ़ाया, जिससे वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता तेज़ी से बढ़ी और वह वैश्विक तापवृद्धि और जलवायु-संकट का संरचनात्मक आरंभ-बिंदु बनी। पर किसी मनुष्य ने इसकी योजना नहीं बनाई थी, न इसका उपयोग दूसरों पर प्रभुत्व के लिए किया। केवल जलवायु परिवर्तन से मानवता के पूरी तरह विलुप्त होने की संभावना कम है, पर उससे सभ्यता के ढहने और बड़े पैमाने पर जनसंख्या घटने का ख़तरा पूरी तरह विद्यमान है। जीवन की परिस्थितियाँ बिगड़ने से समुद्र-स्तर के बढ़ने, लू, सूखे और बाढ़ के कारण रहने योग्य क्षेत्र घटते जाते हैं। साथ ही कृषि-उत्पादकता में गिरावट और जल की कमी से बड़े पैमाने पर अकाल की संभावना बढ़ती है। साथ ही जलवायु परिवर्तन के कारण संक्रामक रोगों के वाहकों के फैलने से कभी भी महामारी फूट सकती है।

आइए जलवायु परिवर्तन तक मानव-स्वभाव से पहुँचें। जलवायु परिवर्तन इस विफलता से उपजा है कि मनुष्य उस मानव-स्वभाव को नियंत्रित नहीं कर सका जिसमें मनुष्य का लोभ अपनी संपत्ति को अंतहीन रूप से बढ़ाना चाहता है। यदि मनुष्य में ऐसी क्षमता होती, तो पूरे संसार के औद्योगीकरण और व्यापार से ढककर प्रकृति की लूट की प्रक्रिया तक पहुँचने से पहले ही मानव-समाज इसका प्रबंधन कर लेता। औद्योगिक क्रांति के साथ मनुष्य की इच्छा और स्वार्थ पूँजी और प्रौद्योगिकी से कई गुना बढ़कर इस भ्रम को जन्म दे बैठे कि प्रकृति का असीमित शोषण किया जा सकता है, और अंततः जलवायु परिवर्तन नामक परिणाम तक पहुँचे। पिछले कुछ दशकों में जलवायु परिवर्तन के बारे में बार-बार की चेतावनियों और वास्तव में हम पर आ पड़ी समस्याओं के बावजूद मानवता भावी पीढ़ियों के जीवित रहने की संभावना सुनिश्चित करने के अपने उत्तरदायित्व से मुँह मोड़ रही है।

एआई क्रांति के साथ मानव-स्वभाव फिर से प्रबल रूप में प्रकट होने का मंच बन रहा है। बात यह है कि औद्योगिक क्रांति और एआई क्रांति मानव-स्वभाव को दिखाने वाले दर्पण और उसे बढ़ाने वाले प्रवर्धक हैं। औद्योगिक क्रांति मनुष्य के लिए बहुत से लाभ लाई। उसी तरह एआई क्रांति भी मनुष्य के लिए बहुत से लाभ लाएगी। पर साथ ही, जैसे औद्योगिक क्रांति ने मनुष्य के लोभ को इतना बढ़ा दिया कि वह उसे स्वयं नियंत्रित नहीं कर सका, वैसे ही समस्या यह है कि एआई क्रांति धन के प्रति मनुष्य के मोह और सत्ता की भूख को और भी बड़े और नग्न रूप में दिखाएगी। क्या एआई क्रांति मनुष्य को अधिक स्वतंत्र बनाएगी, या अधिक पराधीन?

औद्योगिक क्रांति के समय हमने लुडाइट आंदोलन (Luddite movement, 1811-1816) देखा। लुडाइट वे वस्त्र-उद्योग के श्रमिक थे जो “लुड” नामक एक व्यक्ति के अनुयायी थे, वास्तविक हो या न हो, जिसने कथित रूप से करघे तोड़ने आरंभ किए। यह आंदोलन औद्योगिक क्रांति के आरंभ में अंग्रेज़ श्रमिकों का मशीन-तोड़ आंदोलन था। साधारण दंगे से आगे, यह श्रमिक वर्ग का जीने के अधिकार का संघर्ष था। लुडाइट आंदोलन में भाग लेने वाले वे लोग थे जिनकी पहली चिंता बेरोज़गारी और बढ़ती निर्धनता, यानी समाज का ध्रुवीकरण, थी। माना जाता है कि उन्होंने बाद के श्रमिक-संघ और लोकतांत्रिक आंदोलनों की ज़मीन तैयार की। साथ ही नकारात्मक पक्ष भी बढ़ता रहा। श्रमिक-संघ और लोकतांत्रिक आंदोलनों के बावजूद औद्योगिक क्रांति के बाद अमीर-गरीब की खाई की समस्या वास्तव में और गहरी हुई। मानव-स्वभाव में अंतर्निहित लोभ और ध्रुवीकरण उतने ही फैल गए।

औद्योगिक क्रांति और एआई क्रांति किस दिशा में जाएँगी, यह मनुष्य के मानसिक संकल्पों या तत्त्वमीमांसीय खोजों से नहीं, अंततः मानव-स्वभाव से तय होता है। एआई क्रांति किस दिशा में जाएगी, इसे अतीत का यह उदाहरण भली-भाँति दिखाता है कि औद्योगिक क्रांति के द्वारा मानव-स्वभाव ने कैसे काम किया। एआई क्रांति जो तरह-तरह की प्रगति लाएगी, उसे सकारात्मक रूप से देखना और उसका आनंद लेना चाहिए। विरोधी स्वर भी उठते हैं: “सारी एआई को उड़ा दो और पुराने दिनों में लौट चलो।” यह औद्योगिक क्रांति के समय उभरे लुडाइट आंदोलन जैसा ही है। पर जैसे हम औद्योगिक क्रांति की उपेक्षा नहीं कर सकते थे, वैसे ही एआई की उपेक्षा नहीं कर सकते। यह भविष्य की प्रबल धारा है, इसलिए पीछे नहीं छूटना चाहिए। पर अमीर-गरीब की बढ़ती खाई, यानी मध्यवर्ग के सिकुड़ने, से राष्ट्रों के भीतर और उनके बीच उत्पन्न होने वाली अस्थिरता का प्रबंधन कैसे किया जाए?

औद्योगिक क्रांति और एआई क्रांति: ध्रुवीकरण लोकहित की उपेक्षा करने वाली निजी हित की खोज से उपजता है

ध्रुवीकरण इसलिए उपजता है कि लोकहित की उपेक्षा करके निजी हित की खोज को उचित ठहराया जाता है: यही निजी हित और लोकहित के अभिसरण का सिद्धांत है। यह वह सिद्धांत है जिसके अनुसार बड़ी कंपनियाँ निजी हित साधें, तब भी उनका निजी हित अंततः लोकहित के रूप में लौटकर सबके लिए लाभदायक होता है। पर औद्योगिक क्रांति और एआई क्रांति जो दिखाती हैं, वह इस परिकल्पना के विपरीत स्थिति है। वे दिखाती हैं कि धनी और धनी, निर्धन और निर्धन होते जा रहे हैं, और मध्यवर्ग कमज़ोर हो रहा है। अंततः ध्रुवीकरण का सार उस राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में है जो लोकहित का उल्लंघन करके निजी हित की खोज की अनुमति देती है।

आइए ध्रुवीकरण के सार की पड़ताल करें। औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप पूँजीपति वर्ग बना। ये भाप के इंजन, करघे, रेलवे जैसे नए उद्योगों में निवेश करने वाले उद्यमी और कारख़ाना-मालिक थे, जिन्होंने अपार धन जमा किया। वस्त्र, इस्पात और रेलवे के उद्योगपति औद्योगिक क्रांति के बाद “नए धनी” बनकर उभरे। पहले अभिजात और ज़मींदार समाज का उच्च वर्ग थे; औद्योगिक क्रांति के बाद “औद्योगिक पूँजीपति” (industrial capitalist) नए उच्च वर्ग के रूप में स्थापित हुए। औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप करोड़पति सामने आए, और समाज का ध्रुवीकरण और जलवायु परिवर्तन हुए।

औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप “मिलियनेयर” (Millionaire, दस लाख डॉलर वाले) जन्मे। औद्योगिक क्रांति के बाद राष्ट्रों के बीच का प्रतिमान लूट से व्यापार में बदलने के साथ मिलियनेयर से हज़ार गुनी संपत्ति वाले “बिलियनेयर” (Billionaire, एक अरब डॉलर या उससे अधिक के स्वामी) बढ़ रहे हैं। फिर एआई क्रांति के साथ सौ अरब डॉलर या उससे अधिक के स्वामी, “सेंटीबिलियनेयर” (Centibillionaire), सामने आते हैं। सेंटीबिलियनेयर कितने हैं? संसार में सोलह गिने जाते हैं, और सब पश्चिमी हैं। यह उस राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में उपजता है जिसमें कहा जाता है कि निजी हित और लोकहित अभिसरित होते हैं।

अंतरराष्ट्रीय सहायता और विकास संगठन ऑक्सफ़ैम (Oxfam) और विश्व असमानता प्रयोगशाला (WIL) के हाल के प्रतिवेदनों के अनुसार, सबसे धनी लगभग दस लोगों की संपत्ति संसार की निचली आधी आबादी (लगभग चार अरब लोग) की संपत्ति से अधिक है। यह दिखाता है कि वैश्विक असमानता ऐतिहासिक शिखर पर पहुँच गई है। असमानता का यह अनुपात हर वर्ष तेज़ हो रहा है। और अंतर और बढ़ता जा रहा है। ध्रुवीकरण ऐसी अवस्था में पहुँच रहा है जहाँ वह और नहीं बढ़ सकता। मानव-स्वभाव में अंतर्निहित लोभ और प्रभुत्व-भाव निरंतर फैलते जा रहे हैं।

वे भविष्य की पूँजी चलाने वाले “एआई पूँजीपति” (AI capitalist) बन जाते हैं। एआई क्रांति से सबसे अधिक लाभ पाने वाले उद्योगों में अर्धचालक, डेटा-केंद्रों का निर्माण, बिजली-उपकरण और बैटरी-सामग्री हैं। इन एआई पूँजीपतियों के सामने वस्त्र, इस्पात और रेलवे के उद्योगपति जैसे औद्योगिक पूँजीपति अपनी शक्ति खो देते हैं। एआई पूँजीपति डेटा पर एकाधिकार कर लेते हैं। यदि औद्योगिक क्रांति में भूमि और मशीनें पूँजी का केंद्र थीं, तो आज डेटा और एल्गोरिद्म पूँजी का केंद्र हैं। उनके पास प्लेटफ़ॉर्मों का प्रभुत्व आ जाता है, क्योंकि वैश्विक प्लेटफ़ॉर्म कंपनियाँ एआई प्रौद्योगिकी से बाज़ारों पर क़ब्ज़ा कर लेती हैं। सबसे बढ़कर, वे धन के केंद्रीकरण को सुदृढ़ करते हैं। मुट्ठी भर उद्यमी और निवेशक खगोलीय परिमाण की संपत्ति जमा करके सामाजिक ध्रुवीकरण को गहरा करते हैं। उनकी संपदा की शक्ति इतनी खगोलीय है कि वे राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव पर क़ब्ज़ा कर लेते हैं। एआई पूँजीपति केवल आर्थिक सत्ताधारी नहीं, बल्कि नीति, नैतिकता और संस्कृति तक को दिशा देने वाले नए शासक वर्ग के रूप में उभरते हैं।

बिलियनेयरों के पीछे बेरोज़गारी और बढ़ती निर्धनता घात लगाए बैठी हैं। स्वयं प्रौद्योगिकी से अधिक, वितरण के अन्याय और सामाजिक सुरक्षा-जाल की कमी के विरुद्ध आक्रोश सामाजिक समस्याओं का केंद्र बन जाता है। समस्या यह संभावना बन जाती है कि एआई का उपयोग करने वाली कंपनियाँ, सरकारें और सत्ता-समूह निजी हित के लिए एआई को समाज पर प्रभुत्व के साधन के रूप में इस्तेमाल करें। सबसे अधिक सेंटीबिलियनेयरों वाले अमेरिका में ऐसे लोग भी हैं जो इसे सबसे बड़ी समस्या मानकर इसे सुधारना चाहते हैं। जब कोई समाज या राज्य ढहता है, तो बड़ी कंपनियाँ भी अंततः उसके साथ ढह जाती हैं। ये वे लोग हैं जिनके पास इस “संबंधवाद” के यथार्थ को देखने की व्यापक दृष्टि है।

वॉरेन बफ़ेट के प्रयास इसका अच्छा उदाहरण हैं। बफ़ेट वह व्यक्ति हैं जिन्होंने “धनियों के लिए कर-कटौती” का विरोध किया और उलटे धनियों पर कर बढ़ाने का ज़ोरदार समर्थन किया। इस यथार्थ की आलोचना करते हुए कि उनके कर्मचारी उनसे ऊँची दर पर कर देते हैं, उन्होंने बल दिया कि अत्यधिक आय वालों को अधिक कर देना चाहिए। 2011 में न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित अपने लेख “स्टॉप कॉडलिंग द सुपर-रिच” (Stop Coddling the Super-Rich, अति-धनियों को दुलारना बंद करो) में उन्होंने अमेरिका के बजट-घाटे को सुलझाने के लिए धनियों पर कर बढ़ाने की माँग की। उन्होंने रेखांकित किया कि उनके द्वारा दी गई आयकर-दर (17.4%) उनके कार्यालय-कर्मचारियों की दर (33-41%) से कम थी। उन्होंने इस तथ्य की आलोचना की कि सबसे धनी 400 करदाताओं की औसत कर-दर 1992 के 29.2% से गिरकर 2008 में 21.5% रह गई। उन्होंने अपने लेख में यह विचार भी जोड़ा कि “ऊँची कर-दरें निवेश और रोज़गार-सृजन को नहीं रोकतीं”।

उनका तर्क ओबामा प्रशासन के समय “बफ़ेट नियम” (Buffett Rule) नामक नीति-प्रस्ताव तक पहुँचा: यह सिद्धांत कि सालाना दस लाख डॉलर या उससे अधिक आय वाले अति-उच्च आय वर्ग को कम से कम मध्यवर्ग जितनी कर-दर देनी चाहिए। यह धनियों की कर-कटौती घटाने और कर-न्याय को सुदृढ़ करने का प्रयास था। यह साकार नहीं हुआ, व्यक्तिवाद पर आधारित पश्चिमी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था के कारण। इसके विरोधी तथाकथित रिसाव-प्रभाव (trickle-down) का हवाला देते हुए व्यक्तिवाद से धन-सृजन का प्रतिपादन करते रहे। अंततः बफ़ेट नियम क़ानून नहीं बन सका। अमेरिका से आगे संसार भर में भी “वैश्विक संपत्ति-कर” पर चर्चा होने लगी। G20 समझौते (2024) के साथ “अति-धनी व्यक्तियों” पर अंतरराष्ट्रीय न्यूनतम कर-दर लागू करने की योजना पर चर्चा हुई, जिसके लक्ष्य थे कर-चोरी रोकना, असमानता घटाना, और जलवायु तथा निर्धनता से निपटने के लिए धन जुटाना। कंपनियों पर 15% का वैश्विक न्यूनतम कर (最低限稅, Global Minimum Tax) लागू होने के चरण में पहुँच गया है। पर मुख्य बात, यानी व्यक्तिगत संपत्ति पर साझा वैश्विक कर, राजनीतिक सहमति न बनने से विफल हो गई। यह सब पश्चिम की व्यक्तिवादी व्यवस्था के भीतर हुआ। उनके विचार बहुत प्रयासों के बावजूद सरकारी नीति में न बदल पाने से विफल हो गए। व्यक्तिवाद और निजी हित तथा लोकहित के अभिसरण के तर्क वाली पश्चिमी दार्शनिक व्यवस्था के भीतर ऐसे प्रयास का बचे रहना कठिन है।

एआई क्रांति के संबंध में अमेरिकी सीनेटर सैंडर्स (Sanders) जिस प्रश्न पर सबसे अधिक ध्यान देते हैं, वह ठीक ध्रुवीकरण का बढ़ना है। उनके अनुसार समस्या यह नहीं कि एआई क्रांति मानव-स्वभाव के पुनर्गठन को संभव बनाकर सकारात्मक काम करेगी, बल्कि मानव-स्वभाव के स्वार्थ की अभिव्यक्ति, प्रभुत्व, के विस्तार में है। आर्थिक असमानता के गहराने के संबंध में उन्होंने चेताया कि एआई बड़े पैमाने पर रोज़गार छीन सकती है, और उसके लाभ थोड़ी-सी बड़ी कंपनियों और “बिलियनेयर वर्ग” में केंद्रित होने की प्रबल संभावना है। इसमें यह चिंता व्यक्त होती है कि वह मौजूदा आर्थिक ध्रुवीकरण को और बढ़ा सकती है। उन्होंने रेखांकित किया कि एआई केवल अर्थव्यवस्था ही नहीं, राजनीति, शिक्षा, पर्यावरण और यहाँ तक कि युद्ध के ढंग को भी बदल सकती है। विशेष रूप से उनका मानना है कि “रोबोट सैनिक” जैसे सैन्य उपयोग सामाजिक अस्थिरता और सत्ता के केंद्रीकरण को गहरा कर सकते हैं। सैंडर्स ने एआई को “क्रांतिकारी और रूपांतरकारी प्रौद्योगिकी” मानते हुए भी आलोचना की कि आज कांग्रेस और समाज बहस और नियमन में बहुत पीछे हैं। उन्होंने डेटा-केंद्रों के निर्माण पर अस्थायी रोक (moratorium) तक की माँग की, और बल दिया कि सामाजिक सहमति और नियामक व्यवस्थाओं को एआई के विकास की गति के बराबर आना होगा। सैंडर्स की दृष्टि यह है कि एआई क्रांति केवल प्रौद्योगिकी की प्रगति का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक सत्ता-संरचनाओं और असमानता को फैला सकने वाला ख़तरनाक उत्प्रेरक है। जैसे औद्योगिक क्रांति ने श्रमिक वर्ग और पूँजीपति वर्ग के बीच की खाई बढ़ाई, वैसे ही एआई क्रांति ध्रुवीकरण की मिलती-जुलती क्रियाविधि को फैला सकती है।

ध्रुवीकरण से निपटने का उपाय धन के वितरण में है। यह हमें इस प्रस्थापना तक ले जाता है कि लाभ की खोज और लोभ में भेद करना होगा: लाभ की खोज को कैसे सुनिश्चित किया जाए और लोभ का प्रबंधन कैसे किया जाए। यह प्रश्न हमें एक बार फिर लोकहित और निजी हित के प्रश्न तक ले जाता है। लोकहित सुनिश्चित किया जाए, तो ध्रुवीकरण घटता है, यानी मध्यवर्ग की रक्षा होती है; पर निजी हित की खोज की छूट दी जाए, तो ध्रुवीकरण बढ़ता है और मध्यवर्ग सिकुड़ता है। मध्यवर्ग का सिकुड़ना पश्चिम की पहचान है। ध्रुवीकरण मध्यवर्ग की मज़दूरी के ठहराव और जीवन-व्यय की वृद्धि के रूप में प्रकट होता है। उत्पादकता लगातार बढ़ी, पर मज़दूरी उतनी नहीं बढ़ी। आवास, शिक्षा और चिकित्सा का ख़र्च तेज़ी से बढ़ने से मध्यवर्ग की वास्तविक क्रय-शक्ति घटती है। पश्चिम में स्वचालन और वैश्वीकरण के कारण विनिर्माण और पारंपरिक उद्योगों के रोज़गार विदेश चले जाते हैं या स्वचालन से प्रतिस्थापित हो जाते हैं। मध्यवर्ग को सहारा देने वाले स्थिर “मध्यम-कौशल के रोज़गार” लुप्त होकर अस्थिर सेवा-क्षेत्र और कम मज़दूरी वाले श्रम से प्रतिस्थापित होने के साथ संपत्ति की खाई बढ़ती जाती है।

अचल संपत्ति और शेयरों जैसी परिसंपत्तियों के दाम बढ़ने से केवल परिसंपत्ति रखने वाले उच्च वर्ग को लाभ होता है। मध्यवर्ग के लिए संपत्ति जुटाना कठिन होता जाता है, और वह ऋण (शिक्षा-ऋण, आवास-ऋण) पर अधिक निर्भर हो जाता है। नीति और कर-संरचना के स्तर पर कर और कल्याण-नीतियाँ उच्च वर्ग के अनुकूल बनाई जाती हैं, या मध्यवर्ग की पर्याप्त रक्षा नहीं कर पातीं। विशेष रूप से अमेरिका में चिकित्सा और शिक्षा के ख़र्च का बोझ इतना भारी है कि मध्यवर्ग आसानी से निचले वर्ग में धकेल दिया जाता है। 1970 के दशक के बाद से अमेरिका आदि पश्चिमी देशों में मध्यवर्ग का अनुपात लगातार घट रहा है। यह बढ़ते ध्रुवीकरण के रूप में प्रकट होता है: ऐसी संरचना उभरती है जिसमें उच्च वर्ग और धनी, निचला वर्ग और अस्थिर होता जाता है, और मध्यवर्ग धीरे-धीरे लुप्त होता जाता है। सामाजिक प्रभाव के रूप में यह राजनीतिक ध्रुवीकरण, सामाजिक अस्थिरता और लोकतंत्र की नींव के कमज़ोर होने तक पहुँचता है। पश्चिम में मध्यवर्ग चार धुरियों के एक साथ काम करने से ढह रहा है: आर्थिक संरचना में परिवर्तन (स्वचालन और वैश्वीकरण), जीवन-व्यय की वृद्धि, संपत्ति की खाई और नीतिगत विफलता।

2) “पश्चिमी सभ्यता कैसे ढह सकती है”: मध्यवर्ग का लोप

पश्चिम की बाज़ार-अर्थव्यवस्था ने राज्यवाद (statism) नामक लोभ का सामना करने में बड़ी सफलता पाई। पर समय के साथ कबीलावाद (tribalism) का लोभ पश्चिमी बाज़ार-अर्थव्यवस्था के लिए ख़तरा बन रहा है। पश्चिम का कबीलावाद पश्चिम के व्यक्तिवाद (individualism) के दर्शन का ही विस्तार है। पश्चिम का अहस्तक्षेप व्यक्तिगत स्वायत्तता को खुली छूट देते हुए ऐसी प्रक्रिया से गुज़रा जिसमें स्वायत्तता स्वतंत्रता में बदल गई। यह व्यक्ति और समूह, दोनों स्तरों पर निजी हित और लोकहित के अभिसरण के सिद्धांत से जुड़कर ऐसी परिघटना बनाता है जिसमें निजी हित लोकहित से आगे रहता है। लोकहित और निजी हित के अभिसरण का सिद्धांत अनिवार्य रूप से अंततः किसी देश की आर्थिक व्यवस्था में अमीर-गरीब की खाई गहरी करता है। राज्यवाद की वह परिघटना, जिसमें राजा अपने निजी हित के लिए देश की अर्थव्यवस्था चलाकर जनता के साथ आय की खाई बढ़ाते थे, अब ऐसी परिघटना में बदल रही है जिसमें राजाओं के स्थान पर कबीलावाद के नेता निजी हित साधते हैं और जनता के साथ आय की खाई बढ़ाते हैं।

“हाउ वेस्टर्न सिविलाइज़ेशन कुड कोलैप्स” (How Western Civilization Could Collapse, पश्चिमी सभ्यता कैसे ढह सकती है) नामक लेख ने भविष्य की ओर देखते हुए पश्चिमी राजनीतिक अर्थशास्त्र के सामने खड़ी समस्याएँ प्रस्तुत कीं। 459 वह समझाता है कि लोकतंत्र, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक सहिष्णुता जैसे मूल्यों पर खड़ी पश्चिमी सभ्यता तीस वर्षों में, एक पीढ़ी के भीतर, संकट में पड़ सकती है। वह दो कारण बताता है: वैश्विक तापवृद्धि सहित पारिस्थितिकी-तंत्र के विनाश से, या अमीर-गरीब की खाई को बढ़ने देकर, पश्चिमी सभ्यता ढह सकती है। जब विकसित देशों के अभिजात समूह केवल अपना धन बढ़ाते रहने को लक्ष्य बनाते हैं और शेष मानवता के जीवन के प्रति उदासीन रहते हैं, तो ऐसा समाज अंततः पीछे जाता है। यह समस्या किसी एक देश की भीतरी स्थिति तक सीमित नहीं रहती। राष्ट्रों के भीतर अमीर-गरीब की बढ़ती खाई अनिवार्य रूप से राष्ट्रों के बीच की खाई बढ़ाती है। अंततः यह पूरी पृथ्वी की समस्या बन जाती है।

धनी देशों और निर्धन देशों के बीच की खाई हर दिन और चौड़ी हो रही है। धनी देश हर दिन और धनी हो रहे हैं, और निर्धन देशों के लिए बस टिके रहना हर दिन और कठिन होता जा रहा है। 460

विकसित देश अपने-अपने भीतर अमीर-गरीब की बढ़ती खाई में उलझे होने के कारण विश्व की समस्याओं में लगने की फ़ुर्सत नहीं रखते। वैश्विक समस्याओं को छोड़ दें, तब भी केवल भीतरी समस्याओं के कारण विकसित देशों के निर्णायक संकट में पड़ने की प्रबल संभावना है। अमेरिका और ब्रिटेन का उदाहरण लें: यदि अमीर-गरीब की खाई की वर्तमान प्रवृत्ति जारी रही, तो लगभग 2050 तक अमेरिका और ब्रिटेन में मध्यवर्ग लुप्त हो जाएगा, और उनकी जनता दो भागों में बँट जाएगी: धनी और अत्यंत निर्धन।

लगभग 2050 तक अमेरिका और ब्रिटेन मूलतः केवल दो सामाजिक वर्गों वाले देश बन जाएँगे। एक छोटा अभिजात समूह अच्छी तरह जिएगा, पर शेष अधिकांश लोगों को लगातार कठिन होती जीवन-परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा… असंतोष और भय में जीते हुए वे धर्म, नस्ल या राष्ट्र से चिपक जाएँगे। धनी अपनी संपदा से और अधिक चिपकेंगे, और ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ेंगे जो अधिकांश निर्धनों से और भी कठोर श्रम करवाए।461

तब ऐसे देश में दोनों छोरों पर खड़े लोग आपस में तीव्र संघर्ष करने लगते हैं, और देश देश के रूप में काम करने की क्षमता खो देता है। लोकतंत्र, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सहिष्णुता जैसे मूल्यों की उत्तरोत्तर उपेक्षा होती है। यही वह “विकसित देशों का जाल” है जिसमें पश्चिम फँस गया है। विकसित देशों के जाल का अर्थ लक्ज़मबर्ग के तत्कालीन प्रधानमंत्री ज़ॉं-क्लोद युंकर (Jean-Claude Juncker, 1995 से 2013 तक उन्नीस वर्ष प्रधानमंत्री, फिर यूरोपीय आयोग के अध्यक्ष) के उस कथन में ठीक-ठीक रेखांकित होता है जो उन्होंने 2007 में, यूरो-संकट के फूटने से पहले, कहा था: “हम सब जानते हैं कि क्या करना है, बस यह नहीं जानते कि ऐसा करने के बाद फिर से कैसे चुने जाएँ।” (We, heads of government all know what to do, we just don’t know how to get reelected when we do it.) युंकर के ये शब्द सबसे बढ़कर पश्चिमी विकसित देशों के भारी ऋण, उससे जुड़े सामाजिक कल्याण-व्यय, और इसे सुधार न पाने वाली राजनीतिक व्यवस्थाओं की ओर संकेत करते हैं।

इससे बचने के लिए विकसित देशों को “अमीर-गरीब की बढ़ती खाई और ऋण से चलने वाले कल्याण की पुनरावृत्ति” से बाहर निकलना होगा। यदि विकसित देश ऐसा करें, तो पश्चिमी सभ्यता के पतन से बचा जा सकता है। पर समय मनुष्य के कर्म की असीमित प्रतीक्षा नहीं करता। बहुत से विद्वान पूर्वानुमान करते हैं कि यदि वर्तमान स्थिति न बदली, तो वह पतन की ओर ले जाएगी। उनमें से कुछ का मानना है कि यदि पश्चिमी सभ्यता ढही, तो चीन जैसे सशक्त देश बचे रहेंगे।462

पश्चिमी सभ्यता के पतन के बावजूद पूर्वी सभ्यता क्यों बची रह सकती है? हमें उन कारणों की पड़ताल करनी होगी जिनसे पूर्व आश्चर्यजनक आर्थिक वृद्धि कर रहा है, पृथ्वी पर अकेले मध्यम-आय के जाल से निकल पाया है, और लोकतांत्रिक बाज़ार-अर्थव्यवस्था सफलतापूर्वक बना पाया है। “कल्चर मैटर्स” (Culture Matters, संस्कृति मायने रखती है) नामक लेख में अमेरिकी विद्वान लॉरेंस हैरिसन (Lawrence E. Harrison) पूर्व के कन्फ़्यूशियसवादी सांस्कृतिक क्षेत्र का उदाहरण देते हुए किसी देश की संस्कृति और आर्थिक विकास के घनिष्ठ सह-संबंध पर पैनी दृष्टि व्यक्त करते हैं।

सिंगापुर, हांगकांग और ताइवान उष्णकटिबंध में हैं… उनका अभूतपूर्व आर्थिक विकास कन्फ़्यूशियसवादी सांस्कृतिक क्षेत्र के जापान और कोरिया की आर्थिक सफलता को दोहराता है… और उष्णकटिबंधीय थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया और फ़िलीपींस में चीनी अल्पसंख्यकों की आर्थिक सफलता भी कन्फ़्यूशियसवादी संस्कृति के महत्त्व को दिखाती है। पेरू और ब्राज़ील के छोटे जापानी अल्पसंख्यकों के साथ भी ऐसा ही है। 463

लैटिन अमेरिकी विद्वान पहले «बहाने» रखते थे: जलवायु, औपनिवेशिक अतीत, प्रभुत्व-संरचनाओं (dependence theory) या नस्ली भेदभाव के कारण आर्थिक विकास कठिन है। प्रोफ़ेसर हैरिसन समझाते हैं कि लैटिन अमेरिका के पूर्वी एशियाई, यानी चीनी, कोरियाई और जापानी, लोगों के उदाहरण को देखें, तो इनमें से कोई भी कारण नहीं हो सकता। उन्होंने दिखाया कि केवल संस्थाओं या प्रतिरूपों से आर्थिक विकास नहीं हो सकता; अर्थात संस्कृति ही संस्थाओं और प्रतिरूपों को तय करती है।464

वे समझाते हैं कि पूरी पृथ्वी को देखें, तो केवल पूर्व ने पश्चिम की बराबरी की है, और पूर्व और पश्चिम को छोड़कर कोई देश अभी आर्थिक विकास या लोकतंत्र में विकसित देश नहीं बना है। वे रेखांकित करते हैं कि अंततः मानवता का केवल लगभग 30% विकसित लोकतंत्रों में है, और शेष 70% के लिए प्रयास आधी शताब्दी से अधिक के प्रयासों के बावजूद सफल नहीं हुए। 465

स्पेन, पुर्तगाल, कोरिया, ताइवान, सिंगापुर और हांगकांग जैसे मुट्ठी भर देश ही रोस्टो (Rostow) की विकास-योजना के अनुसार विकसित देशों की पंक्ति में शामिल हुए हैं। आज के लगभग छह अरब लोगों में से केवल लगभग एक अरब विकसित लोकतंत्रों की पंक्ति में हैं। 466

वास्तव में पूर्वी एशियाई देशों का आर्थिक विकास, सबसे आगे जापान, फिर कोरिया-ताइवान-हांगकांग-सिंगापुर नामक चार ड्रैगन, और चीन, अपनी गति और व्यापकता में इतिहास में अभूतपूर्व है। पश्चिमी विद्वान इसे सामूहिक रूप से “कन्फ़्यूशियसवादी कार्य-नैतिकता” (Confucian Work Ethics) कहते हैं और इसकी तुलना उस तथाकथित “प्रोटेस्टेंट कार्य-नैतिकता” (Protestant Work Ethics) से करते हैं जो पश्चिमी पूँजीवाद के उदय के समय पश्चिम के पास थी।

कन्फ़्यूशियसवादी कार्य-नैतिकता की विशेषताओं के रूप में वे परिश्रम, बचत, शिक्षा के प्रति उत्साह, छोटी सरकार, “भविष्य के लिए वर्तमान सुख को टालने” (deferred gratification या deferment of present pleasure for greater future gain) की परंपरा, और प्रभावी क़ानूनी तथा सामाजिक कल्याण-व्यवस्थाएँ गिनाते हैं। अंततः “कन्फ़्यूशियसवादी” देशों ने सिद्ध कर दिया कि उनके पास अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र की सफलता की सारी परिस्थितियाँ भरपूर हैं। पूर्वी एशिया का यह उदय मैक्स वेबर के इस मत को फीका कर देता है कि पूर्व के लिए कभी आर्थिक विकास करके पश्चिम की बराबरी करना असंभव है।467 यह पूरी तरह पश्चिमी पूर्वाग्रह है, जो राजनीतिक-आर्थिक चिंतन के सार को विकृत करता है।

शिक्षा, विकास, कार्य-नैतिकता, योग्यतावाद, और परिश्रम तथा मितव्ययिता के रूप में व्यक्त कन्फ़्यूशियसवादी मूल्य सभी पूर्वी एशियाई देश साझा करते हैं। उनकी आर्थिक वृद्धि ने उजागर कर दिया कि मैक्स वेबर ने अपनी पुस्तक चीन का धर्म: कन्फ़्यूशियसवाद और दाओवाद में जो प्रतिपादित किया, वह कितना खींचतान वाला था। उनका तर्क था कि चीन में पूँजीवादी वृद्धि इसलिए असंभव है क्योंकि वहाँ काल्विनवाद में दिखने वाला “चुने हुओं में होने या न होने की अनिश्चितता से उपजा तनाव” नहीं है। 468

पूर्व की कन्फ़्यूशियसवादी कार्य-नैतिकता अपने लिए होती है, इसलिए वह धार्मिक सिद्धांतों के परिवर्तन या संसार के अंत के सिद्धांतों की नियति से निरपेक्ष, भीतरी आवश्यकता से आचरित होती है; इसलिए माना जा सकता है कि उसका सभ्यतागत आधार दृढ़ है। पश्चिमी प्रेस पूर्वी एशियाई मूल्यों के रूप में “शिक्षा, परिश्रम, बचत, और भविष्य की बड़ी उपलब्धि के लिए वर्तमान सुख को टालने की प्रवृत्ति” को गिनाता है।469 पश्चिमी आँकड़े भी, यूरोपीय, अमेरिकी और पूर्वी लोगों में अमेरिकियों को आधार मानकर, बताते हैं कि यूरोपीय लोग अमेरिकियों से लगभग 20% कम और पूर्वी लोग लगभग 30% अधिक काम करते हैं, और पूर्व की कार्य-चेतना को सबसे प्रबल बताते हैं।

बहुत से विशेषज्ञ मानते थे कि पूर्वी एशिया में आर्थिक विकास न होने का कारण ठीक कन्फ़्यूशियसवादी चिंतन है… यह मत बीसवीं शताब्दी के मध्य तक भी प्रबल था। पर फिर यह देखा गया कि पूर्वी एशिया में आर्थिक छलाँग के लिए आवश्यक तत्त्वों, सशक्त शिक्षा, उपलब्धि-बोध, योग्यतावाद, परिश्रम और मितव्ययिता, को उभारने में वही सांस्कृतिक और राजनीतिक नेतृत्व निर्णायक भूमिका निभाता है। 470

समग्र रूप से, धर्म संबंधी अध्ययन पाते हैं कि प्रोटेस्टेंट, यहूदी और कन्फ़्यूशियसवादी समाजों में कैथोलिक, इस्लामी और यूनानी रूढ़िवादी समाजों से अधिक आर्थिक विकास को बढ़ावा देने वाले तत्त्व हैं, जबकि बाद वाले समाजों में आर्थिक विकास में बाधा डालने वाले तत्त्व दिखते हैं।471

अंततः माना जा सकता है कि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक पश्चिम ने बिना किसी स्पष्ट कारण के पूर्वी सभ्यता में केवल वे दोष खोजने का प्रयास किया जो बताएँ कि पूर्व पश्चिम से क्यों पिछड़ गया। विशेष रूप से बीसवीं शताब्दी के मध्य तक आर्थिक विकास और लोकतंत्र में पूर्व के पिछड़ने के कारण कन्फ़्यूशियसवाद और दाओवाद की पूर्व-आधुनिकता, अतार्किकता, अवैज्ञानिकता और अलोकतांत्रिकता में खोजने का प्रबल प्रयास हुआ।472 पर आर्थिक विकास, लोकतंत्र और सामाजिक विकास में पूर्व की निरंतर युगांतरकारी प्रगति पर ध्यान देते हुए पश्चिम ने इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभ में ही पूर्व की आध्यात्मिक संस्कृति में अंतर्निहित राजनीतिक-आर्थिक चिंतन के मूल्य को धीरे-धीरे स्वीकार करना आरंभ किया: कन्फ़्यूशियसवाद (शिक्षा को महत्त्व देने और योग्यतावाद की परंपरा, सार्वभौमिक नैतिकता और परिश्रम-मितव्ययिता की संस्कृति), दाओवाद (कम कर और छोटी सरकार से व्यक्ति की आर्थिक पहल सुनिश्चित करना, प्रकृति और मनुष्य का सामंजस्य), बौद्ध धर्म (करुणा का विचार, अपरिग्रह को महत्त्व) आदि।

पूर्व की ये ख़ूबियाँ संयोग से नहीं उपजीं। न इन्हें किसी नीतिगत निर्णय या संकल्प से गढ़ा जा सकता है। ये इतिहास और परंपरा में रची-बसी हैं। पूर्व के पास पश्चिम से भिन्न, अपनी विशिष्ट गहरी और व्यापक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है, और दार्शनिक आधार है। अर्थात राजनीतिक-आर्थिक चिंतन में पूर्व कबीलावाद के प्रति पश्चिम से अधिक दृढ़ता से सावधान है। पूर्व की कार्य-नैतिकता की विशेषता पूर्व और पश्चिम के आर्थिक विकास के प्रतिरूपों में मिलती है। अंतर यह है कि पूर्व मानव-स्वभाव के स्वार्थ का प्रबंधन करके आर्थिक विकास साधने का प्रतिरूप दिखाता है, और पश्चिम उसे खुली छूट देकर।

राष्ट्र-राज्य के निर्माण में पश्चिम से दो हज़ार वर्ष आगे रहे पूर्व में राष्ट्र-राज्य के निर्माण के साथ उभरने वाले राजनीतिक-आर्थिक चिंतन में खोजने योग्य प्रज्ञा और नीतियाँ हैं। पूर्वी चिंतन में मिलने वाले, पश्चिम से भिन्न राजनीतिक-आर्थिक चिंतन को सिंगापुर के दिवंगत प्रधानमंत्री ली कुआन यू भली-भाँति समझाते हैं। वे उन राजनीतिक-आर्थिक समस्याओं को समझाते हैं जिनसे पश्चिम गुज़र रहा है और जो साम्यवाद के लोप के साथ अमेरिका पर आ पड़ी हैं:

किसी समाज के सफल होने के लिए उसे प्रतिस्पर्धा के द्वारा सक्षम लोगों को विकसित करते हुए हर किसी को अवसर भी देना होगा। अर्थात प्रतिस्पर्धा और सहयोग साथ-साथ रहने चाहिए। यदि साम्यवाद की तरह सब लोग एक जैसे परिणाम बाँटें, तो प्रगति नहीं होती। इसीलिए साम्यवाद लुप्त हो गया। इसके विपरीत, यदि केवल क्षमताओं के विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाए, जिससे सफल लोग सब कुछ ले जाएँ और असफलों के पास कुछ न रहे, तो अमीर-गरीब की खाई बढ़ती जाती है। अंततः, जैसा अमेरिका में है, समाज का संतुलन और न्याय टूट जाता है। 473

उनका मानना है कि ऐसी स्थिति में अमीर-गरीब की खाई की समस्या सुलझाते हुए आर्थिक विकास करने का उपाय पूर्व के राजनीतिक-आर्थिक दर्शन में मिल सकता है, और वे यिन-यांग के सिद्धांत का परिचय देते हैं। किसी देश में आर्थिक रूप से कमज़ोरों की सहायता और आर्थिक विकास करने वालों के उचित पुरस्कार का सामंजस्य यिन-यांग के दर्शन के अनुसार किया जाना चाहिए। अर्थात प्रतिस्पर्धा और सहयोग को साथ-साथ रखना होगा:

सबसे अच्छा उपाय पूर्व के यिन-यांग के सिद्धांत में मिलता है। प्रतिस्पर्धा और सहयोग, दोनों की एक साथ खोज करनी चाहिए… यह पश्चिमी उदारवादियों के तरीक़े से भिन्न है। वे जनता को उकसाते हैं कि वह सारी लज्जा छोड़कर कल्याण को एक अधिकार की तरह लगातार माँगती रहे। अंततः उस देश में कल्याण-व्यय विस्फोटक रूप से फैल जाता है।474

ऐसी स्थिति में हम संस्कृति के मूल प्रश्न से टकरा रहे हैं: पूर्वी संस्कृति की मूल ख़ूबियों, यानी शिक्षा को महत्त्व देने, योग्यतावाद, परिश्रम-मितव्ययिता और आत्म-साधना की परंपराओं, को कैसे बचाए रखा जाए। यह “पश्चिमी प्रतिरूप में नैतिकता का बहिष्कार बनाम पूर्वी प्रतिरूप में नैतिकता की केंद्रीय भूमिका” दिखाता है, और यही इक्कीसवीं शताब्दी में पूर्व और पश्चिम के राजनीतिक-आर्थिक यथार्थ को अलग करने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। नैतिकता को बाहर रखकर मुख्यतः क़ानून पर निर्भर पश्चिमी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था सैन्य-औद्योगिक-संसदीय संकुल के लिए निजी हित साधने का मार्ग खोल देती है।

हित-समूहों की निजी हित की खोज मिनबेन के लिए ख़तरा

क़ानून बनाने वाली संसद को जनता के लिए लोकहित की खोज करनी चाहिए। उससे पहले एक और महत्त्वपूर्ण चरण है: जनता को ऐसे लोगों को प्रतिनिधि चुनना चाहिए जो लोकहित के लिए प्रयास करें। यही लोकतंत्र और मिनबेन (民本, जनता के लिए शासन) का ढाँचा है। पर यदि संसद ऐसे प्रतिनिधियों से भर जाए जो लोकहित के बजाय अपने पुनर्निर्वाचन को प्राथमिकता दें, तो लोकतंत्र और मिनबेन का कोई अर्थ नहीं रह जाता। अंततः जनता का चुनाव ही निर्णायक है। परिश्रम और मितव्ययिता का प्रतिपादन करने वाले और अपनी राजनीतिक शक्ति से पहले परिणाम सुनिश्चित करने का वचन देने वाले के बीच, जनता दूसरे को चुनने का स्वभाव दिखाती है। युद्ध, किसी दूसरे लोक के आक्रमण या ग्रह-टक्कर जैसी आपात स्थिति न हो, तो जनता तुरंत परिणाम का वचन देने वाले को चुनती है।

सांसदों की लोकहित से पहले निजी हित को रखने की प्रवृत्ति, और जनता की लोकहित को प्राथमिकता देने वाले प्रतिनिधियों के बजाय तुरंत निजी लाभ का वचन देने वाले प्रतिनिधियों को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति, ये दोनों प्रवृत्तियाँ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। वह सिक्का मानव-स्वभाव की सबसे प्रबल शक्ति, स्वार्थ, है। जनता और सांसदों, दोनों का परोपकार रूपी लोकहित से पहले आत्म-संरक्षण के लिए स्वार्थ को रखना मानव-स्वभाव है। शांति लंबी चले, तो लोकहित के बजाय निजी हित की खोज की स्थिति बनती है, और तब क़ानून का शासन और उदार लोकतंत्र ख़तरे में पड़ जाते हैं। शक्तियों के पृथक्करण की व्यवस्था का एक स्तंभ ढह जाए, तो व्यवस्था दो पैरों पर खड़ी नहीं रह सकती, और लोकतंत्र अपना अर्थ खो देता है।

जनता द्वारा संसद को दिया जाने वाला समर्थन बहुत कम है। कोरिया और अमेरिका, दोनों में यह लगभग 20% के आसपास है। जनता लगातार देखती है कि सांसद लोकहित के बजाय पुनर्निर्वाचन नामक निजी हित पर पहले ध्यान केंद्रित करते हैं। कोरिया में कंपनियों या संगठनों का चंदा अवैध है। पर अमेरिका आदि पश्चिमी विकसित देशों में चंदे की खुली छूट है। विशेष रूप से अमेरिका में कंपनियों की राजनीतिक कार्य समितियों (PAC, political action committee) के माध्यम से अप्रत्यक्ष सहायता संस्थागत रूप से अनुमत है। अमेरिकी सांसद के पुनर्निर्वाचन का सबसे बड़ा कारक चुनाव के लिए आवश्यक धन है: व्यक्तियों या उद्यमियों का चंदा। सांसद क़ानून का उपयोग करके अपने दानदाताओं के आवश्यक लाभ बढ़ाते हैं, और दानदाता सांसदों के पुनर्निर्वाचन के लिए आवश्यक धन देते हैं। बहुत से सांसद जुनज़ी (君子) जैसी गरिमा वाले नेता होने से पहले आत्म-रक्षा की सहज वृत्ति के प्रति निष्ठावान लोग, यानी सहभागी (शियाओरेन, 小人), हैं। दानदाता-समितियों या व्यवसाय-जगत का समर्थन उनके लिए सीधा है। व्यवसाय-जगत और संसद एक हो जाएँ, तो कार्यपालिका के पास बहुत बार उनके पीछे चलने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रहता। अंततः यह परिघटना बढ़ती जा रही है कि व्यवसाय-जगत, संसद और कार्यपालिका कबीलावाद के आधार पर लोकहित की उपेक्षा करके पहले स्वयं बचे रहने के लिए निजी हित साधते हैं।

कबीलावाद द्वारा लोकहित को हानि पहुँचाने की परिघटना वणिकवादी व्यवस्था में भी फली-फूली। एडम स्मिथ ने वणिकवादी नीति के प्रतिनिधि माने जाने वाले कोल्बेर (Jean-Baptiste Colbert, 1619-1683) की नीति का नकारात्मक मूल्यांकन किया। कोल्बेर लुई चौदहवें के अधीन 1665 से 1683 तक अठारह वर्ष वित्त-प्रमुख रहे। उन्होंने संरक्षणवाद की खोज की और उसे राजा और उद्यमियों के बीच लाभ बाँटने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया। वास्तव में वित्त-प्रमुख के रूप में कोल्बेर के पहले क़दमों में से एक वेनिस से काँच की वस्तुओं के आयात का विकल्प बनने के लिए फ़्रांस का राजकीय काँच-कारख़ाना स्थापित करना था। सात वर्ष बाद, जब यह कारख़ाना ठीक-ठाक काँच की वस्तुएँ बनाने लगा, तो उन्होंने वेनिस से काँच की वस्तुओं के हर आयात पर रोक लगा दी। वणिकवादी नीति के तहत हर देश आयात घटाने और निर्यात बढ़ाने की होड़ में अपना भविष्य देखता था, इसलिए चरम संरक्षणवाद और आयात-प्रतिस्थापक उद्योगों के विस्तार की खोज हुई। पर इस राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में स्वाभाविक रूप से कबीलावादी लोभ बेरोक-टोक बढ़ा। अर्थात उक्त राजकीय काँच-कारख़ाने जैसे निकायों को राज्य से एकाधिकारवादी संरक्षण और सुविधाएँ मिलीं। और राज्य, यानी राजघराना, इन कंपनियों से कर या अन्य उपयुक्त रूपों में आय लेने का संबंध बनाते हुए ऐसी स्थिति रच बैठा जिसमें अंततः केवल सामान्य जनता की बलि चढ़ी।

हम यही सोचने को विवश हैं कि व्यापार को सीमित करने, नियंत्रित करने और निर्देशित करने वाले अधिकांश नियम, क़ानून, आदेश, अध्यादेश, और सरकार, राजा या संसद के सार्वजनिक विनियम अंततः या तो राजनीतिक भूलें हैं, या लोकहित के सुंदर नाम तले चालाक लोगों द्वारा निजी लाभ के लिए बनाए गए हैं।475

कबीलावाद की लोकहित को हानि पहुँचाने की प्रवृत्ति वणिकवाद और फिर औद्योगिक क्रांति से गुज़रते हुए और सुदृढ़ हुई। एडम स्मिथ, मैनकर ओल्सन, राष्ट्रपति आइज़नहावर और हाल के वित्तीय अर्थशास्त्री ठीक इसी कबीलावाद के प्रति सतर्कता व्यक्त करते हैं। एडम स्मिथ का मानना था कि किसी देश के व्यापारी और निर्माता, सब एकाधिकार से अधिक लाभ कमा सकते हैं, इसलिए वे विदेशी प्रतिस्पर्धियों को बाहर रखना चाहते थे, और ऐसी नीतियों की बलि अंततः सामान्य जनता चढ़ती है। इसलिए उन्होंने राज्य के हस्तक्षेप को हटाकर जनता की आर्थिक गतिविधि में अहस्तक्षेप का, और राष्ट्र के व्यापार में वणिकवादी संरक्षणवाद के बजाय मुक्त व्यापार का प्रतिपादन आरंभ किया।476 एडम स्मिथ ने हर व्यक्ति के स्वार्थ को राज्यवाद से मुक्त करते हुए साथ ही कबीलावादी लोभ के प्रति चिंता भी व्यक्त करनी आरंभ की:

एक ही धंधे के लोग शायद ही कभी इकट्ठे होते हैं, भले मौज-मस्ती या मनोरंजन के लिए ही, पर उनकी बातचीत अंततः जनता के विरुद्ध किसी षड्यंत्र में, या दाम बढ़ाने की किसी युक्ति में समाप्त होती है।477

एक क़दम आगे बढ़कर एडम स्मिथ यह भी स्पष्ट करते हैं कि इस कबीलावादी लोभ का क़ानून से शासन करना बहुत कठिन है:

सच तो यह है कि ऐसी बैठकों को किसी ऐसे क़ानून से रोकना असंभव है जो लागू हो सके, या जो स्वतंत्रता और न्याय के अनुरूप हो। पर यदि क़ानून एक ही धंधे के लोगों को कभी-कभार इकट्ठा होने से नहीं रोक सकता, तो कम से कम उसे ऐसी सभाओं को सुगम बनाने के लिए कुछ नहीं करना चाहिए, और उन्हें आवश्यक बनाने के लिए तो बिल्कुल भी नहीं।478

ओल्सन भी उस कबीलावादी लोभ के लोकतंत्र के लिए ख़तरा बनने की संभावना के प्रति चेताते हैं जिसे वे “विशेष हित-समूह” (special interest group) कहते थे। उनका आकलन है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्यवाद को निजी हित साधने से रोकने के अच्छे साधन हैं, पर कबीलावाद को निजी हित साधने से रोकना बहुत कठिन है। अर्थात शक्तियों का पृथक्करण नेता को निजी हित साधने से तो भली-भाँति रोकता है, पर व्यवसाय-जगत और संसद के निजी हित के लिए एक होने के सामने उसकी कोई ख़ास भूमिका नहीं रहती।

यद्यपि लोकतंत्र अपने नेताओं को समाज के अधिशेष को मनमाने ढंग से निकालकर उपयोग करने से रोकने की बहुत अनुकूल स्थिति में है, फिर भी लंबे समय से स्थिर लोकतंत्र में विशेष हित-समूहों को देश की समूची आर्थिक नीति पर हावी होने से रोकना बहुत कठिन है।479

ओल्सन इस तथ्य को भी सीधे देख रहे थे कि “व्यक्तियों से बने समूह निजी हित के लिए काम करते हैं, लोकहित के लिए नहीं”। इसलिए उन्होंने पूर्वानुमान किया और चिंता जताई कि विशेष हित-समूहों द्वारा बनाई गई राजनीतिक-आर्थिक नीतियाँ लोकहित को हानि पहुँचाएँगी:

विशेष हित-समूहों द्वारा बनाई गई राजनीतिक-आर्थिक नीतियाँ प्रायः संरक्षणवादी और विज्ञान-प्रौद्योगिकी की प्रगति-विरोधी होती हैं। पर स्वभावतः ये नीतियाँ लाभ को हित-समूह में केंद्रित करती हैं, जबकि उनकी लागत पूरी जनता समान रूप से चुकाती है। इसी तर्क के अनुसार हित-समूहों की नीतियों के प्रति जनता का प्रतिरोध बड़ा नहीं होता। इसलिए समय के साथ ये विशेष हित-समूह बढ़ते जाते हैं, और अंततः उस देश की अर्थव्यवस्था पिछड़ जाती है।480

यह अनेक रूपों में प्रकट हो सकता है। राष्ट्रपति आइज़नहावर ने अपने कार्यकाल में पाया कि लोकहित की खोज करने वाला उनका राज्य-संचालन सेना और कंपनियों के उन घनिष्ठ संबंधों से काफ़ी प्रभावित हुआ जिनका उद्देश्य केवल इन हित-समूहों का हित साधना था। इसलिए आठ वर्ष बाद राष्ट्रपति-पद छोड़ते हुए 1961 के अपने प्रसिद्ध भाषण में उन्होंने ठीक “सैन्य-औद्योगिक संकुल” (military industrial complex) के विरुद्ध चेतावनी छोड़ी:

शासन की परिषदों में हमें सैन्य-औद्योगिक संकुल द्वारा अनुचित प्रभाव के अर्जन से, चाहे वह जानबूझकर खोजा गया हो या नहीं, सावधान रहना होगा। ग़लत जगह स्थित शक्ति के विनाशकारी उभार का ख़तरा विद्यमान है और बना रहेगा। हमें इस गठजोड़ के भार को अपनी स्वतंत्रताओं या लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को ख़तरे में डालने की अनुमति कभी नहीं देनी चाहिए।481

चूँकि यह सैन्य-औद्योगिक संकुल अंततः संसद के माध्यम से प्रभाव डालता है, और इसलिए कार्यपालिका की शक्ति को भी काम में आना पड़ता है, इसे “सैन्य-औद्योगिक-संसदीय संकुल” (military-industrial-congressional complex) भी कहा जाने लगा। लोकतांत्रिक राज्यों के भीतर उठने वाली यह चिंता भली-भाँति दिखाती है कि हम ऐसी स्थिति में पहुँच गए हैं जिसमें राज्यवादी लोभ पर संस्थागत अंकुश लग जाने भर से लोकहित सुरक्षित नहीं हो जाता, बल्कि राज्यवाद के नहीं, कबीलावाद के लोभ से लोकहित को क्षति पहुँचती है। आइज़नहावर का समय 1950 का दशक है, जब वित्तीय बाज़ारों ने आज जैसी छलाँग नहीं लगाई थी। द्वितीय विश्वयुद्ध में बहुत बढ़े सैन्य-औद्योगिक संकुल ने अब कबीलावादी लोभ के सबसे प्रमुख वाहक का स्थान “वित्त-सरकार संकुल” (finance-governmental complex) को सौंप दिया है। यह इतना प्रबल परिवर्तन है कि इसे औद्योगिक क्रांति के बाद वित्तीय क्रांति कहा जा सकता है, जो आर्थिक व्यवस्था के केंद्र को विनिर्माण से सेवा-क्षेत्र की ओर खिसका देती है:

पिछले तीस वर्षों में अधिकांश विकसित देशों के वित्त-क्षेत्र में सच्ची क्रांति हुई है। 1970 में अमेरिका में कुल सूचीबद्ध शेयरों और अमेरिकी आर्थिक उत्पादन का अनुपात 0.66 था। 2000 तक यह तेज़ी से बढ़कर अमेरिका में सूचीबद्ध शेयरों का कुल मूल्य सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 1.5 गुना हो गया। 482 (2025 में 2.1 गुना।)

बाज़ार-अर्थव्यवस्था में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय कंपनियाँ, उन्हें जो भी कहा जाए, उनके द्वारा साधा जाने वाला कबीलावादी लोभ अब स्वयं बाज़ार-अर्थव्यवस्था के लिए ख़तरा बन गया है। विशेष रूप से वित्तीय कंपनियाँ वैश्विक पैमाने के बाज़ारों से चतुर संचालन-व्यवस्थाओं के द्वारा निपटते हुए ऐसे लाभ और लोभ की खोज के मार्ग पर चल पड़ी हैं जिसमें उत्पादकता बिल्कुल नहीं। विश्व की बाज़ार-अर्थव्यवस्था पर उनका प्रभाव इतना बढ़ता गया कि इक्कीसवीं शताब्दी की राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था को “कैसीनो पूँजीवाद” (Casino Capitalism) कहा जाने लगा। राजन (Rajan) आदि अर्थशास्त्रियों ने स्थापित किया कि जब व्यवसायी इकट्ठे होते हैं, तो वे लोकहित के विरुद्ध षड्यंत्र रचने और निजी हित साधने के लिए अपनी शक्ति एक करते हैं। ये अर्थशास्त्री राज्य के ग़ैर-ज़िम्मेदारीपन का निदान करते हैं: “पर बहुत बार, और बहुत अधिक देशों में, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा में बाधा डालने वाले व्यवसायियों के ये षड्यंत्र अंततः राज्य की सहायता पा जाते हैं।”483

सैन्य-औद्योगिक-संसदीय संकुल, यानी विशेष हित-समूह, अब अकथनीय शक्ति और प्रभाव पा चुके हैं। वित्त-जगत सरकार से शक्ति मिलाकर ऐसा “वित्त-संसदीय या वित्त-सरकार संकुल” बन गया है जो “निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा” नामक लोकहित को हानि पहुँचाता है। पूँजीवाद, यानी बाज़ार-अर्थव्यवस्था की व्यवस्था, मनुष्य द्वारा अब तक बनाई गई संस्थाओं में उत्पादन और वितरण का सबसे कुशल उपाय है। और उसकी जड़ में प्रतिस्पर्धा है। पर प्रतिस्पर्धा, क्योंकि वह व्यवसायियों के अंतहीन लोभ का प्रबंधन करती और उस पर अंकुश लगाती है, सभी स्थापित व्यवसायियों के लिए झंझट बन जाती है।484 इसलिए हित-समूह, यानी कबीलावाद, प्रतिस्पर्धा पर लगाम लगाने और हर समूह का हित साधने के लिए अपना पूरा ज़ोर लगाते हैं। कबीलावाद की सबसे बड़ी समस्या समाज के ध्रुवीकरण के रूप में प्रकट होती है। अमीर-गरीब की बढ़ती खाई से जनता को क्षति पहुँचती है। मध्यवर्ग सिकुड़ता है, और जनता अत्यधिक धन का आनंद लेने वाले धनियों और निर्धनों में बँट जाती है। यदि राज्य लोकहित की रक्षा न करे, तो लोकहित किसकी ज़िम्मेदारी बनेगा?

अहस्तक्षेप का जाल: “पहरेदारों पर पहरा कौन देगा?”

अहस्तक्षेप ने व्यक्ति की आर्थिक स्वायत्तता को राज्यवाद (statism) से मुक्त किया। इसी के बल पर पूँजीवाद फ़ासीवाद या साम्यवाद जैसी विचारधाराओं की नियंत्रित अर्थव्यवस्था की व्यवस्थाओं को हरा सका। पर अहस्तक्षेप व्यवसाय-जगत और संसद के गठजोड़ से निजी हित साधने वाले कबीलावाद (tribalism) के सामने अपनी असमर्थता दिखा रहा है। लोकतंत्र के मूल सिद्धांत के अनुसार संसद बनाने वाले दलों से अपेक्षित है कि वे जनता के हित, यानी लोकहित, की खोज करें। पर बहुत बार संसार के अनगिनत दल लोकहित की खोज के बजाय सत्ता की वापसी, यानी दल के हित, को आगे रखते दिखते हैं। वे जिसका प्रतिनिधित्व करते हैं, वह जनता का हित नहीं, बल्कि अपने समूह, यानी दल, का हित साधने वाला कबीलावादी लोभ है। वे पश्चिम के अहस्तक्षेप का झंडा उठाकर दावा करते हैं कि उनकी सफलता लोकहित के रूप में प्रकट होती है। पर यदि जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले दल अपने स्वार्थ या लोभ को खुली छूट दे दें, तो लोकहित की रक्षा कोई नहीं करता। यह बिना पहरेदार की अवस्था बन जाती है। अहस्तक्षेप पश्चिमी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था का जाल बन जाता है।

इस प्रकार पश्चिमी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था के सामने खड़ी समस्याएँ पश्चिमी लोकतंत्र और बाज़ार-अर्थव्यवस्था की नींव के लिए ख़तरा बन रही हैं। यह संकट अंततः एक ही प्रश्न में सिमटता है, वह प्रश्न जो रोमन कवि जुवेनल ने रखा था: “पहरेदारों पर पहरा कौन देगा?” 485 लोकतंत्र की मूल मान्यता यह है कि सत्ताधारियों या दलों के कामों पर अंततः मतदाता, यानी जनता, निगरानी रखती है, उनका मूल्यांकन करती है और निर्णय देती है। पर जैसे रोमन साम्राज्य-काल में सम्राट के अंगरक्षक सबसे अधिक वेतन देने वाले सेनानायक या सेनापति को सम्राट बना देते थे, वैसे ही यदि जनता उन राजनेताओं को चुनाव जिताए जो ऋण लेकर भी सामाजिक कल्याण बढ़ाते हैं, जिससे दलों के बीच सत्ता में लौटने के लिए सामाजिक कल्याण बढ़ाने की होड़ लगे, और जनता उस ख़तरे को न पहचानकर आँखों के सामने के कल्याण को पसंद करे, तो लोकतंत्र की मूल मान्यता ढह जाती है। वास्तव में यूरो-संकट के समय पश्चिमी देशों के नेताओं और जनता को जो करना था, वह स्पष्ट था: समस्या का स्वरूप बताना, जनता से मूल कार्य-नैतिकता की ओर लौटने की अपील करना, और जनता का ऐसे राजनेताओं को अपना नेता चुनना। पर ऐसा नहीं हुआ। तब पश्चिम के लोकतांत्रिक शासन के आरंभ-बिंदु, दलीय राजनीति की व्यवस्था, पर प्रश्न उठते हैं।

पूर्व में ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में दलीय राजनीति का एक प्रयास और कबीलावादी लोभ पर बहस हुई थी। सोंग राजवंश के सुधारवादी राजनेता औयांग शिउ (歐陽修, 1007-1072) ने सुधारों की एक शृंखला का प्रयास किया, जिसमें अधिकारियों का वेतन बढ़ाकर उन्हें सार्वजनिक सेवा के प्रति निष्ठावान बनाना, क़ानून को प्रभावी ढंग से लागू करना, भाई-भतीजावाद का अंत, और शाही परीक्षाओं में वास्तविक शासन-संचालन के लिए आवश्यक विषय जोड़ना शामिल था।486 1045 में उन्होंने सम्राट को एक आवेदन-पत्र भेजा। उनका तर्क उनके निबंध “गुटों पर विमर्श” (朋黨論) पर टिका था: “नेता सिद्धांत के आधार पर गुट बनाता है, और सहभागी अपने लाभ के लिए गुट बनाता है”, और उन्होंने तर्क दिया कि गुट बनाने की अनुमति दी जानी चाहिए। 487 अर्थात उन्होंने आधुनिक ढंग की दलीय राजनीति का प्रस्ताव रखा।

वास्तव में ग्यारहवीं शताब्दी में सोंग राजवंश में मुख्यमंत्री वांग आनशी (王安石, 1021-1086) के नेतृत्व में ऐसी नीतियाँ चलाई गईं जिन्हें आधुनिक ढंग का समाजवाद माना जा सकता है। इसके विपरीत ऐसी नीतियाँ जिन्हें रूढ़िवादी माना जा सकता है, सिमा गुआंग (司馬光, 1019-1086) ने लागू कीं। दोनों शक्तियों के बीच होड़ और परस्पर नियंत्रण था। अंततः औयांग शिउ का गुट बनाने, यानी दलीय राजनीति, का विचार नहीं अपनाया गया। इसका कारण यह निर्णय था कि नेता के स्तर तक पहुँच सकने वाले बहुत थोड़े होते हैं, और अधिकांश लोग सहभागी ही बने रहते हैं, इसलिए दलों के लोग भी अंततः निजी हित में डूब जाएँगे। दलीय राजनीति के तर्क को अंततः नव-कन्फ़्यूशियसवाद के आचार्य झू शी (朱熹, 1130-1200) ने निर्णायक रूप से दफ़ना दिया। झू शी ने गुटों के निर्माण की तीखी आलोचना करते हुए तर्क दिया कि गुट अंततः लोकहित के बजाय समूह के निजी हित की खोज करते हैं। (हज़ार वर्ष बाद आधुनिक राज्यों में ऐसे उदाहरण सामने आते हैं जो इस तर्क को फिर से परखते हैं। कोरिया, अमेरिका और ब्रिटेन में संसद को जनता का समर्थन लगभग 20% से ऊपर नहीं उठता। क्योंकि पूरी जनता जान चुकी है कि सांसद जनता के लिए लोकहित से अधिक अपने पुनर्निर्वाचन नामक निजी हित पर ध्यान केंद्रित करते हैं।)

कबीलावादियों द्वारा निजी हित साधने पर अंकुश लगाने का उत्तरदायित्व किसका है? अंततः सरकार का। इसीलिए शासन-कला में शूज़ी (術治), यानी राजनीति-कला द्वारा शासन, की अवधारणा महत्त्वपूर्ण हो जाती है: क्योंकि बाज़ार के लिए निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा नामक लोकहित की खोज कठिन है, और सरकार का प्रबंधन आवश्यक है। अर्थशास्त्री रेखांकित करते हैं कि वित्तीय क्रांति से चिह्नित इक्कीसवीं शताब्दी की विश्व-अर्थव्यवस्था में सबको निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा से लाभ मिलना चाहिए, पर इसे बनाए रखना कठिन है। वे इस विरोधाभास को रेखांकित करते हैं कि समस्या यह है कि “निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा नामक लोकहित की रक्षा के महत्त्वपूर्ण काम के लिए प्रोत्साहन बहुत कम है”:

बाज़ार मुक्त नहीं हैं, और व्यवहार में बहुत मुक्त हो भी नहीं सकते, क्योंकि बाज़ार बहुत नाज़ुक राजनीतिक आधार पर टिके हैं। प्रतिस्पर्धी बाज़ारों से सबको लाभ होता है, पर समस्या की जड़ यह है कि आर्थिक व्यवस्था को प्रतिस्पर्धी और खेल को निष्पक्ष बनाए रखने के प्रयास से किसी को कोई बड़ा लाभ नहीं मिलता। पूँजीपति भी निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने से लाभ नहीं पा सकते। दुर्भाग्य से पूँजीपति सरकार से प्रतिस्पर्धा से बचाव की माँग करते रहते हैं, और ठीक इसी से वे पूँजीवाद के सबसे बड़े शत्रु बन जाते हैं।488

बड़ी कंपनियों की निजी हित की खोज इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभ में बाज़ार-अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी चिंता बन गई है। विशेष रूप से वित्तीय पूँजी और वित्तीय कंपनियों के उस लोभ के बारे में रोज़ ख़बरें आती रहती हैं जो लोकहित की उपेक्षा करके अंतहीन रूप से केवल अपना लाभ साधता है। पश्चिम की बाज़ार-अर्थव्यवस्था ने इसके विरुद्ध कोई तैयारी नहीं की है। पश्चिम में कबीलावादी लोभ को मूलभूत समस्या मानने के बजाय, लगता है, एडम स्मिथ के बाद के बाज़ार-अर्थव्यवस्था के चिंतन के अनुसार आज भी मूल दर्शन के रूप में यह माना जाता है कि “कबीलों का लोभ, बिना इरादे के भी, अदृश्य हाथ से लोकहित के सृजन की ओर ले जाया जाता है”। आज उजागर हो रही मूलभूत समस्याओं को केवल इस मूल सिद्धांत के कुछ अपवादों या परिधीय समस्याओं के रूप में पहचाना जाता दिखता है।

कुछ क़ानूनी नियंत्रणों को छोड़कर, अंतरराष्ट्रीय बड़ी कंपनियाँ, विशेषकर वित्तीय कंपनियाँ, नैतिक रूप से अस्वीकार्य ढंग से अपना काम चला रही हैं, और सरकारें कोई क़दम नहीं उठा पा रहीं। 2008 के वित्तीय संकट के समय और उसके बाद आम जनता ने देखा कि सरकारी सहायता, यानी जनता के करों, के सहारे बची बड़ी वित्तीय कंपनियाँ भारी वेतन और बोनस आपस में बाँट रही थीं। सरकारें कोई ख़ास क़दम नहीं उठा रहीं, जबकि बड़ी कंपनियों के सामाजिक उत्तरदायित्व की चेतना कुछ ही वर्षों से, मुख्यतः संयुक्त राष्ट्र के इर्द-गिर्द, फैल अवश्य रही है। अर्थात “कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व” (CSR, Corporate Social Responsibility), “साझा मूल्य-सृजन” (CSV, Creating Shared Value) या “पर्यावरणीय, सामाजिक और कॉर्पोरेट शासन” (ESG, Environment, Social and Corporate Governance) जैसे आंदोलन कुछ ध्यान खींच रहे हैं। ये आंदोलन चाहते हैं कि कंपनियाँ, क़ानूनी दायित्व न होते हुए भी, नैतिक उत्तरदायित्व-बोध के साथ स्वयं अपने कबीलावादी लोभ पर संयम रखें। पर कंपनियों की स्थापना के मूल उद्देश्य, लाभ की खोज, के सामने ये आंदोलन बेदम हो जाते हैं। वे गौण स्तर पर ही रह सकते हैं। इसलिए कभी-कभी यह आकलन किया जाता है कि हाल के ये आंदोलन अभी “जहाँ तक हो सके दूसरों की भी सहायता करें, ऐसे दान के स्तर” पर ही हैं।

अंततः वित्तीय क्रांति के साथ शक्तिशाली वित्तीय पूँजीपतियों और उनसे जुड़े राजनीतिक जगत के संबंधों की व्यवस्था लोकतांत्रिक बाज़ार-अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी शत्रु बनकर उभरी है। इसे नियंत्रित करने वाले नियम बनाना उतना ही कठिन है जितना मध्यम मार्ग खोजकर उस पर टिके रहना:

प्रतिस्पर्धी बाज़ार नियमों के अभाव और दम घोंटने वाले नियमों की भरमार के बीच एक नाज़ुक मध्यम मार्ग से बनते हैं। जिस अवस्था में पूँजीवाद सबसे अच्छा काम करता है, वह इसीलिए बहुत अस्थिर है क्योंकि इस मध्यम मार्ग की ज़मीन बहुत संकरी है। यह अवस्था आसानी से निहित स्वार्थों की, निहित स्वार्थों द्वारा, निहित स्वार्थों के लिए व्यवस्था में पतित हो जाती है। ऐतिहासिक रूप से हमने जिस पूँजीवाद का अनुभव किया, वह ठीक इसी प्रकार का पूँजीवाद था। और दुर्भाग्य से ऐसा पूँजीवाद आज भी पृथ्वी के बहुत से स्थानों पर फल-फूल रहा है।489

कबीलावाद के प्रति पश्चिम की दार्शनिक तैयारी की कमी अहस्तक्षेप के आरंभ से ही समस्या थी। क्योंकि अहस्तक्षेप का उद्देश्य सरकार के पूर्ण हस्तक्षेप वाले वणिकवाद के सामने व्यक्तिगत स्वतंत्रता सुनिश्चित करना था। अहस्तक्षेप की परिभाषा है “वह आर्थिक चिंतन जो व्यक्तिगत आर्थिक गतिविधि की स्वतंत्रता को अधिकतम सुनिश्चित करता है और राज्य के हस्तक्षेप को यथासंभव हटाता है”। यह दार्शनिक व्यवस्था प्रभावी होने लगती है कि मानव-स्वभाव के द्वारा निजी हित लोकहित को जन्म देता है। अंततः पश्चिम के अहस्तक्षेप ने, अकर्म (वू वेई, 無爲) के विचार से भिन्न, व्यक्तिगत स्वायत्तता को “स्वतंत्रता” देने वाले प्रतिरूप पर बल दिया। अंततः हमें एडम स्मिथ द्वारा प्रतिपादित अहस्तक्षेप पर मूलभूत संदेह करना होगा: उनके इस दर्शन पर संदेह कि “कबीलों का लोभ, बिना इरादे के भी, अदृश्य हाथ से लोकहित के सृजन की ओर ले जाया जाता है”।

3) शूज़ी (術治): लोकहित को निजी हित से बचाने का दर्शन

निजी हित और लोकहित के टकराव का सिद्धांत और उनके अभिसरण का सिद्धांत पूर्व और पश्चिम के “मानव-स्वभाव” संबंधी दर्शन के अंतर से उपजते हैं। पूर्व अपने मानव-स्वभाव सिद्धांत में यह स्थिति अपनाता है कि चूँकि मानव-स्वभाव प्रबल स्वार्थ और दुर्बल परोपकार से बना है, इसलिए उसका प्रबंधन होना चाहिए। इसके विपरीत पश्चिम में एडम स्मिथ आदि का मानव-स्वभाव सिद्धांत इस दर्शन से आरंभ हुआ कि मानव-स्वभाव भला है, इसलिए वह मनुष्य के कर्म पर छोड़ देने वाले अहस्तक्षेप को आधार बनाता है। इसलिए पूर्वी मानव-स्वभाव सिद्धांत मानव-स्वभाव के प्रबंधन के स्तर पर पश्चिमी राजनीतिक दर्शन के विपरीत राजनीतिक दर्शन प्रस्तुत करता है। यह राजनीतिक दर्शन नेता की शासन-शक्ति के लिए आवश्यक तत्त्व बन जाता है। यही वह शासन-कला की अवधारणा है जिसे पूर्व महत्त्व देता है। यह इस विचार पर टिका है कि मानव-स्वभाव के आलोक में राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में शूज़ी (術治) के दर्शन का उपयोग करने पर ही लोकहित की रक्षा की जा सकती है।

युद्धरत राज्यों के काल के विधिवादी संप्रदाय ने हान फ़ेइज़ी नामक विचारक को जन्म दिया, जिसने विधिवादी चिंतन को एकीकृत करने वाले लेख छोड़े। युद्धरत राज्यों के काल की सैकड़ों वर्षों की अवधि में सात राज्यों ने अपने अस्तित्व के लिए राष्ट्रीय शक्ति बढ़ाने के उपायों को परखा। शी (勢, स्थिति की शक्ति), क़ानून (法) और शू (術, राजनीति-कला) का उपयोग करने वाले शी द्वारा शासन, क़ानून द्वारा शासन और शू द्वारा शासन प्रमुखता से उभरे। हान फ़ेइज़ी ने अपनी पुस्तक में समग्र रूप से समझाया कि शासक अपनी शक्ति (勢) के आधार पर क़ानूनों और संस्थाओं (法) को प्रभावी ढंग से चलाने की कला (術) कैसे अपनाए। हान फ़ेइज़ी का मानना था कि राजा जब देश पर शासन करे और अधिकारियों से व्यवहार करे, तो उसे मन में रखना चाहिए कि लोकहित और निजी हित टकराते हैं। उन्होंने युद्धरत राज्यों के काल में व्यापक रूप से फैली शूज़ी की अवधारणा को अपनाया।

उनका शूज़ी का दर्शन शेन बुहाई (申不害) के राजनीति-चिंतन से लिया गया था। उनका मानना था कि जब राजा क़ानून बनाए, तो राज्य के क़ानून इस ढंग से बनाए और चलाए जाने चाहिए कि अधिकारी अपने मन से लोकहित का काम करते हुए निजी लाभ उठाने का विचार छोड़ दें। साथ ही वे नेता के उदाहरण प्रस्तुत करने पर बल देते हैं।

क़ानून और नियम ऐसे बनने चाहिए कि निजी लाभ उठाने का विचार छूट जाए। यदि क़ानूनों और नियमों का ठीक से पालन हो, तो निजी लाभ उठाने की प्रथा लुप्त हो जाती है। प्रशासन में निजी हित क़ानून को नष्ट करने का कारण बनता है… यदि राजा क़ानूनों और नियमों की उपेक्षा करके अपनी सनक के अनुसार अधिकारियों को पुरस्कार दे, तो अधिकारी लोकहित छोड़कर राजा की सनक को संतुष्ट करने में लग जाते हैं। (हान फ़ेइज़ी 45:6)

शेन बुहाई युद्धरत राज्यों के काल में हान (韓) राज्य के मुख्यमंत्री थे, और शिंगमिंग (刑名) के आचार्य के रूप में प्रसिद्ध हैं। वे ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के व्यक्ति थे। शू (術, राजनीति-कला) को महत्त्व देने वाले विधिवादी विचारक के रूप में उनका मानना था कि शासक अपने मंत्रियों का शासन करते हुए शिंगमिंग के द्वारा अपनी सत्ता को स्थिर कर सकता है। उनके अनुसार राज्य-संचालन का केंद्र मिंग (名), यानी शासक के आदेश या पद, और शिंग (刑, जिसे 形 भी लिखा जाता है), यानी यह परखना कि मंत्री उनका भली-भाँति पालन करते हैं या नहीं, है। यह वास्तव में किए गए काम (刑, यानी 形) और पद-नाम या कथन (名) को एक-दूसरे से मिलाने वाले राजनीतिक सिद्धांत पर केंद्रित है। सिद्धांत यह है कि मंत्रियों को अपने पद के अनुरूप काम करना चाहिए, और उनके वचन और कर्म में अंतर हो तो उन्हें दंड मिलता है। इसके द्वारा शासक ने मंत्रियों के मूल्यांकन के वस्तुनिष्ठ मानदंड बनाए और सत्ता की पहल अपने हाथ में रख सका। शूज़ी का केंद्र अंततः इसी में है, जो सबसे महत्त्वपूर्ण है: यह परखना कि अधिकारी या मंत्री लोकहित को हानि पहुँचाकर निजी हित तो नहीं साध रहे, और इसे सुधारना। उनका तर्क था कि नेता द्वारा मंत्रियों से निपटने की शिंगमिंग की कला (術) समृद्ध देश और सशक्त सेना का सबसे छोटा मार्ग है। उनका शूज़ी का विचार युद्धरत राज्यों के काल से होकर चीन और पूर्व में कार्मिक-प्रशासन और नौकरशाही की स्थापना तक पहुँचा।

शेन बुहाई के दर्शन का केंद्र यह है कि मंत्रियों से निजी हित की खोज का निरंतर प्रलोभन छुड़वाकर उन्हें लोकहित की खोज में लगाकर देश को समृद्ध और सशक्त बनाया जाए। शेन बुहाई ने मंत्रियों के वचन और कर्म की एकता पर बल दिया और इसे संस्थागत और प्रशासनिक प्रबंधन से प्राप्त करना चाहा; उन्होंने क़ानून और संस्थाओं के अनुसार मंत्रियों के आचरण का मूल्यांकन करके, योग्यता को पुरस्कार और भूल को दंड देकर, पूर्वानुमेय व्यवस्था स्थापित करनी चाही। सिमा चियान के इतिहासकार के अभिलेख आकलन करते हैं कि शेन बुहाई का शिंगमिंग-शास्त्र (刑名之學) हुआंग-लाओ विचार (黃老思想) पर आधारित है।490 उन्होंने विधिवादी और दाओवादी चिंतन को मिलाकर देश पर शासन करना चाहा।

राष्ट्र-राज्य की स्थापना और उसके साथ नौकरशाही और प्रशासनिक संस्थाएँ बन जाने से शूज़ी की भूमिका समाप्त नहीं हो जाती। शूज़ी के केंद्रीय तत्त्व मानव-स्वभाव सिद्धांत से उपजते हैं, इसलिए वे मानव-समाज में संस्थाओं से मिट नहीं जाते, बल्कि काम करते रहते हैं। शूज़ी ने निजी हित और लोकहित के टकराव के सिद्धांत पर आधारित राजनीतिक-आर्थिक दर्शन को पूर्वी सभ्यता में गहराई से रोप दिया। सामाजिक संस्थाओं के विकास के क्रम में उसका महत्त्व उलटे बढ़ता है, क्योंकि निजी हित और लोकहित में भेद करना और भी कठिन हो गया है। राजनीतिक अर्थशास्त्र के महत्त्वपूर्ण होने के साथ केवल अधिकारियों का ही नहीं, व्यवसाय-जगत के लोभ का प्रबंधन करने का उत्तरदायित्व भी सरकार और जनता पर आ जाता है। क्योंकि संसद और व्यवसाय-जगत के गठजोड़ से निजी हित साधने के मामले बढ़ते जाते हैं।

पूर्वी देशों में शूज़ी की संस्कृति प्रबल रूप से बनी हुई है। राज्य-संचालन में शूज़ी को विशेष महत्त्व देने के उदाहरण के रूप में सिंगापुर का नाम लिया जा सकता है। प्रधानमंत्री ली कुआन यू ने अपने शासन के आरंभ में, फ़रवरी 1960 में, सबसे पहले शूज़ी का वह क़दम उठाया जिसने सरकारी कर्मचारियों के निजी हित साधने पर रोक लगाई। उन्होंने “भ्रष्टाचार-निवारण क़ानून” लागू किया। उन्होंने 1952 में ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार द्वारा स्थापित, भ्रष्ट अधिकारियों की जाँच करने वाले “भ्रष्ट आचरण जाँच ब्यूरो” को सशक्त जाँच और न्यायिक अधिकार दिए। भ्रष्ट आचरण जाँच ब्यूरो (貪汚調査局, Corrupt Practices Investigation Bureau) सिंगापुर का भ्रष्टाचार-विरोधी विशेषज्ञ जाँच-निकाय है। प्रधानमंत्री के सीधे अधीन यह संस्था पुलिस या अभियोजन से अधिक स्वतंत्र रूप से काम करती है। यह सरकारी कर्मचारियों, कंपनियों और व्यक्तियों सहित पूरे समाज के भ्रष्ट कृत्यों की जाँच करने और ईमानदार समाज बनाए रखने वाली केंद्रीय संस्था है। सिंगापुर संसार का सबसे ईमानदार देश बन गया। उसने सरकारी कर्मचारियों पर निजी हित की खोज की रोक लगाते हुए उन्हें संसार के सबसे ऊँचे वेतनों में से एक की गारंटी देकर देश का सफलतापूर्वक संचालन किया। यह पूर्व की शूज़ी की अवधारणा पर बल देकर राज्य की दिशा तय करते हुए सफलता का उदाहरण है।

शूज़ी की अवधारणा पूर्व तक सीमित नहीं। पश्चिम में भी एक ऐसे नेता हुए जिन्होंने लोकहित और निजी हित के अभिसरण के सिद्धांत की समस्याओं को रेखांकित करते हुए राज्य-प्रशासन पर इस समस्या के विशाल नकारात्मक प्रभाव की ओर ध्यान दिलाया। राष्ट्रपति आइज़नहावर ने 17 जनवरी 1961 को राष्ट्रपति-पद छोड़ते हुए विदाई-भाषण दिया। उसमें उन्होंने खुले रूप से चेताया कि सैन्य-औद्योगिक संकुल का कबीलावादी आचरण निजी हित साधते हुए लोकहित की खोज करने वाले राज्य-संचालन के लिए बड़ी समस्याएँ खड़ी करता है। वे रेखांकित कर रहे थे कि सैन्य-औद्योगिक संकुल का आचरण ऐसा कबीलावाद है जो लोकहित की उपेक्षा करके निजी हित साधता है, और उसके सामने सरकार असहाय अनुभव करती है।491 उन्होंने चेताया कि रक्षा और व्यवसाय का गठजोड़ लोकतांत्रिक संस्थाओं और जनता की स्वतंत्रता को खोखला कर सकता है।

इससे वे यह रेखांकित कर रहे थे कि पूर्वी सभ्यता के इस दर्शन के अनुसार, कि “लोकहित और निजी हित टकराते हैं”, जिस परिघटना का सामना शूज़ी से करना चाहिए, वही पश्चिम में घट रही है। एडम स्मिथ आदि द्वारा दिए गए इस दार्शनिक सिद्धांत में विश्वास रखने वाली पश्चिमी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था, कि “लोकहित और निजी हित अभिसरित होते हैं”, शूज़ी के प्रश्न पर मूलतः निहत्थी है। इसलिए पश्चिम में कबीलावादी आचरण फैलता जा रहा है। 2007-2008 का वैश्विक वित्तीय संकट और 2009-2011 का यूरो-संकट केवल वित्तीय या आर्थिक समस्याएँ नहीं हैं। उनके नीचे बाज़ार-अर्थव्यवस्था के चिंतन और बाज़ार-अर्थव्यवस्था का प्रबंधन करने वाली व्यवस्था के रूप में लोकतंत्र से जुड़ी, राजनीतिक अर्थशास्त्र के स्तर की मूलभूत और दार्शनिक समस्याएँ हैं। पश्चिम बड़ी सरकार, भारी कर, बहुत-से नियम, अमीर-गरीब की बढ़ती खाई, और ऋण से फैलाए जाने वाले कल्याण को दोहराता जा रहा है। 2007-2008 का वित्तीय संकट उस कबीलावाद से हुआ जिसमें वित्त-जगत, संसद और कार्यपालिका ने मिलकर अपने-अपने हित साधे। अंततः अमेरिका ने इस वित्तीय संकट का कोई समाधान प्रस्तुत नहीं किया और कामचलाऊ उपायों से उसे टाल दिया। यही निष्कर्ष संकट से पाँच वर्ष पहले, 2003 में प्रकाशित बेस्टसेलर सेविंग कैपिटलिज़्म फ़्रॉम द कैपिटलिस्ट्स (Saving Capitalism from the Capitalists, पूँजीपतियों से पूँजीवाद को बचाओ) ने निकाल लिया था: “बाज़ार-अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा ख़तरा समाजवाद की वापसी नहीं है। सच्चा ख़तरा बाज़ार-अर्थव्यवस्था की व्यवस्था के भीतर निजी हित साधना चाहने वाले कबीलावाद से आता है।”

शूज़ी का दर्शन इस बात में भी प्रकट होता है कि पूर्व और पश्चिम बड़ी कंपनियों और प्रेस के बीच की साँठगाँठ से कैसे निपटते हैं। अमेरिका सहित पश्चिम में बड़ी कंपनियों को प्रेस-संस्थान ख़रीदने और उनका उपयोग करने की खुली छूट है। पूर्व बड़ी कंपनियों और प्रेस-संस्थानों के विलय की अनुमति नहीं देता। इस प्रश्न को ध्यान से देखना होगा कि इसे पश्चिम के दावे के अनुसार “प्रेस पर नियंत्रण या उदारवाद को क्षति” माना जाए, या “कबीलावाद की निजी हित की खोज का प्रबंधन”। पूर्व का दूसरा विकल्प चुनना ठीक शूज़ी की अवधारणा के कारण है।

सेना और उद्योग के बीच कबीलावादी हित की खोज के लिए प्रेस और जनमत के महत्त्व को जानते हुए सैन्य-औद्योगिक संकुल में उनका उपयोग करने की प्रबल इच्छा और बढ़ती जाती है। अमेरिका की शक्तिशाली बड़ी कंपनियाँ होड़ लगाकर प्रेस-संस्थान ख़रीद रही हैं। पश्चिम में भी इस प्रश्न में रुचि ली जाने लगी है। राष्ट्रपति बाइडन ने जनवरी 2025 में राष्ट्रपति आइज़नहावर के विदाई-भाषण से बहुत मिलता-जुलता विदाई-भाषण दिया। उसमें उन्होंने हाल में अमेरिका में बनी इस स्थिति को रेखांकित किया कि बड़ी कंपनियाँ होड़ लगाकर प्रेस-संस्थानों का स्वामित्व ले रही हैं, और कहा कि इन बड़ी कंपनियों और प्रेस का गठजोड़ इतना आश्चर्यजनक रूप से प्रबल प्रभाव डाल रहा है कि वह लोकतंत्र के लिए ख़तरा बन गया है।

राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रश्नों पर “वॉशिंगटन सहमति” और “बीजिंग सहमति” की तुलना करने वाले विश्लेषण भी पूर्व और पश्चिम की सभ्यताओं के इस भिन्न रूप को दिखाते हुए माने जा सकते हैं। सामान्यतः पहला उदार लोकतंत्र के साथ आर्थिक विकास का प्रतिरूप आगे रखता है, और दूसरा अधिनायकवाद के साथ आर्थिक विकास का प्रतिरूप। प्रतिरूपों की ये तुलनाएँ पश्चिम-केंद्रित हो सकती हैं, क्योंकि आज की प्रवृत्ति पश्चिम के उदारवादी चिंतन पर आधारित है। पर पूर्व और पश्चिम के राजनीतिक-आर्थिक विकास के प्रतिरूपों में एक सभ्यतागत पक्ष है जो स्वतंत्रता पर केंद्रित विश्लेषण के बजाय आत्म-संरक्षण के सिद्धांत पर ध्यान केंद्रित करना चाहता है। निजी हित और लोकहित के टकराव और अभिसरण के सिद्धांत इसके महत्त्वपूर्ण दृष्टिकोण बनते हैं। दूसरे का अनुसरण करने वाले पश्चिमी राजनीतिक-आर्थिक चिंतन में शूज़ी का दृष्टिकोण ऐसी अवधारणा बन जाता है जिसे महत्त्व नहीं दिया जाता। पर लोकहित को हानि पहुँचाकर निजी हित साधने वाले अधिकारियों और प्रशासकों के प्रति सतर्क रहने वाला शूज़ी सामाजिक संरचनाओं के जटिल होने के साथ और भी बड़ा प्रश्न बनता जा रहा है।

कबीलावादी आचरण लोकतंत्र के केंद्र, राजनीतिक दलों, पर भी ज्यों का त्यों लागू होकर समस्या बनता है। लोकतंत्र में यह महत्त्वपूर्ण है कि यह आधार-मान्यता बनी रहे कि जनता सक्षम लोगों को नेता चुनती है, और ये नेता लोकहित, यानी जनता, के लिए काम करते हैं। पर पश्चिम की राजनीतिक व्यवस्थाओं में लोकहित की प्राथमिकता की आधार-मान्यता धीरे-धीरे धुँधली होती जा रही है। समस्या सुलझाने के लिए पश्चिम पारदर्शिता बढ़ाने जैसे राजनीतिक संस्थागत सुधारों, और नागरिकों को राजनीति में अधिक भाग लेने को प्रेरित करने के उपायों का प्रयास कर रहा है। क्योंकि वह मानता है कि लोकतंत्र निरंतर विकसित होता है, इसलिए समस्या सुधारी जा सकती है।

पर आज के सैन्य-औद्योगिक संकुल, वित्तीय संकट, और संसदों की लोकहित के बजाय निजी हित साधने की प्रवृत्ति को देखें, तो समस्या केवल व्यवस्था के सुधार से सुलझने वाली नहीं। उसे व्यवस्था से पहले, मानव-स्वभाव की अपरिहार्य समस्या से उपजी मानना होगा। मनुष्य कुछ भी करे, अंततः मानव-स्वभाव का ही अनुसरण करता है, इसलिए राजनेता भी अंततः लोकहित के बजाय आत्म-संरक्षण (संसदीय व्यवस्था में पुनर्निर्वाचन) की ओर खिंचते हैं। शूज़ी की अवधारणा के अभाव में पश्चिम का राजनीतिक अर्थशास्त्र और लोकतंत्र अनजाने में मूलभूत समस्याओं से टकरा रहे हैं। अंततः इसका परिणाम अमीर-गरीब की निरंतर बढ़ती खाई को नियंत्रित न कर पाने के रूप में आता है। पश्चिम कबीलावाद के प्रति, यानी वित्त-जगत, संसद और यहाँ तक कि कार्यपालिका के भी शामिल होकर हर समूह की अपने हित बढ़ाने की प्रवृत्ति के प्रति, कोई बड़ा समस्या-बोध अनुभव नहीं करता।

अधिकांश पश्चिमी देशों का सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में सरकारी ऋण इतना बड़ा है कि उनकी अर्थव्यवस्थाएँ उसे सँभाल नहीं सकतीं। यदि यही चलता रहा, तो पिछड़ना और पतन स्पष्ट है, फिर भी पश्चिम में न राजनेता न मतदाता इसे सुधारने का संकल्प या ऊर्जा दिखाते हैं। यह राजनीतिक अर्थशास्त्र के स्तर पर पश्चिमी देशों की समस्याओं के केंद्र को रेखांकित करता है: ठीक वही विकसित देशों का जाल जो पश्चिम दिखा रहा है।492 यह सीधे पूर्वी मानव-स्वभाव सिद्धांत द्वारा विकसित शूज़ी की अवधारणा के “अभाव” से जुड़ा है।

शूज़ी और अकर्म का विचार बनाम अहस्तक्षेप

लगता है पूर्व पश्चिम की क़ानून-केंद्रित राजनीतिक व्यवस्था का अनुसरण करते हुए “शूज़ी” की अवधारणा को भूल रहा है। पर भले इस शब्द पर सीधा ध्यान न दिया जाए या इसका उल्लेख न हो, इसका महत्त्व पूर्वी संस्कृति में ज्यों का त्यों जीवित है। निजी हित के सामने लोकहित की रक्षा करने वाला शूज़ी का दर्शन कथाओं और कविताओं के माध्यम से पूर्वी संस्कृति में गहराई से बसा है। “निजी से मुँह मोड़कर सार्वजनिक की ओर” (背私向公), “स्वयं को जीतकर सार्वजनिक की सेवा” (克己奉公), “पहले सार्वजनिक, फिर निजी” (先公後私), “पहले चिंता, बाद में आनंद” (先憂後樂) और “सार्वजनिक को बहाना बनाकर निजी लाभ साधना” (憑公營私) जैसी सूक्तियाँ और प्रसंग आज भी सम्मान के साथ प्रयुक्त होते हैं।493

शूज़ी की अवधारणा लोकहित की रक्षा के रूप में प्रकट होती है। निजी हित और लोकहित के अभिसरण का प्रतिपादन करने वाली पश्चिमी व्यवस्था के सामने पूर्व अपनी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था का आरंभ-बिंदु निजी हित और लोकहित के टकराव के दर्शन को बनाता है। शूज़ी की अवधारणा इस दर्शन पर आधारित है कि मनुष्य उस मानव-स्वभाव से शासित होता है जो व्यक्तियों, समूहों और राज्य के नेताओं, सबमें समान रूप से पाया जाता है। अर्थात सभी मनुष्य ऐसा मानव-स्वभाव लेकर जन्मते हैं जो लोकहित के बजाय निजी हित साधने की ओर झुकता है। इसलिए इस मानव-स्वभाव को खुली छूट की नहीं, प्रबंधन की आवश्यकता है। अकर्म का विचार शूज़ी द्वारा खोजे जाने वाले लोकहित के प्रबंधन के दर्शन का प्रतिनिधित्व करता है।

अकर्म के विचार के अनुसार इस संसार के सभी राजनीतिक दल और सभी विशेष हित-समूह अंततः कबीलावादी स्वार्थ की खोज की ओर प्रवृत्त माने जाते हैं। वे अंततः क़ानून की सीमाओं से बचते हुए अपने लोभ को अधिकतम बढ़ाने को लक्ष्य बनाने की प्रवृत्ति दिखाते हैं। अंततः, जैसा प्रोफ़ेसर ओल्सन ने उल्लेखनीय अंतर्दृष्टि के साथ रेखांकित किया, सभी मनुष्यों में “स्थायी डाकू” का स्वभाव सहज वृत्ति के रूप में है, जो अधिकतम संभव दोहन, यानी भारी कर वसूलना, चाहता है। यह केवल राज्यवादी राजा पर ही नहीं, कबीलावाद के रूप में व्यक्त होने वाले दलों और बड़ी कंपनियों के लोभ पर भी लागू होता है। इस सहज वृत्ति पर अंकुश लगाने वाला तंत्र हो, तभी व्यक्ति की आर्थिक स्वायत्तता की रक्षा करते हुए लोकहित बना रहता है।

पूर्व और पश्चिम की राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्थाओं में ऐसी भिन्न परिघटनाएँ क्यों उपजीं? यह सच है कि एडम स्मिथ ने कबीलावादी लोभ के प्रति बहुत पहले ही सतर्कता दिखाई थी, पर पश्चिम का बाज़ार-अर्थव्यवस्था का चिंतन, जैसा एडम स्मिथ में दिखता है, आरंभ से ही राज्य के लोभ के विरुद्ध व्यक्ति के लिए अहस्तक्षेप के प्रतिपादन पर केंद्रित था, इसलिए उसके लिए कबीलावादी लोभ के प्रति पर्याप्त सतर्क रहना कठिन था। इसलिए उसने बस इतना रेखांकित किया कि व्यक्तियों से बने समूहों, जैसे विशेष हित-समूहों, यानी कबीलावाद, का लोभ समस्या बनेगा, पर कोई दार्शनिक प्रश्न नहीं उठाया। अर्थात इस आत्म-विरोधी द्विभाजन पर टिके रहकर कि राज्यवादी लोभ बुरा है और व्यक्तिवादी स्वार्थ अच्छा, उसने कबीलावादी लोभ के प्रति केवल इतनी सतर्कता रखी मानो वह सिद्धांततः अच्छे व्यक्तिवादी स्वार्थ का आंशिक भटकाव भर हो। पर अब अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ने और वैश्वीकरण के फैलने के साथ ऐसी अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय कंपनियाँ जन्मी हैं जिनका प्रभाव अधिकांश देशों से अतुलनीय रूप से अधिक है। इन अंतरराष्ट्रीय कंपनियों का लोभ बाज़ार-अर्थव्यवस्था के लिए अतीत के राज्यों के लोभ से भी गंभीर ख़तरा बन गया है।

पश्चिम में एडम स्मिथ के बाद से व्यक्तिगत स्वार्थ को स्वस्थ और सकारात्मक माना जाता रहा, इसलिए व्यक्तिगत स्वार्थ के विस्तार, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लोभ, को मूलभूत समस्या मानने के बजाय लक्षणात्मक उपचार से निपटाया गया, यानी समस्या आने पर केवल स्थानीय समाधान प्रस्तुत करके। यही अमेरिका के इर्द-गिर्द विकसित हुए एकाधिकार-विरोधी क़ानून आदि हैं। यहाँ एक दार्शनिक प्रश्न निहित है। इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभ तक कबीलावादी लोभ की हानियाँ दो स्तरों पर इतनी स्पष्ट हो गईं कि उनकी अब उपेक्षा नहीं की जा सकती: एक, अर्थव्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय कंपनियों का लोभ; दूसरा, राजनीति में दलों का सत्ता बचाए रखने का लोभ। पहला बाज़ार-अर्थव्यवस्था के लिए ख़तरा है और दूसरा लोकतंत्र के लिए। और ये दोनों लोभ जुड़े हुए हैं: एक ही सिक्के के दो पहलू।

पश्चिम में एडम स्मिथ के अदृश्य हाथ की समस्या ध्रुवीकरण के रूप में बढ़ती जा रही है। इस सिद्धांत में समस्या आ गई है कि मनुष्य का स्वार्थ अदृश्य हाथ के द्वारा लोकहित उत्पन्न करता है। एडम स्मिथ अदृश्य हाथ, यानी स्वार्थ से लोकहित के सृजन, को “प्रकृति का नियम” कहकर परिभाषित करना चाहते थे: यह सिद्धांत कि पहरेदार के बिना भी निजी हित और लोकहित अपने-आप अभिसरित होते हैं। पर यदि इसके विपरीत स्वार्थ लोकहित से नहीं, बढ़ते ध्रुवीकरण से जुड़ा हो, तो पूरी पश्चिमी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में समस्या खड़ी हो जाती है। यदि पूर्व के अकर्म के विचार के प्रतिपादन के अनुसार निजी हित और लोकहित टकराते हैं, तो निजी हित को लोकहित तक ले जाना नेता का उत्तरदायित्व है। पर पश्चिम की राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में नेता कबीलावाद की शक्ति के सामने असहाय है और निगरानी नहीं कर सकता। ठीक इसी प्रश्न का कोई उत्तर नहीं रह जाता कि पहरेदारों पर पहरा कौन देगा।

राज्यवाद का सामना करने का पूर्व का ढंग पश्चिम के लोकतंत्र से भिन्न था। वह मिनबेन पर निर्भर था। पूर्व अकर्म के विचार के आधार पर राज्यवाद का सामना क़ानून और नैतिकता से करता था। पर राजा व्यवहार में क़ानून के अधीन नहीं था। यह अठारहवीं शताब्दी में भी नहीं बदला, जब अकर्म का विचार अहस्तक्षेप के रूप में पश्चिम पहुँचा: क़ानून के शासन का अभाव था। मिनबेन की नैतिकता पर टिका पूर्वी चिंतन सत्रहवीं शताब्दी तक पश्चिमी वणिकवाद से अधिक अनुकूल राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था रखता था। पर उसमें एक मूलभूत समस्या थी: नेता के संबंध में यह प्रश्न बना रहा कि “पहरेदारों पर पहरा कौन देगा?”, क्योंकि नेता पर अंकुश केवल नैतिकता पर निर्भर था। इस बिंदु पर सत्ता-परिवर्तन के मामले में पूर्व की नैतिकता से पश्चिम की क़ानून की अवधारणा ने अधिक निश्चित परिणाम दिए।

पूर्व नेताओं के परिवर्तन की किसी संस्था के बिना, ऐसी व्यवस्था पर टिका रहा जिसमें वंशानुगत नेता अपनी क्षमता के अनुसार मृत्यु तक सत्ता में रहता था, और इस प्रकार वह नेता पर अत्यधिक निर्भर हो गया। यह व्यवस्था हज़ारों वर्षों तक चली। इसलिए नैतिकता पर आधारित विद्वानों की नियंत्रण और संतुलन की अवधारणा वंशानुगत नेता के अक्षम होने पर उसकी ग़ैर-क़ानूनी निरंकुशता के सामने अपनी सीमा से टकराती थी। बीसवीं शताब्दी में प्रवेश करते हुए पूर्व ने पश्चिम से क़ानून द्वारा नेताओं के परिवर्तन की संस्था आयात की, और लोकतंत्र की दार्शनिक व्यवस्था को मिनबेन से जोड़ने का प्रयास कर रहा है। पूर्व का अधिकांश भाग नेताओं के शांतिपूर्ण परिवर्तन में सफल होता दिखता है। नैतिक रूप से इसकी तैयारी कुछ हद तक थी, क्योंकि ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में ही मेंशियस ने आदेश-परिवर्तन (易姓革命) की अवधारणा प्रस्तुत की थी। उनका तर्क था कि यदि शासक सद्गुण खो दे, तो वह शासक कहलाने योग्य नहीं रहता और उसे बदला जाना चाहिए। उन्होंने यह कहकर इस आदेश-परिवर्तन को उचित ठहराया कि जनता सबसे मूल्यवान है, उसके बाद राज्य, और राजा सबसे हल्का। मेंशियस ने जनता को नींव मानने वाले मिनबेन और जनता के लिए करने से ही राज्य फलता-फूलता है, इस जनता-सेवा (爲民) के विचार पर बल दिया।

पश्चिम ने क़ानून के द्वारा नेताओं के शांतिपूर्ण परिवर्तन की संस्था का प्रश्न सुलझा लिया। पश्चिम ने लोकतांत्रिक संस्थाओं से नेताओं का परिवर्तन स्थापित किया, और कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच नियंत्रण और संतुलन से संचालन का प्रयोग कर रहा है। पर क़ानूनी रूप से वह नेता के अतिरिक्त एक दूसरी समस्या से टकरा रहा है। नेता नहीं, बल्कि कबीलावाद शक्तियों के पृथक्करण की इस नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था को नष्ट करने की परिघटना उत्पन्न कर रहा है। क्योंकि बड़ी कंपनियों का व्यवसाय विधायिका से साँठगाँठ कर रहा है। अहस्तक्षेप के खुली छूट वाले प्रतिरूप ने राज्यवाद की समस्या तो सुलझा दी, पर कबीलावाद में समस्याएँ उठ रही हैं, और उनके लिए वह कोई उपाय नहीं दिखाता।

अकर्म का विचार क़ानून के शासन के आचरण से आगे जाने वाला, मानवीय आचरण पर एक मूल दार्शनिक चिंतन है। वह पश्चिम के अहस्तक्षेप के विचार से भिन्न स्तर का है। अकर्म का विचार दाओवाद का मूल विचार है। अर्थव्यवस्था में अकर्म का विचार प्रकृति के आर्थिक आचरण और मनुष्य के आर्थिक आचरण में भेद करता है। प्रकृति का आर्थिक आचरण संतुलन पर केंद्रित है: यही पारिस्थितिकी-तंत्र का सिद्धांत है। पर मनुष्य का आर्थिक आचरण अंतर बढ़ाकर निर्धनों को और निर्धन और धनियों को और धनी बनाता है। यह रेखांकित करता है कि प्रकृति का आचरण और मनुष्य का आचरण भिन्न हैं, क्योंकि उसमें मनुष्य का वह लोभ काम करता है जो प्रकृति में नहीं।

प्रकृति अधिक को कम करती है और कम को अधिक। मनुष्य अधिक को और अधिक और कम को और कम करता है। (दाओ दे जिंग 77)

यहीं पूर्व और पश्चिम राजनीतिक अर्थशास्त्र में मूलभूत अंतर दिखाते हैं। प्रकृति का आर्थिक आचरण, जैसा मैंडविल ने दिखाया, मधुमक्खियों के संसार सहित पूरे पशु-जगत को समेटता है। पर अठारहवीं शताब्दी के पश्चिम में प्रचलित दर्शन का मूल स्वर यह था कि मनुष्य मधुमक्खियों के आचरण का अनुसरण करे। उसका मूल स्वर स्वार्थ की प्रशंसा था: प्रकृति के आर्थिक आचरण को ज्यों का त्यों मनुष्य के राजनीतिक-आर्थिक आचरण पर लागू करना। यहीं पश्चिम का “अदृश्य हाथ” अपनी भूमिका में आता है: यह विचार कि यदि मनुष्य भी मधुमक्खियों की तरह व्यक्तिगत स्वार्थ का अनुसरण करे, तो अदृश्य हाथ से लोकहित अपने-आप रचा जाता है।

वह… एक अदृश्य हाथ से ऐसे लक्ष्य की पूर्ति की ओर ले जाया जाता है जो उसके इरादे का अंश बिल्कुल नहीं था… केवल अपना निजी हित साधते हुए वह प्रायः समाज के हित के लिए काम करता है। (एडम स्मिथ, राष्ट्रों की संपदा, पुस्तक IV, अध्याय 2)

पर पूर्वी सभ्यता की दृष्टि से मानव-स्वभाव प्रकृति के आर्थिक आचरण का अनुसरण नहीं करता। मानव-स्वभाव मनुष्य के आर्थिक आचरण को गढ़ता है। पशु-जगत में “लोभ-रहित स्वार्थ” काम करता है, और इसी से पारिस्थितिकी-तंत्र का सिद्धांत उपजता है। पर मनुष्य के संसार में “लोभ-सहित स्वार्थ” काम करता है, जो किसी अन्य पशु में नहीं। लोभ मनुष्य की अर्थव्यवस्था में “हड़पने वाला हाथ” बन जाता है। अर्थव्यवस्था में जहाँ-जहाँ मनुष्य है, वहाँ अनिवार्य रूप से हड़पने वाले हाथ उपजते हैं। पश्चिम ने केवल राज्यवाद पर ध्यान दिया, पर यह हड़पने वाला हाथ राज्यवाद (statism), कबीलावाद (tribalism) और व्यक्तिवाद (individualism), तीनों क्षेत्रों में लोकहित को हानि पहुँचाने वाला हाथ बन जाता है। अहस्तक्षेप का विचार स्थापित करते समय पश्चिम ने वणिकवाद नामक सरकार के चरम राज्यवाद का विरोध करने के लिए केवल राज्यवाद पर ध्यान केंद्रित किया। पर चूँकि हड़पने वाला हाथ मानव-स्वभाव में अंतर्निहित है, इसलिए वह सरकार के नेता, यानी राज्यवाद, तक सीमित नहीं। वह कबीलावाद और व्यक्तिवाद पर भी समान रूप से लागू होता है।

यहीं पूर्व का अकर्म का विचार पश्चिम के अहस्तक्षेप से दार्शनिक रूप से भिन्न होता है। अकर्म के विचार के केंद्रों में से एक यह है कि सबके लिए लाभदायक लोकहित की विशेष रूप से रक्षा होनी चाहिए, क्योंकि उसे व्यक्तिगत लोभ रूपी निजी हित आसानी से क्षति पहुँचा सकता है। मानव-स्वभाव को देखते हुए व्यक्तिगत हित आसानी से लोभ की ओर बढ़ता है, और केवल अपवाद-स्वरूप परोपकार की ओर। इसलिए समाज के संतुलन के लिए “नैतिकता” के द्वारा व्यक्तिगत हित को लोभ की ओर नहीं, परोपकार की ओर ले जाने का प्रयास करना होगा। यहीं पूर्वी सभ्यता के केंद्र में स्थित नैतिक संस्कृति जन्म लेती है। यही कारण है कि पूर्वी सभ्यता “लोकहित के बहाने निजी हित की खोज के प्रति सतर्क रहने वाले शूज़ी” की अवधारणा को महत्त्व देती है।

4) शूज़ी का केंद्र: लाभ की खोज और लोभ में भेद कैसे करें?

मनुष्य की आर्थिक गतिविधि में लाभ की खोज और लोभ में भेद करना होगा। लोकहित को निजी हित से बचाने वाले शूज़ी के दर्शन का केंद्र ठीक लाभ की खोज और लोभ के भेद में है। पर क़ानून इनमें भेद नहीं कर सकता। पश्चिम में आर्थिक दृष्टिकोण और नैतिक दृष्टिकोण को अलग करने की प्रबल प्रवृत्ति है। पर पूर्व में ये दोनों दृष्टिकोण समन्वयवाद (syncretism) के द्वारा गहरा संबंध बनाए रखते हैं। दाओवादी और कन्फ़्यूशियसवादी दर्शन का केंद्र उनका “राजनीतिक-आर्थिक” स्वरूप है, जो अर्थव्यवस्था में नैतिकता को महत्त्व देता है। नेता, यानी दाओवाद का ज्ञानी या कन्फ़्यूशियसवाद का जुनज़ी (君子), स्वयं को नैतिक रूप से स्थापित किए बिना नेता नहीं बन सकता। “नेता सद्गुण की खोज करता है; सहभागी लाभ की खोज करता है।” “दाओ को समझने वाला नेता लोभ से मुक्त है।” कन्फ़्यूशियसवाद और दाओवाद का यह नैतिक चिंतन पूर्व के नेता का पहला सद्गुण बनता है। पश्चिम नैतिकता से दूरी रखकर क़ानून से अर्थव्यवस्था का प्रबंधन करना चाहता है। पर क़ानून की दृष्टि से समस्या है: यह ऐसा क्षेत्र है जिसमें क़ानून यह तय नहीं कर सकता कि लाभ की खोज कहाँ तक है और लोभ कहाँ से आरंभ होता है।

लाभ की खोज अर्थव्यवस्था का केंद्र है। जैसा शुनज़ी और एडम स्मिथ ने स्पष्ट कहा, स्वार्थ मनुष्य की आर्थिक गतिविधि की जड़ है। लॉक ने इसे इस प्रकार व्यक्त किया: “जहाँ इच्छा नहीं, वहाँ उद्यम नहीं होगा” (Where there is no desire, there will be no industry)। इसलिए स्वार्थ, यानी लाभ की खोज, को उचित ठहराया जाना चाहिए। पर स्वार्थ को लोकहित की हानि करके लोभ में विकसित होने से रोकना होगा। समस्या यहीं है। लोभ का प्रबंधन होना चाहिए। लाभ की खोज को उचित ठहराने में पश्चिम का अहस्तक्षेप अपनी भूमिका भली-भाँति निभाता है। पर पहरेदार के अभाव में अहस्तक्षेप लोभ का शिकार बन जाता है।

लाभ की खोज और लोभ में भेद न कर पाने की प्रवृत्ति नैतिकता से अधिक क़ानून को महत्त्व देने वाले पश्चिम में अक्सर दिखती है। पश्चिम में “लोभ अच्छा है” (Greed is good) की अभिव्यक्ति सामने आती है। वॉल स्ट्रीट के निवेशक बोस्की (Boesky) ने 1986 में कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कली के दीक्षांत भाषण में इसका प्रयोग किया: “लोभ बहुत अच्छा है… लोभ स्वस्थ है। आप लोभी होकर भी अपने बारे में अच्छा अनुभव कर सकते हैं,” उन्होंने समझाया। यह अभिव्यक्ति 1987 की फ़िल्म वॉल स्ट्रीट में गॉर्डन गेको (Gordon Gekko) नामक पात्र के संवाद के रूप में प्रसिद्ध हुई। पश्चिम में यह प्रतिपादित किया जाता है कि लोभ केवल व्यक्तिगत सफलता में ही नहीं, आर्थिक विकास में भी योगदान देता है। 1980 के दशक के बाद यह अभिव्यक्ति अमेरिकी वित्तीय पूँजीवाद की भावना का प्रतिनिधि वाक्य बन गई।

पश्चिम में “लोभ अच्छा है” की अभिव्यक्ति लोभ के महिमामंडन और उसकी आलोचना, दोनों में उद्धृत होने वाला प्रतीकात्मक वाक्य बन गई है। इसमें मुक्त-बाज़ार पूँजीवाद का यह तर्क निहित है कि लोभ आर्थिक गतिशीलता और नवाचार को बढ़ावा दे सकता है। यह दावा कि व्यक्तिगत लाभ साधने वाला लोभ कंपनियों की वृद्धि, प्रतिस्पर्धा और कुशलता बढ़ाकर पूरे समाज की संपदा बढ़ा सकता है, एडम स्मिथ के निजी हित से लोकहित उत्पन्न होने वाले “अदृश्य हाथ” के सिद्धांत से, और मिल्टन फ़्रीडमैन के इस तर्क से मेल खाता है कि “कंपनी का सामाजिक उत्तरदायित्व लाभ को अधिकतम करना है”। लोभ मूलतः अति-इच्छा है, जो दूसरों और समाज को हानि पहुँचा सकती है। पर साथ ही मनुष्य की इच्छा विकास और उपलब्धि की प्रेरक शक्ति है, इसीलिए यह भ्रम उपजता है। नैतिकता के बजाय केवल क़ानून पर निर्भर पश्चिम में यह और भी केंद्रीय समस्या बन जाती है।

“लोभ अच्छा है” का कथन पूँजीवाद के सकारात्मक पक्ष पर बल देता है, पर इसकी आलोचना इस बात पर होती है कि अत्यधिक लोभ असमानता, पर्यावरण-विनाश और सामाजिक अस्थिरता ला सकता है। पर लोभ (greed) और लाभ की खोज (profit-seeking), दोनों “और अधिक चाहने” की इच्छा से आरंभ होते हैं, इसलिए उनकी सीमा धुँधली है। एक ही कर्म संदर्भ के अनुसार लोभ भी लग सकता है और लाभ की उचित खोज भी। उदाहरण के लिए, कंपनी का लाभ अधिकतम करना आर्थिक दृष्टि से सामान्य गतिविधि है, पर यदि वह सामाजिक उत्तरदायित्व की उपेक्षा करे, तो उसकी आलोचना लोभ के रूप में होती है। लोभ और लाभ की खोज का भेद निरपेक्ष नहीं, बल्कि सामाजिक मानदंडों और मूल्यों के अनुसार बदलता है। अर्थात वह नैतिकता के क्षेत्र में आता है।

लाभ की खोज, कंपनी की गतिविधि के सार के रूप में, उचित आर्थिक आचरण मानी जाती है। कंपनी का मूल उद्देश्य अपने शेयरधारकों और हितधारकों के लिए लाभ अधिकतम करना है। पर जब वह लोभ बन जाए, तो उसे रोकना होगा। पर लोभ नैतिक और नीतिपरक अवधारणा है, जिसकी कोई स्पष्ट क़ानूनी परिभाषा नहीं। इसलिए केवल इस आधार पर कि कोई “लोभी” है, न्यायालय में दंड या प्रतिबंध देना कठिन है। क़ानून मुख्यतः अवैध कृत्यों (दाम-निर्धारण की साँठगाँठ, एकाधिकार का दुरुपयोग, धोखाधड़ी, अनुचित व्यापार आदि) का नियमन करता है, “लोभ” नामक प्रेरणा का सीधे नहीं। क़ानूनी रूप से “लोभ” को अलग से परिभाषित नहीं किया जा सकता, और प्रतिबंध तभी संभव है जब कोई अवैध परिणाम हो जाए। पर सामाजिक और नैतिक स्तर पर, जब कोई कंपनी साधारण लाभ की खोज से आगे बढ़कर “लोभ” दिखाती है, तो आलोचना और नियमन की माँग बढ़ती है। नैतिक स्तर पर लाभ की खोज और लोभ में भेद किया जा सकता है। स्वामित्व और प्रभुत्व की अंतहीन इच्छा की अभिव्यक्ति से लोकहित का क्षतिग्रस्त होना लोभ का प्रतिरूप है। इसलिए लोभ को क़ानून अवैध परिणाम होने के बाद दंडित करता है। उससे पहले मानव-समाज “नैतिकता” पर निर्भर रहता है।

क़ानून के शासन को अपना ढाँचा बनाने वाली पश्चिमी सभ्यता क़ानून को मनुष्य के आचरण का सबसे महत्त्वपूर्ण संदर्भ-बिंदु मानती है। पश्चिम से बहुत प्रभावित कोरिया में भी “क़ानून के शासन” का आग्रह करना एक फ़ैशन-सा बन गया है। पर क़ानून के शासन से कम महत्त्वपूर्ण नैतिकता नहीं। यह समझना होगा कि पूर्वी सभ्यता नैतिकता को क़ानून से अधिक महत्त्व क्यों देती है। कारण यह है कि पश्चिम का निजी हित और लोकहित के अभिसरण का सिद्धांत मानता है कि सब कुछ क़ानून से सुलझाया जा सकता है, जबकि पूर्व का निजी हित और लोकहित के टकराव का सिद्धांत मानता है कि नैतिकता पर बल देने से ही सामाजिक व्यवस्था बनी रहती है। पश्चिम मानता है कि मानव-स्वभाव के स्वार्थ और परोपकार की अभिव्यक्ति में अंततः परोपकार “अपने-आप जीत” जाता है; पूर्व मानता है कि प्रबल स्वार्थ का नैतिकता और क़ानून से प्रबंधन करने पर ही दुर्बल परोपकार प्रबल स्वार्थ के साथ “संतुलन” बना सकता है।

पूर्व और पश्चिम की क़ानून और नैतिकता की ये परंपराएँ निरपेक्ष नहीं हैं। अर्थात उन्हें यह निरपेक्षता नहीं दी जा सकती कि मेरी सही है और तुम्हारी ग़लत। उन्हें हर क्षेत्र की भू-राजनीतिक विशेषता का प्रतिबिंब मानना अधिक प्रासंगिक है। पूर्वी एशिया में दाओवादी और कन्फ़्यूशियसवादी यह आदर्श नैतिक चेतना के रूप में सामने आया कि नेता “सद्गुण (德)” और “नैतिक वैधता” से युक्त व्यक्ति होना चाहिए। धन को निजी इच्छा से जुड़ा और सार्वजनिक नेतृत्व के विरुद्ध माना जाता था। यह धारणा थी कि “धनी लोग राजनीति में भाग लें, तो निजी हित साधते हैं”। नेता के सद्गुणों के रूप में राजा सादगी और ईमानदारी को महत्त्व देते थे, और अत्यधिक धन उलटे अविश्वास जगाता था। धन और मानव-स्वभाव के संबंध को सिमा चियान इतिहासकार के अभिलेख में स्पष्ट करते हैं (इतिहासकार के अभिलेख 129:29): “सामान्यतः जब किसी दूसरे की संपत्ति अपनी से दस गुनी हो, तो लोग उसकी निंदा करते हैं; सौ गुनी हो, तो उससे डरते हैं; हज़ार गुनी हो, तो उसका काम करते हैं; और दस हज़ार गुनी हो, तो उसके दास बन जाते हैं। यही सब वस्तुओं का नियम है।” पश्चिम में भी यह कथन अक्सर दोहराया जाता है: “हर बड़ी संपत्ति के पीछे एक अपराध छिपा होता है” (Behind every fortune there is a crime)।494

पश्चिम में विजय की संस्कृति की भू-राजनीतिक परंपरा के कारण यूनानी-रोमन काल से ही अभिजात और धनी वर्ग प्रायः राजनीतिक सत्ता पर एकाधिकार रखते थे। धन ही सत्ता का आधार था। मध्य युग के बाद भी सामंतों, व्यापारी-पूँजीपतियों, बैंकरों जैसे धनी वर्गों का राजनीतिक प्रभाव डालना स्वाभाविक रूप से स्वीकार किया जाता रहा। आधुनिक लोकतंत्र के युग में भी पूँजीवाद के विकास के साथ यह यथार्थ संस्थागत हो गया कि “धन और सत्ता अलग नहीं होते”। पश्चिम में राजनीतिक नेता बड़े संपत्तिधारियों और कंपनियों के समर्थन पर बहुत निर्भर होते हैं। परस्पर सहयोग की भावना से नेता उनके हितों को क़ानून से सहारा देते हैं। राजनीतिक-आर्थिक दर्शन में रिसाव-प्रभाव (trickle-down) का सिद्धांत धन और सत्ता के गठजोड़ की रक्षा करने लगता है।

पूर्व की नैतिकता और पश्चिम का क़ानून पूर्व और पश्चिम की राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्थाओं के ढाँचे हैं। पर पूर्व ने नैतिकता को आगे रखते हुए भी ऐसी व्यवस्था खड़ी की जो नैतिकता और क़ानून, दोनों का उचित ढंग से साथ-साथ उपयोग करती है। शुनज़ी ने ईसा पूर्व में ही समझाया था कि मानव-स्वभाव का प्रबंधन “नैतिकता और क़ानून” से करने पर ही सामाजिक व्यवस्था बनी रहती है। पूर्व का यह समन्वयवाद (syncretism) पूर्वी सभ्यता में “बाहर कन्फ़्यूशियसवादी, भीतर विधिवादी” (外儒內法), जो नैतिकता को आगे रखकर क़ानून से उसकी पूर्ति करता है, या हुआंग-लाओ विचार (黃老思想), जो अकर्म को आगे रखकर क़ानून से उसकी पूर्ति करता है, के रूप में प्रकट होता है। पर पश्चिम प्रकाशित धर्म, तत्त्वमीमांसा, विचारधारा आदि के प्रभाव में क़ानून पर अत्यधिक निर्भर रहता है और नैतिकता में, विशेषकर राजनीतिक अर्थशास्त्र के स्तर पर, लगभग कोई रुचि नहीं लेता। मानव-समाज में बहुत-सी ऐसी समस्याएँ हैं जिन्हें क़ानून के शासन से सुलझाना कठिन है। नैतिकता को बीच में आना होगा।

कन्फ़्यूशियस और यीशु, दोनों ने क़ानून तक जाने से पहले नैतिकता से समाधान को प्राथमिकता दी। कहा जा सकता है कि दोनों विचारक क़ानून को अंतिम उपाय मानते थे, और मानते थे कि मानव-समाज को पहले नैतिक सहमति और नैतिक आचरण से समस्याएँ सुलझानी चाहिए। “क़ानून से पहले नैतिकता” का विचार इसलिए है कि यदि समाज केवल क़ानून से चलाया जाए, तो केवल बाध्यता और दंड बचते हैं, और मनुष्य की स्वैच्छिक नैतिकता लुप्त हो जाती है। यह पूरे समाज को ऐसी संरचना में ले जाता है जो समस्याओं को और कठिन बना देती है।

राजनीतिक अर्थशास्त्र के मामले में लाभ की खोज क़ानून से सुनिश्चित की जाती है, और लोभ पर नैतिकता से अंकुश लगाया जाता है। एडम स्मिथ का अदृश्य हाथ का सिद्धांत मनुष्य की आर्थिक गतिविधि को नैतिकता से मुक्त करने की भूमिका निभाने लगता है। लोभ ज्यों का त्यों बचा रहता है। अदृश्य हाथ का सिद्धांत अंततः व्यवसाय-जगत और संसद के गठजोड़ से ध्रुवीकरण लाता है। क्योंकि व्यवसाय-जगत और नेता एक ही नाव में सवार हैं। पर पूर्व के हड़पने वाले हाथ के सिद्धांत के अनुसार नेता का पहला दायित्व ध्रुवीकरण को रोकने का नैतिक उत्तरदायित्व है। अर्थात उसे ध्रुवीकरण के बजाय मध्यवर्ग की रक्षा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। पूर्व के इतिहास में भी जब राजा ध्रुवीकरण में शामिल होकर धन का आनंद लेता, तो वह राजवंश गिर जाता और उसका स्थान लेने के लिए नया राजवंश उभरता। नया राजवंश करों में भारी कटौती के उपायों से ध्रुवीकरण को मिटाने पर ध्यान केंद्रित करके आरंभ करता था।

मनुष्य के स्वार्थ का प्रबंधन: पश्चिम के अदृश्य हाथ और पूर्व के हड़पने वाले हाथ, इन दो दार्शनिक व्यवस्थाओं में से वही अपनी वैधता सिद्ध करती है जो मध्यवर्ग को जन्म देती और उसकी रक्षा करती है। राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था कितनी भी बड़ी हो जाए, जिस देश में अमीर-गरीब की खाई बढ़ती रहे, वह ठीक से काम नहीं कर सकता। मध्यवर्ग सुदृढ़ हो, तभी राज्य अपनी पूरी कुशलता दिखा सकता है। पर पश्चिमी राजनीतिक अर्थशास्त्र धनियों को और धनी बनाने का अभ्यस्त है। व्यक्तिवाद पर आधारित अदृश्य हाथ धनी बनाता है, और तर्क यह है कि इन धनियों द्वारा रची गई आर्थिक गतिविधि रिसाव-प्रभाव आदि से मध्यवर्ग को जन्म देती है। क्या सचमुच ऐसा है?

पश्चिमी मूल्य दार्शनिक रूप से व्यक्ति पर आधारित हैं। पश्चिमी लोगों के लिए धर्म, तत्त्वमीमांसीय सत्य, क़ानून आदि दूसरों के साथ संबंधों से पहले आते हैं। पर इन साधनों में निहित मूल्य महत्त्वपूर्ण होते हुए भी ध्यान रखना होगा कि इन साधनों का उपयोग करके दूसरों पर प्रभुत्व जमाने और स्वयं को बड़ा करने की इच्छा भी काम कर सकती है। राजनीतिक-आर्थिक दृष्टि से विश्लेषण करें, तो पश्चिमी संसदों द्वारा बनाए बहुत-से क़ानून बहुत-सी ख़ूबियाँ आगे रखते हुए भी अंततः कबीलावाद की संपदा बढ़ाकर अमीर-गरीब की खाई चौड़ी करने का परिणाम भी देते हैं। धनी और धनी होते हैं, और मध्यवर्ग सिकुड़ता और कमज़ोर होता जाता है।

कहा जा सकता है कि पश्चिमी राजनीतिक अर्थशास्त्र दार्शनिक पक्ष से व्यक्तिवादी स्वार्थ के सामने वैचारिक रूप से निहत्था है। क्योंकि बाज़ार-अर्थव्यवस्था की दिशा व्यक्तिगत स्वार्थ को खुली छूट देने की ओर तय की गई है। इसका कारण, जैसा हमने कई बार देखा, यह है कि एडम स्मिथ के बाज़ार-अर्थव्यवस्था के दर्शन के अनुसार व्यक्तिगत स्वार्थ को खुली छूट दी जाती है और उसके लिए कोई नैतिक उपचार नहीं सुझाया जाता। निस्संदेह ईसाई धर्म मूल पाप की चेतना से मानव-स्वभाव पर प्रश्न उठाता है, और सुसमाचार स्पष्ट रूप से भौतिक धन के प्रति सावधान करते और नैतिक स्तर पर उस पर प्रश्न उठाते हैं। पर लगता है पश्चिम के अधिकांश आधुनिक राजनीतिक-आर्थिक विचारकों ने माना कि नैतिकता का राजनीतिक-आर्थिक चिंतन या व्यक्तिवादी स्वार्थ से कोई संबंध नहीं। क्योंकि वे, एडम स्मिथ की तरह, शुभ-स्वभाव सिद्धांत वाले मानव-स्वभाव से आरंभ करते हैं।

इसके विपरीत पूर्व के कन्फ़्यूशियसवाद और दाओवाद का केंद्र मानव-स्वभाव और स्वार्थ के प्रति नैतिक स्तर पर सतर्कता और उनका प्रबंधन है। स्वार्थ के प्रति पश्चिमी राजनीतिक-आर्थिक चिंतन की खुली छूट या प्रोत्साहन की स्थिति और पूर्वी राजनीतिक-आर्थिक चिंतन की सतर्कता या प्रबंधन की स्थिति में स्पष्ट अंतर है। मानव-स्वभाव का सबसे प्रबल अंश स्वार्थ है। नेता को इस स्वार्थ का सार समझना चाहिए। “स्वार्थ की इच्छा से मुक्त होकर दाओ का स्रोत देखा जा सकता है। स्वार्थ की इच्छा में रहकर केवल दाओ की अभिव्यक्तियाँ दिखती हैं” (दाओ दे जिंग, अध्याय 1)। शुनज़ी मानव-स्वभाव के प्रति सतर्कता के द्वारा नेताओं और प्रजा के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने का आरंभ-बिंदु स्पष्ट करते हैं: “मानव-स्वभाव लाभ और सुख का लालची है; उसके पीछे चलने से टकराव होता है और विनय लुप्त हो जाता है। केवल मानव-स्वभाव के पीछे चलने से मनुष्य आसानी से ईर्ष्या और घृणा में डूब जाता है, और निष्ठा और विश्वास लुप्त हो जाते हैं” (शुनज़ी 23:1)। शुनज़ी विशेष रूप से स्पष्ट करते हैं कि स्वार्थ को खुली छूट देने से समाज अस्त-व्यस्त हो जाता है: “यदि मानव-स्वभाव को उसके हाल पर छोड़ दिया जाए और हर कोई केवल अपनी भावनाओं के अनुसार जिए, तो लोग लड़ाई और छीना-झपटी में लग जाते हैं, सामाजिक व्यवस्था लुप्त हो जाती है और संसार अराजक हो जाता है” (शुनज़ी 23:1)।

पश्चिम में व्यक्तिवादी स्वार्थ को नैतिकता से नियंत्रित नहीं किया जाता, इसलिए यह तर्क लागू होता है कि “जो कुछ क़ानून द्वारा वर्जित नहीं, वह सब उचित रूप से अनुमत है”। परिणाम यह है कि पश्चिमी बाज़ार-अर्थव्यवस्था में व्यक्तिवादी स्वार्थ और भी सक्रियता से काम करता है। पूरे कन्फ़्यूशियसवादी चिंतन को सामाजिक जीवन के लिए मनुष्य को आवश्यक नैतिकता की व्याख्या और उसे आत्मसात करने के लिए आत्म-साधना माना जा सकता है; और दाओवाद भी बार-बार नैतिकता और नीति के महत्त्व पर बल देता है। इसीलिए पूर्व और पश्चिम की सभ्यताएँ मानव-स्वभाव के लिए बहुत भिन्न उपचार सुझाती हैं। विशेष रूप से राजनीतिक अर्थशास्त्र के संबंध में पश्चिमी चिंतन क़ानून पर निर्भर रहते हुए नैतिकता को मूलतः बाहर रखता है, जबकि दाओवाद और कन्फ़्यूशियसवाद पर आधारित पूर्वी चिंतन में क़ानून से अधिक नैतिकता केंद्र में है। संवाद ठीक यही समझाता है कि क़ानून से पहले नैतिकता बनी रहनी चाहिए: “प्रजा पर क़ानूनों से शासन करो और दंडों से उसे व्यवस्था में रखो, तो वह उनसे बच निकलेगी और उसे लज्जा नहीं होगी; उस पर सद्गुण से शासन करो और रीति से उसे व्यवस्था में रखो, तो उसमें लज्जा का बोध होगा और वह स्वयं को सुधारेगी” (संवाद 2:3)।

पश्चिम में आज भी राजनीतिक अर्थशास्त्र की चर्चा में क़ानून पर ही ध्यान केंद्रित होता है। अधिकांश मामलों में नैतिकता बाहर रहती है। इसके विपरीत पूर्व में परिश्रम, मितव्ययिता और निर्लोभता जैसी नैतिकता राजनीतिक अर्थशास्त्र के केंद्र में स्थापित है। पूर्वी राजनीतिक अर्थशास्त्र की कार्य-नैतिकता स्वार्थ के प्रति सतर्कता से आती है। सामाजिक जीवन में मनुष्य को शिक्षा और आत्म-साधना से परिश्रम और मितव्ययिता की खोज करनी चाहिए, और स्वार्थ की अभिव्यक्ति में लोभ के बजाय करुणा और विनम्रता आत्मसात करनी चाहिए। “दाओ को समझने वाला नेता लोभ से मुक्त है। वह दुर्लभ वस्तुओं को मूल्यवान नहीं मानता” (दाओ दे जिंग, अध्याय 64)। ऐसा नेता मानता है कि “मनुष्यों पर शासन करने और आकाश की सेवा करने में मितव्ययिता से अच्छा कुछ नहीं। मितव्ययी होना जल्दी ही दाओ का अनुसरण करना है” (दाओ दे जिंग, अध्याय 59)। मनुष्यों से व्यवहार में नेता तीन बातों को महत्त्व देता है: “तीन रत्न सँजोकर रखो। पहला करुणा, दूसरा मितव्ययिता, तीसरा विनम्रता” (दाओ दे जिंग, अध्याय 67)। दाओवाद नेता के उदाहरण को सबसे अधिक महत्त्व देता है। यदि नेता धन का आनंद ले और उस पर गर्व करे, तो उस देश की प्रजा परिश्रम और मितव्ययिता की भावना छोड़ देती है।

मानव-स्वभाव और परिश्रम-मितव्ययिता की नैतिक संस्कृति

नैतिकता पर केंद्रित पूर्व की सभ्यता संयोग से नहीं उपजी। न उसे किसी नीतिगत निर्णय या संकल्प से गढ़ा जा सकता है। वह इतिहास और परंपरा में रची-बसी है। पूर्व और पश्चिम का अंतर दार्शनिक चिंतन में पूर्व के संबंधवाद और पश्चिम के व्यक्तिवाद की अवधारणाओं के अंतर से उपजता है। प्रबल स्वार्थ और दुर्बल परोपकार लेकर जन्मने वाले मानव-स्वभाव में परिश्रम और मितव्ययिता की नैतिक संस्कृति को आगे रखने पर ही सामाजिक व्यवस्था बनी रहती है। पूर्व की नैतिक संस्कृति की दार्शनिक पृष्ठभूमि पश्चिम से भिन्न है। मैक्स वेबर (1864-1920) ने 1904 में प्रकाशित अपनी कृति प्रोटेस्टेंट नीतिशास्त्र और पूँजीवाद की भावना (The Protestant Ethic and the Spirit of Capitalism) में प्रोटेस्टेंट कार्य-नैतिकता की व्याख्या की। उन्होंने प्रोटेस्टेंट कार्य-नैतिकता को पूँजीवाद का आध्यात्मिक स्तंभ मानकर उसकी बहुत प्रशंसा की। पर वेबर की कार्य-नैतिकता अपने मूल में पूर्व की कार्य-नैतिकता से बहुत भिन्न है।

प्रोटेस्टेंट कार्य-नैतिकता: यह माना जाता था कि सोलहवीं शताब्दी के पश्चिमी धर्म-सुधार के बाद उपजा प्रोटेस्टेंटों का “परिश्रम और मितव्ययिता का रवैया” व्यक्ति में इस बात के प्रमाण के रूप में प्रकट होता है कि उसे ईश्वर का आशीर्वाद (grace) मिला है, जो स्वर्ग जाने की शर्त थी। इसलिए हर कोई धार्मिक उत्साह से “परिश्रम और मितव्ययिता का रवैया” अपनाने लगा।495 और तर्क यह है कि परिश्रम और मितव्ययिता की इस भावना ने पूँजी के संचय और निवेश की वृद्धि तक पहुँचकर पश्चिमी पूँजीवाद को संभव बनाया। लगता है इस विचार का मध्य युग से आधुनिक काल के आरंभ तक चले पश्चिम के युगांत-सिद्धांत से गहरा संबंध है। चूँकि माना जाता था कि संसार के अंत और यीशु के पुनरागमन पर केवल आशीर्वाद-प्राप्त लोग ही उद्धार पाएँगे, इसलिए बहुत संभव है कि लोग परिश्रम के प्रमाण दिखाना चाहते थे।

पर आज पश्चिम में भी बहुत कम लोग धार्मिक अर्थ में संसार के अंत में गंभीरता से विश्वास करते हैं। तब प्यूरिटन कार्य-नैतिकता लुप्त हो जाती है। क्योंकि इस विश्वास का आधार ही मिट जाता है कि परिश्रम करने वाले ईश्वर का आशीर्वाद पाकर स्वर्ग जाते हैं। समय की दृष्टि से यह परिवर्तन एडम स्मिथ को आचार्य मानने वाले आधुनिक अर्थशास्त्र द्वारा स्वार्थ को दी गई खुली छूट के साथ हुआ, जिससे पूर्व से भिन्न पश्चिम में उपभोग-संस्कृति के साथ “जब भी संभव हो, तुरंत सुख भोगने” (instant gratification) का रवैया उभरा। नियाल फ़र्ग्युसन (Niall Ferguson) अपनी 2011 की पुस्तक सिविलाइज़ेशन: द वेस्ट एंड द रेस्ट (Civilization: The West and the Rest) में ठीक पश्चिम में कार्य-नैतिकता और धार्मिकता के सह-संबंध को समझाते हैं। अर्थात वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यूरोप की कार्य-नैतिकता अमेरिका से कहीं कमज़ोर है, और यूरोपीय लोग अमेरिकियों से कम धार्मिक भी हैं। वे आँकड़े प्रस्तुत करते हैं कि अमेरिकी यूरोपीयों से लगभग 20% अधिक काम करते हैं, और गिरजाघर जाने की दर यूरोपीयों में लगभग 10% है जबकि अमेरिकियों में 36%। 496

इसके विपरीत पूर्व की कन्फ़्यूशियसवादी कार्य-नैतिकता अपने लिए होती है, इसलिए वह धार्मिक सिद्धांतों के परिवर्तन या संसार के अंत के सिद्धांतों की नियति से निरपेक्ष, भीतरी आवश्यकता से आचरित होती है; इसलिए माना जा सकता है कि उसका आधार दृढ़ है। द इकोनॉमिस्ट एशियाई मूल्यों के रूप में “शिक्षा, परिश्रम, बचत, और भविष्य की बड़ी उपलब्धि के लिए वर्तमान सुख को टालने की प्रवृत्ति” को गिनाता है। 497 फ़र्ग्युसन भी ऊपर बताई पुस्तक में, यूरोपीय, अमेरिकी और पूर्वी लोगों में अमेरिकियों को आधार मानकर, बताते हैं कि यूरोपीय लोग अमेरिकियों से लगभग 20% कम और पूर्वी लोग लगभग 30% अधिक काम करते हैं, और पूर्व की कार्य-चेतना को सबसे प्रबल बताते हैं।

कार्य-नैतिकता में राजनीतिक अर्थशास्त्र को सबसे सीधे प्रभावित करने वाली चीज़ परिश्रम और मितव्ययिता है: कोई कितना परिश्रम करता है और कितनी बचत करता है। इस बात में पूर्व की कार्य-चेतना व्यक्तियों, कबीलों और राज्य, तीनों पर लागू होती है, और पश्चिम की तुलना में बहुत ऊँची निवेश और बचत-दरें दिखाती है। फ़र्ग्युसन अपनी पुस्तक में पश्चिम के बहुत ऊँचे सरकारी ऋण और उसकी समस्याओं की तुलना करते हैं। अमेरिकी आर्थिक पत्रकार और लेखक पॉल ब्लूस्टीन (Paul Blustein) रेखांकित करते हैं कि अमेरिका मनचाहे ढंग से छाप सकने वाले डॉलरों से विदेशी वस्तुएँ ख़रीदता जा रहा है, और यह ज्यों का त्यों अमेरिका के ऋण के रूप में जमा होता जा रहा है। 498 फ़र्ग्युसन ने पाया कि अमेरिका का ऋण 2001 में सकल घरेलू उत्पाद का 32% था, जो 2011 में उछलकर 66% हो गया, और पूर्वानुमान किया कि वर्तमान गति जारी रही, तो वह 2021 में 90%, 2031 में 150% और 2047 में 300% तक पहुँच जाएगा। अमेरिका के मामले में समस्या और गंभीर इसलिए है कि इस भारी सरकारी ऋण में लगभग 100 ट्रिलियन डॉलर के स्वास्थ्य-बीमा, सामाजिक सुरक्षा और पेंशन के दायित्व शामिल नहीं हैं; इसलिए अमेरिका के सार्वजनिक वित्त की स्थिति बहुत गंभीर है। उनका निदान है कि यह उस समय के यूनान से भी बुरी स्थिति में है जब यूनान संकट में फँसा था।499

बजट-घाटा और व्यापार-घाटा एक साथ होने की स्थिति, तथाकथित जुड़वाँ घाटा (twin deficit), किसी देश के लिए असहनीय आर्थिक संकट भड़काती है। केवल अमेरिका जैसे आरक्षित मुद्रा वाले देश अपवाद हैं, क्योंकि वे मुद्रा छापते रह सकते हैं। यही कारण है कि अमेरिका जुड़वाँ घाटे को जारी रखते हुए भी अपनी शक्ति बनाए हुए है। यह स्थिति कब तक चल सकती है?

प्रबोधन-काल के पश्चिमी विचारकों को सबसे अधिक आश्चर्य और समझने में कठिनाई इस बात से हुई कि पूर्वी सभ्यता के पास ईश्वर की अवधारणा के बिना एक उत्कृष्ट नैतिक व्यवस्था थी। व्यक्तिवादी स्वार्थ के मामले में पश्चिम की खुली छूट ने पश्चिम की उपभोग-और-ऋण की संस्कृति को जन्म दिया, और व्यक्तिवादी स्वार्थ के प्रबंधन और संयम के पूर्वी विचार ने पूर्व की परिश्रम-मितव्ययिता की संस्कृति को। पूर्व अपनी सभ्यता के आधार, नैतिकता, में पश्चिम की राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था की तुलना में मूल आधारों में शक्ति रखता है। यह कार्य-नैतिकता की चेतना के रूप में प्रकट होती है। पूर्व के पास जड़ से पश्चिम से अधिक प्रबल प्रतिस्पर्धा-क्षमता और उज्ज्वल भविष्य होने का कारण ठीक यही कार्य-नैतिकता की चेतना है। यही कारण है कि राजनीतिक अर्थशास्त्र में नैतिकता महत्त्वपूर्ण है। परिश्रम-मितव्ययिता या उदाहरण प्रस्तुत करना क़ानून से तय नहीं किया जा सकता। यह नैतिकता का अधिकार-क्षेत्र है।

इस कार्य-नैतिकता की जड़ें गहरी हैं। ऊपर देखे गए फ़्रांसीसी प्रकृतितंत्रवादी विचारकों में से एक, प्वाव्र (Poivre), ने अठारहवीं शताब्दी के मध्य में पूर्व की यात्रा की और पूर्व की कार्य-नैतिकता के बारे में यह लिखा:

आलसी लोग अत्यंत कठोर तिरस्कार के पात्र थे। निठल्ले को ऐसा सदस्य माना जाता था जो समाज का अंग होते हुए भी परजीवी की तरह उसे खोखला करता है। सरकार भी ऐसे निठल्लों को चैन से नहीं रहने देती थी… परंपरा से हर किसी से काम करने की अपेक्षा थी, और प्रजा में यह विचार गहराई और व्यापकता से फैला था कि यदि देश के एक कोने में कोई काम न करे, तो दूसरे कोने में उसके कारण कोई भूखा रहेगा और कष्ट पाएगा।500

अठारहवीं शताब्दी में प्वाव्र ने पूर्व में जो गहरी जड़ों वाली कार्य-नैतिकता पाई और सराही, वह नैतिकता पर बल देने वाली पूर्व की शिक्षा, संयम और आत्म-साधना को महत्त्व देती है। इसलिए पूर्व में शिक्षा के महत्त्व पर बहुत पहले से बल दिया गया। कन्फ़्यूशियस ने बल दिया: “स्वभाव से मनुष्य एक-दूसरे के निकट हैं; शिक्षा से वे बहुत दूर हो जाते हैं”, और “शिक्षा में किसी के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए”। मानव-स्वभाव पर आधारित पूर्व की शिक्षा परिश्रम-मितव्ययिता की नैतिक संस्कृति और नेताओं के निर्माण पर केंद्रित है।

पूर्व की आध्यात्मिक संस्कृति में, यानी कन्फ़्यूशियसवाद (शिक्षा को महत्त्व देने और योग्यतावाद की परंपरा, सार्वभौमिक नैतिकता और परिश्रम-मितव्ययिता की संस्कृति), दाओवाद (कम कर और छोटी सरकार का राजनीतिक-आर्थिक चिंतन, प्रकृति और मनुष्य का सामंजस्य) और बौद्ध धर्म (करुणा का विचार, अपरिग्रह को महत्त्व) आदि में अंतर्निहित मूल्य-व्यवस्था का केंद्र वे नैतिक मूल्य हैं जिनकी पश्चिमी दर्शन उपेक्षा करता है। एक शब्द में, वह परिश्रम और मितव्ययिता है। शिक्षा द्वारा बल दी जाने वाली कार्य-चेतना क़ानून का नहीं, नैतिकता का प्रश्न है। नैतिकता जिस पर आग्रह करती है, वह ठीक लोभ के प्रति सतर्कता है। लाभ की खोज और लोभ के भेद तक नैतिकता से पहुँचा जा सकता है। और ऐसी नैतिक चेतना तब तक समाज में जड़ नहीं पकड़ सकती जब तक नेता उदाहरण प्रस्तुत न करे।

नेता द्वारा उदाहरण: जुनज़ी (君子) और ज्ञानी (聖人) का विचार

पूर्वी सभ्यता इस पर केंद्रित है कि नेताओं को कैसे तैयार किया जाए और उनसे देश पर शासन कैसे करवाया जाए। दाओवाद का ज्ञानी का विचार कन्फ़्यूशियसवाद के जुनज़ी (君子) के विचार से मिलता-जुलता है। कन्फ़्यूशियसवाद का जुनज़ी का विचार नैतिक साधना और सामाजिक उत्तरदायित्व पूरा करने वाले नैतिक मनुष्य पर बल देता है, और दाओवाद का ज्ञानी का विचार उस आदर्श मनुष्य को प्रस्तुत करता है जो प्रकृति से एक होकर अकर्म के द्वारा सहजता को साकार करता है। पर दोनों नेता को ही सूचित करते हैं। पूर्वी चिंतन कन्फ़्यूशियसवाद के नेता और सहभागी (शियाओरेन, 小人), और दाओवाद के ज्ञानी और जनता की तुलना के द्वारा उस नेता की भूमिका पर बल देता है जो लोगों से सहभागी या सामान्य जनता, यानी भीड़, के बजाय नेता या ज्ञानी का अनुसरण करवाता है। राजनीतिक-आर्थिक पक्ष से नेता की नैतिक भूमिका को महत्त्व देने का पक्ष पूर्व की शिक्षा में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।

नेता की नैतिक भूमिका पर विशेष बल नेता और सहभागी की तुलना करने वाली संबंधवाद (relationalism) की व्यवस्था में दिया जाता है। पश्चिम शिक्षा और मनुष्य की साधना में व्यक्तिवाद (individualism) का अनुसरण करते हुए व्यक्तिगत पूर्णता पर बल देता है। प्राचीन यूनान में भी, जैसा प्लेटो और अरस्तू में दिखता है, शिक्षा के महत्त्व पर बल दिया गया, पर शिक्षा का बल व्यक्ति द्वारा ज्ञान-अर्जन, सुख की खोज आदि पर था। अरस्तू का नीतिशास्त्र न्याय, साहस, संयम, उदारता और मध्यम मार्ग के सिद्धांत जैसे सद्गुणों पर बल तो देता है, पर वह तार्किक रूप से यह समझाता है कि ये नैतिक मूल्य व्यक्तिगत सुख कैसे लाते हैं; उसका बल इस पर नहीं कि ये नैतिक मूल्य शिक्षा से कैसे विकसित हों और समाज में योगदान दें। सत्रहवीं शताब्दी में पश्चिम में प्रकाशित स्पिनोज़ा का नीतिशास्त्र (ethics) भी कन्फ़्यूशियसवाद के संवाद या दाओवाद के दाओ दे जिंग की तरह परिश्रम-मितव्ययिता और समाज-सेवा पर केंद्रित व्यक्तिगत सद्गुण के विकास और शिक्षा को उद्देश्य नहीं बनाता, बल्कि ईश्वर के स्वरूप और मानव-स्वभाव की पड़ताल के द्वारा “स्वतंत्र मनुष्य” (free man) को लक्ष्य बनाता है। इसके विपरीत पूर्व की दार्शनिक व्यवस्था का उद्देश्य वस्तुओं का “सार” उजागर करना नहीं, बल्कि “आचरण” है। वह अच्छे नेता गढ़ने पर केंद्रित है।

न सुनना सुनने से कम है, सुनना देखने से कम है, देखना जानने से कम है, और जानना करने से कम है। विद्या का लक्ष्य आचरण में है। (शुनज़ी 8:9)

प्रत्येक व्यक्ति के सद्गुणों के विकास पर शिक्षा का बल देने वाला विचार पश्चिम में लॉक से शुरू होता है। ईसा पूर्व पाँचवीं शताब्दी में स्थापित यह पूर्वी शिक्षा-दर्शन पश्चिम में दो हज़ार वर्ष बाद पहली बार लॉक (1632–1704) द्वारा व्यक्त हुआ: “जितने मनुष्यों से हम मिलते हैं, उनमें से दस में से नौ जो कुछ हैं, अच्छे या बुरे, उपयोगी या अनुपयोगी, अपनी शिक्षा के कारण हैं।” और कन्फ़्यूशियस की तरह वे भी मानते थे कि “सभी मनुष्य समान जन्म लेते हैं”।501 पर पूर्वी शिक्षा-दर्शन और लॉक के शिक्षा-दर्शन में एक महत्त्वपूर्ण अंतर है। पश्चिमी चिंतक के रूप में पश्चिमी दर्शन से बँधे रहकर उन्होंने सहज वृत्ति के महत्त्व को कम आँका, और यहीं उनके मानव-स्वभाव के सिद्धांत की सीमा प्रकट होती है। लॉक की शिक्षा की समस्या यह है कि वह सहज वृत्ति की भूमिका को स्वीकार नहीं करती। मनुष्य समान हैं और शिक्षा महत्त्वपूर्ण है, पर मानव-स्वभाव के सिद्धांत में उन्होंने मन की संभावनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर आँका और माना कि मन सहज वृत्ति की सीमाओं को लाँघ जाता है। क्योंकि लॉक जिस स्वतंत्रता जैसे मूल्य को महत्त्व देते थे, वह आत्म-रक्षा की सहज वृत्ति से ऊपर नहीं ठहर सकता। मन मनुष्य को जो स्वतंत्रता देता है, वह बहुत महत्त्वपूर्ण है। पर स्वतंत्रता अस्तित्व-रक्षा के सहज वृत्ति वाले सिद्धांत को लाँघ नहीं सकती।

पूर्वी सभ्यता में आशय यह है कि स्वार्थ का प्रबंधन और उससे सावधानी नैतिकता के स्तर पर हो। अंततः लोभ और लाभ की खोज के बीच की सीमा, जिसे क़ानून या नियमों से तय नहीं किया जा सकता, उसे नैतिक रूप से सुलझाने वाला उत्तर ही पूर्व के नेता के विचार और अकर्म के विचार का सार है। पूर्वी सभ्यता ने ये अत्यंत उपयोगी अवधारणाएँ 2,500 वर्ष पहले स्थापित कीं और उनका उपयोग करती आ रही है। जुनज़ी ठीक वांछनीय नेता की छवि है: ऐसा नेता जो जनता के हित को अपने हित में उन्नत कर लेता है, जो निजी स्वार्थ से मुक्त है। इसके विपरीत सहभागी अधिकांश मनुष्यों का सूचक है: ऐसा व्यक्ति जो जहाँ भी हो, अपने स्वार्थ को आगे रखता है। वह नेतृत्व के योग्य नहीं, पर इतिहास दिखाता है कि बहुत बार सहभागी नेतृत्व के पदों पर रहे हैं। पूर्व में जुनज़ी और ज्ञानी के रूप में चित्रित नैतिक नेता की छवि आधुनिक राजनीतिक अर्थशास्त्र में बड़ा योगदान दे सकती है। नेता का सर्वश्रेष्ठ गुण धन नहीं, नैतिकता बन जाता है।

नेता न्याय का विचार करता है; सहभागी लाभ का विचार करता है। (संवाद 4:16)

नेता सद्गुण को हृदय में रखता है; सहभागी संपत्ति को हृदय में रखता है। (संवाद 4:11)

नेता का विचार और अकर्म का विचार परस्पर जुड़े हैं। इन्होंने पूर्वी सभ्यता में ऐसा राजनीतिक-आर्थिक दर्शन रोपा जो मनुष्य के कर्म में कृत्रिम अंश को न्यूनतम करना चाहता है। वह विशेष रूप से नेता के हस्तक्षेप के विरुद्ध चेताता है। दाओ दे जिंग का यह कथन कि “नेता की अपनी कोई योजना नहीं होती, वह जनता की योजना को अपनी योजना बनाता है” (दाओ दे जिंग 49) नेता के स्वार्थ के प्रबंधन का उद्देश्य रखता है। इसलिए यह कथन कि “यदि नेता अकर्म से राज्य का संचालन करे, तो जनता स्वयं ही सिद्धि पा लेती है” (दाओ दे जिंग 57) ठीक राज्यवाद नामक स्वार्थ का प्रबंधन है। यह सिमा चियान के इतिहासकार के अभिलेख के इस कथन से मेल खाता है: “राज्य चलाने का सबसे अच्छा उपाय जनता को वह करने देना है जो वह चाहती है… सबसे बुरा है लाभ की खोज में जनता से होड़ करना” (इतिहासकार के अभिलेख 129:1)। ये सभी ईसा पूर्व के काल में पूर्वी राजनीतिक-आर्थिक चिंतन के रूप में स्थापित दर्शन हैं; पश्चिम में ऐसा राजनीतिक-आर्थिक दर्शन पूर्व से दो हज़ार वर्ष बाद, आधुनिक काल के आरंभ में पहली बार प्रकट होता है।

पूर्व हो या पश्चिम, राजनीतिक अर्थशास्त्र में निहित सबसे बड़ी दुविधा लाभ की खोज और लोभ के बीच भेद करना है। लाभ की खोज बाज़ार-अर्थव्यवस्था की प्रेरक शक्ति है। इसके बिना बाज़ार-अर्थव्यवस्था टिक नहीं सकती। साथ ही, लोकहित में बाधा डालने वाले स्वार्थ या लोभ का प्रबंधन निश्चय ही होना चाहिए। पर दोनों के बीच की सीमा को स्पष्ट करना असंभव है। विशेषकर इसे क़ानून या नियमों से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इसीलिए इस क्षेत्र में नैतिकता की भूमिका आती है। महत्त्वपूर्ण है नेता का उदाहरण प्रस्तुत करना। क़ानून कितना भी अच्छा हो, यदि नेता तरह-तरह से उसका उल्लंघन करे, तो क़ानून किसी काम का नहीं। नेता में सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली चीज़ धन का संचय है। यह नैतिक सिद्धांत होना चाहिए कि धनी व्यक्ति कठिनाई से नेता बने, और नेता कठिनाई से धनी बने। क़ानून से तरह-तरह से बचा जा सकता है, पर संपत्ति अवश्य दिखाई दे जाती है, और तब उसे नैतिक रूप से उचित नहीं ठहराया जा सकता।

स्वार्थ के प्रबंधन के संदर्भ में दाओवाद नेता की भूमिका के महत्त्व पर बल देता है। वह समझाता है कि राज्य तभी टिक और विकसित हो सकता है जब नेता परोपकार को राज्य-संचालन का आधार बनाए। नैतिकता प्रबुद्ध स्वार्थ बन जाती है।

ज्ञानी अपने लिए संचय नहीं करता। वह दूसरों पर जितना अधिक व्यय करता है, उतना ही अधिक समेट लेता है।

वह दूसरों को जितना अधिक देता है, उतना ही अधिक पाता है। (दाओ दे जिंग 81)

कन्फ़्यूशियसवाद और दाओवाद दोनों नैतिकता और राजनीति को अविभाज्य रूप से एक मानते हैं, और नैतिक आदर्श को जुनज़ी (君子) और ज्ञानी के रूप में चित्रित करते हैं; इसे इक्कीसवीं शताब्दी पर लागू करें तो जुनज़ी या ज्ञानी ही वांछनीय नेता है। नेता के लिए प्राथमिकता धन नहीं, बल्कि परिश्रम और मितव्ययिता पर खड़ा किया गया उदाहरण होना चाहिए। “नेता सच्ची चीज़ों को संचित करने में तत्पर रहता है। वह धन संचित करने में तत्पर नहीं रहता” (संवाद 15:32)। इसलिए नेता अपनी संपत्ति संचित नहीं करता, बल्कि दूसरों के लिए अपनी क्षमताएँ बाँटने पर ध्यान केंद्रित करता है। “नेता अपने लिए संचय नहीं करता। वह दूसरों पर जितना अधिक व्यय करता है, उतना ही अधिक समेट लेता है। वह दूसरों को जितना अधिक देता है, उतना ही अधिक पाता है” (दाओ दे जिंग 81)।

इस प्रकार पूर्वी नेता के लिए सफलता या विजय से पहले नैतिक मानदंड महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। पूर्व में संबंधवाद ऐसी सभ्यता गढ़ता है जो पश्चिमी सभ्यता के व्यक्तिवाद के स्थान पर काम करती है। नेता परोपकार (प्रबुद्ध स्वार्थ, enlightened self-interest) के साथ-साथ उदाहरण प्रस्तुत करने और ईमानदारी को अपना मानदंड बनाता है। पश्चिम में भी ऐसी नेता-छवि का अभाव नहीं है:

मृत्यु के समय उनकी कुल संपत्ति केवल वह एक घर था जिसमें वे रहते थे… 1953 में सार्वजनिक पद छोड़ने पर उनकी आय केवल 112 डॉलर मासिक की सैनिक पेंशन थी। जब एक बड़ी कंपनी ने उन्हें भारी वेतन वाली नौकरी का प्रस्ताव दिया, तो उन्होंने उत्तर दिया: “आप मुझे नहीं चाहते, आप राष्ट्रपति का पद चाहते हैं, और वह मेरा नहीं, जनता का है, इसलिए उसे बेचना मेरे बस में नहीं।”502

यही राष्ट्रपति ट्रूमैन (Truman) का नैतिक दृष्टिकोण है। पश्चिम में भी इस भावना का बहुत सम्मान है। रोमन काल के आदर्श राजनेता और नागरिक के रूप में पूजित सिनसिनाटस (Cincinnatus) ठीक ऐसे ही व्यक्ति हैं। रोम में सर्वोच्च सत्ता के साथ सेवा करने के बाद, पद छोड़कर वे अपने घर लौटे और शेष जीवन एक साधारण किसान के रूप में बिताया। सत्ता का लोभ न करके लोकहित के लिए समर्पित यह पौराणिक रोमन व्यक्ति अमेरिका के पहले राष्ट्रपति वॉशिंगटन के आदर्श थे। 1790 में अमेरिका में सिनसिनाटी (Cincinnati) नाम का नगर भी औपचारिक रूप से बसाया गया। पर ईमानदार, परिश्रमी और मितव्ययी नेता की यह छवि पश्चिम की सामान्य नेता-छवि नहीं है। सिकंदर से कैसर तक, आधुनिक राजवंशों से नेपोलियन तक, पश्चिम के प्राचीन नेता विजेता और विजयी आक्रांता थे, और साथ ही अपार धन के स्वामी भी। इसी नेता-छवि का अनुसरण करते हुए आधुनिक पश्चिमी नेता धनी हैं। पर जैसा मेंशियस ने रेखांकित किया, यदि नेता धनी हो और लाभ की खोज करे, तो उसके अधीन सहायक, और आगे पूरी जनता, उस नेता का अनुसरण करते हुए लाभ की खोज करती है और धनी होना चाहती है। अंततः इस नेता-छवि के अनुसार सारी जनता नैतिक आदर्शों की खोज के बजाय “धन और यश” (Wealth and Fame) चाहने लगती है।

पूर्व में जनता आज भी परिश्रम और मितव्ययिता को सद्गुण मानती है, और आदर्श यह है कि नेता ईमानदार हों और सेवानिवृत्ति के बाद भी बिना धन के शांत जीवन बिताएँ। और अभी तक यह दर्शन व्यवहार में सर्वसामान्य बना हुआ है। पूर्व में धनी व्यक्ति के लिए राजनीति करना कठिन है, और धनी व्यक्ति प्रेस पर कब्ज़ा भी नहीं कर सकता। यह अमेरिका से भिन्न है, जहाँ मस्क, बेज़ोस, मर्डोक और एलिसन जैसे शीर्ष धनी प्रमुख मीडिया के स्वामी हैं और उसका विस्तार कर रहे हैं। यही इस आकलन की पृष्ठभूमि है कि “जो मीडिया पर नियंत्रण रखता है, वह संसार पर शासन करता है”।

पूर्व के राजनीतिक-आर्थिक चिंतन में लाभ की खोज और लोभ की सीमा नैतिकता खींचती है। किसी विशाल कंपनी का मीडिया-संस्थान पर कब्ज़ा करना पूर्व में स्वायत्तता का उल्लंघन करने वाला लोभ है, और पश्चिम में स्वतंत्रता का उत्सव मनाने वाली लाभ की खोज। धनी व्यक्ति का नेता बनना या नेता का धनी बनना पूर्व में अकर्म से भटकने वाला, स्वायत्तता का उल्लंघन है, और पश्चिम में स्वतंत्रता की खोज करने वाला अहस्तक्षेप। ये भेद पश्चिम की कर्म (यू वेई, 有爲) के विचार वाली व्यवस्था में ऐसा क्षेत्र हैं जिसे क़ानून से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। पूर्व की अकर्म के विचार वाली व्यवस्था में ये नैतिकता का केंद्र हैं।

जनता की परिश्रम और मितव्ययिता की भावना, और नेता की ईमानदार सादगी से उदाहरण प्रस्तुत करने की परंपरा: इन्हें बचाए रखना होगा। इसी बात में पूर्व का राजनीतिक अर्थशास्त्र व्यक्तिवादी स्वार्थ का प्रभावी ढंग से सामना कर सकता है, और ठीक यही वह बिंदु है जिससे बाज़ार-अर्थव्यवस्था के मूल आधारों में पूर्व पश्चिम पर अपनी बढ़त बनाए रख सकता है। विचार की दृष्टि से देखें तो पश्चिम के राजनीतिक-आर्थिक ढाँचे में निहित स्वार्थ की खुली छूट उपभोग-और-ऋण की आर्थिक व्यवस्था के साथ, और पूर्व के राजनीतिक-आर्थिक मूल आधारों में निहित स्वार्थ का प्रबंधन परिश्रम-और-मितव्ययिता की आर्थिक व्यवस्था के साथ, एक ही सिक्के के दो पहलू बनाते हैं। किसी भी समाज में सब धनी नहीं हो सकते। पर समाज सहयोग करके निर्धनों की सहायता कर सकता है। इस तरह सहयोग करने वाले समाज में नेता को अवश्य लोकहित की रक्षा करनी चाहिए और परिश्रम-मितव्ययिता का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। यही संबंधवाद है।

पश्चिमी अर्थशास्त्र व्यक्तिवाद के आधार पर यह तर्क देता है कि लोग धनी हों तो रिसाव-प्रभाव (trickle-down effect) से अमीर-ग़रीब की खाई पट जाती है। अर्थात यह सिद्धांत कि यदि लाभ और संसाधन ऊपरी वर्गों (धनी वर्ग, बड़ी कंपनियाँ आदि) में केंद्रित हों, तो वे निवेश, उपभोग और रोज़गार के माध्यम से अंततः निचले वर्गों (आम लोग, लघु और मध्यम उद्यम आदि) तक रिसकर पहुँचते हैं, और पूरी अर्थव्यवस्था बढ़ती है। पर यह ऐसा सिद्धांत है जिसकी व्याख्या उस “विजेता राज्य” की अर्थव्यवस्था में संभव है जिसने यूनानी-रोमन काल से आधुनिक काल के आरंभ के विश्व-विजय के युग तक पश्चिम की अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक सँभाले रखा। पर स्वयं पश्चिम के आधुनिक काल में “राष्ट्र-राज्य” की आर्थिक व्यवस्था में बदल जाने के बाद इस सिद्धांत की व्याख्या नहीं हो सकती। ऊपरी वर्गों को दी गई सहायता कबीलावाद की ओर ले जाती है, और अंततः मध्यम वर्ग को कमज़ोर करती है तथा ऊपरी और निचले वर्गों के बीच अमीर-ग़रीब की खाई को ही बढ़ाती है।

परिश्रम और मितव्ययिता की राजनीतिक नैतिकता और राजनीतिक-आर्थिक ढाँचा पूर्वी सभ्यता में गहराई और व्यापकता से निहित है। विशेषकर नेता द्वारा उदाहरण प्रस्तुत करने की परंपरा, संबंधवाद पर आधारित दार्शनिक व्यवस्था के रूप में, पश्चिम से कहीं अधिक स्वस्थ और ठोस मानी जा सकती है। पर यदि पूर्व व्यक्तिवाद पर आधारित पश्चिमी संस्थाओं और मानदंडों को सीखते हुए अपनी परिश्रम-मितव्ययिता की संस्कृति और परंपरा छोड़ दे, तो वह परिश्रम-मितव्ययिता वाले राष्ट्र से उपभोग-और-ऋण वाले राष्ट्रों के समूह में चला जाएगा। तब पूर्व परिश्रम-मितव्ययिता की कार्य-नैतिकता के साथ अपना भविष्य भी खो देगा। इसके विपरीत, यदि पूर्व पश्चिम की लोकतांत्रिक बाज़ार-अर्थव्यवस्था की संस्थाओं को सीखते हुए परिश्रम-मितव्ययिता की अपनी भावना और शिक्षा तथा योग्यतावाद को महत्त्व देने की परंपरा को बचाए रख सके, तो उसके पास ऐसी राजनीतिक-आर्थिक सांस्कृतिक व्यवस्था होगी जिसे वह भविष्य के लिए सामने रख सके। इससे आगे, पूर्व मानवता के सामने खड़े ध्रुवीकरण और एआई क्रांति के उथल-पुथल भरे दौर को बेहतर ढंग से सँभालने में योगदान देगा।

टिप्पणियाँ

  1. 459
  2. 460
  3. 461

    How Western civilisation could collapse, BBC, 18 April 2017

    ↩
  4. 462

    Ibid.,

    ↩
  5. 463

    Lawrence Harrison and Samuel Huntington, eds., Culture Matters: How Values Shape Human Progress, Basic Books, 2000, New York, Introduction 28

    ↩
  6. 464

    Ibid, Introduction 18

    ↩
  7. 465

    Ibid, Introduction 17

    ↩
  8. 466

    Ibid, Introduction 17

    ↩
  9. 467

    Harrison, Lawrence E.; Clark, Gregory; Boettke, Peter J.; Robinson, James A. (2007-01-08). How Much Does Culture Matter? (Cato Unbound) (Kindle Locations 132-137). Cato Institute. Kindle Edition.

    ↩
  10. 468

    Harrison, Lawrence E.; Clark, Gregory; Boettke, Peter J.; Robinson, James A. (2007-01-08). How Much Does Culture Matter? (Cato Unbound), Op.cit., Kindle Locations 132-137

    ↩
  11. 469

    The Economist August 20th, 2011

    ↩
  12. 470

    Harrison, Kindle Locations 137-143

    ↩
  13. 471

    Harrison, Kindle Locations 117-119

    ↩
  14. 472

    Harrison, Kindle Locations 137-143

    ↩
  15. 473

    Allison, Graham. Lee Kuan Yew: The Grand Master’s Insights on China, the United States, and the World (Belfer Center Studies in International Security) (pp. 123-124). The MIT Press. Kindle Edition.

    ↩
  16. 474

    Ibid

    ↩
  17. 475

    George Whatley and Benjamin Franklin, Principles of Trade, March 1777, in The Works of Benjamin Franklin vol., II. By Jared Sparks, Boston, Hilliard, Gray and Company, 1840, p.401

    ↩
  18. 476

    Smith, Adam (2002-06-01). An Inquiry into the Nature and Causes of the Wealth of Nations (p. 321). Public Domain Books. Kindle Edition.

    ↩
  19. 477

    Smith, Adam (2002-06-01). An Inquiry into the Nature and Causes of the Wealth of Nations, Op.cit., pp. 84-85

    ↩
  20. 478

    Ibid

    ↩
  21. 479

    Mancur Olson, “Dictatorship, Democracy, and Development,” The American Political Science Review 87 (Sept. 1993), पृ. 574–575।

    ↩
  22. 480

    Ibid.

    ↩
  23. 481
  24. 482

    Rajan, Raghuram; Zingales, Luigi (2003-02-18). Saving Capitalism from the Capitalists: How Open Financial Markets Challenge the Establishment and Spread Prosperity to Rich and Poor Alike (p. 68). Crown Publishing Group. Kindle Edition.

    ↩
  25. 483

    Rajan, Raghuram; Zingales, Luigi (2003-02-18). Saving Capitalism from the Capitalists: How Open Financial Markets Challenge the Establishment and Spread Prosperity to Rich and Poor Alike. Op.cit., p 276

    ↩
  26. 484

    Ibid. 1, पृ. 44।

    ↩
  27. 485

    “पहरेदारों पर पहरा कौन देगा?” (Quis custodiet ipsos custodes?) का प्रश्न रोमन कवि जुवेनल (Juvenal) ने अपने व्यंग्यों में उठाया। यह पत्नी के आचरण पर निगरानी के लिए पहरेदार बैठाने और फिर यह पूछने वाले व्यंग्य के रूप में शुरू हुआ कि उन पहरेदारों पर पहरा कौन देगा, और धीरे-धीरे मुख्यतः राजनीतिक अर्थ में प्रयुक्त होने लगा।

    ↩
  28. 486
  29. 487

    君子周而不比 小人比而不周: “नेता सबको अपनाता है, गुटबाज़ी नहीं करता; सहभागी गुटबाज़ी करता है, सबको नहीं अपनाता” (संवाद 2:14)।

    ↩
  30. 488

    Rajan et al, Ibid, 311

    ↩
  31. 489

    Rajan et al, Ibid, 311-312

    ↩
  32. 490

    हुआंग-लाओ विचार प्राचीन चीन में युद्धरत राज्यों के काल और हान राजवंश के आरंभ में बहुत प्रचलित राजनीतिक-दार्शनिक विचार था। हुआंग (黃) किंवदंतियों के ज्ञानी शासक पीत सम्राट (黃帝) को सूचित करता है। लाओ (老) दाओवादी संप्रदाय (道家) के संस्थापक माने जाने वाले लाओत्से (老子) को सूचित करता है। हुआंग-लाओ विचार का अर्थ है पीत सम्राट की राजनीतिक प्रज्ञा और लाओत्से के दाओवादी दर्शन को जोड़ने वाला विचार। यह पीत सम्राट के सद्गुण द्वारा शासन (德治) और लाओत्से के अकर्म के विचार को मिलाने वाला रूप है, दाओवादी और विधिवादी संप्रदायों का समन्वय करने वाली शासन-कला। लाओत्से के अकर्म द्वारा शासन (無爲而治) के अनुसार शासक अपने इरादे छिपाता है और कुछ न करता-सा दिखता है, पर मंत्रियों से अपने-आप काम करवाता है। साथ ही, मूल्यांकन के लिए, नेता, पीत सम्राट, के सद्गुण द्वारा शासन का अनुसरण करते हुए यह क़ानून से आचरण को पूरा करना चाहता था, ताकि नाम और वास्तविकता मेल खाएँ (名實相符)। अकर्म द्वारा शासन और नाम-वास्तविकता के मेल की खोज करने वाला हुआंग-लाओ विचार दाओवादी और विधिवादी संप्रदायों का समन्वय करता है। समन्वय का यह सिद्धांत पूर्व की राजनीति-कला का केंद्र है। हान राजवंश में कन्फ़्यूशियसवाद के महत्त्वपूर्ण होने के साथ कन्फ़्यूशियसवादी नैतिकता और क़ानून का समन्वय करके देश पर शासन करने वाली व्यवस्था बनी: “बाहर कन्फ़्यूशियसवादी, भीतर विधिवादी” (外儒內法) व्यवस्था, जो बाहर नैतिकता को आगे रखती है और भीतर क़ानून से उसे सुदृढ़ करती है।

    ↩
  33. 491

    राष्ट्रपति आइज़नहावर 16 मई 1960 को सोवियत प्रथम सचिव ख्रुश्चेव के साथ शिखर-वार्ता में राष्ट्राध्यक्षों पर सैन्य-औद्योगिक गठजोड़ के नकारात्मक प्रभाव और परमाणु हथियारों पर नियंत्रण के उपायों पर चर्चा करना चाहते थे। पर वार्ता से ठीक पहले हुई घटना के कारण यह अवसर हाथ से निकल गया: 1 मई 1960 को सोवियत संघ ने एक अमेरिकी जासूसी विमान U-2 को मार गिराया और अमेरिकी पायलट को पकड़ लिया।

    ↩
  34. 492

    संसार ने अब तक पश्चिम को आदर्श मानकर लोकतांत्रिक बाज़ार-अर्थव्यवस्था का विकास किया है। पर पश्चिम लोकतांत्रिक बाज़ार-अर्थव्यवस्था चलाते हुए एक जाल में फँस गया है: “अमीर-ग़रीब की बढ़ती खाई” और “ऋण से चलने वाले कल्याण” को दोहराते हुए वह अपनी सीमाओं से टकरा गया है। यही “विकसित देशों का जाल” है। विकसित देश बने रहने के लिए केवल पश्चिम का अनुकरण करके विकसित देशों के जाल में नहीं फँसना चाहिए। इस संबंध में पश्चिमी ढंग की बाज़ार-अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र का प्रतिमान भी गंभीर कठिनाइयों से टकरा रहा है। पश्चिम राजनीतिक अर्थशास्त्र के स्तर पर लोकतंत्र की मूलभूत और दार्शनिक समस्याओं से जूझ रहा है। कल्याण और सामाजिक संतुलन की समस्याओं से रास्ता निकालने वाले विचारों की दरिद्रता और दर्शन के अभाव के कारण पश्चिम को अपना भविष्य अंधकारमय लग रहा है। राजनीतिक-आर्थिक लोकलुभावनवाद, अर्थात “विकसित देशों का जाल”, इसका स्रोत है, और यही पश्चिम द्वारा झेले जा रहे वित्तीय संकट और यूरो संकट का सार है। यदि पश्चिम जिस जाल में फँसा, उसे दोहराया जाए, अर्थात बड़ी सरकार, भारी कर, ढेरों नियम, अमीर-ग़रीब की बढ़ती खाई और ऋण से फैलाया गया कल्याण, तो पश्चिम जिस विकसित देशों के जाल में फँसा, उससे बचा नहीं जा सकता। हम बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध की इस मान्यता पर आधारित “मध्यम आय के जाल” की अवधारणा से भली-भाँति परिचित हैं कि संसार की सभी अर्थव्यवस्थाएँ पश्चिमी ढंग से विकसित हो सकती हैं। पर इक्कीसवीं शताब्दी में प्रवेश के साथ हमारे सामने खड़ी सचमुच महत्त्वपूर्ण समस्या मध्यम आय का जाल नहीं, विकसित देशों का जाल है।

    ↩
  35. 493

    शूज़ी (術治) का दर्शन उसी ढर्रे पर जीवित है जिस पर ई चिंग का आधार, परिवर्तन का दर्शन: ई चिंग को प्राचीन ग्रंथ मानकर बरते जाने के कारण वह भले भुला दिया गया-सा लगे, वह पूर्वी दर्शन का मूल स्वर बना हुआ है। परिवर्तन के दर्शन का दार्शनिक स्वर समन्वय के द्वारा दाओवाद और कन्फ़्यूशियसवाद में समा गया और उनकी दार्शनिक व्यवस्थाओं में गहराई से प्रतिबिंबित होकर ज्यों का त्यों जीवित है। दाओवाद के अकर्म के विचार या कन्फ़्यूशियसवाद के नैतिक चिंतन के सीधे उद्धरण भी, आज पश्चिमी सभ्यता के प्रबल प्रभाव के कारण, पहले से कम होते दिखते हैं, पर पूर्वी सभ्यता के केंद्र में उनके स्थान में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

    ↩
  36. 494

    “हर बड़ी दौलत के पीछे एक अपराध छिपा होता है” (Behind every fortune there is a crime) पश्चिम में अक्सर उद्धृत होने वाला कथन है। इसे बाल्ज़ाक का माना जाता है, पर उनकी रचनाओं में यह इस रूप में नहीं मिलता; यह ल पेर गोरियो (Le Père Goriot) के एक वाक्य का सार है, जिसका आशय है कि बिना किसी प्रत्यक्ष कारण वाली बड़ी दौलतों का रहस्य कोई भुला दिया गया अपराध होता है, क्योंकि वह सफ़ाई से किया गया था। मारियो पुज़ो के द गॉडफ़ादर के आरंभ में उद्धृत होकर यह संसार भर में प्रसिद्ध हुआ। इसका आशय यह है कि विशाल संपत्ति केवल परिश्रम या संयोग से संचित नहीं होती, और उस प्रक्रिया में अवैध या अनैतिक कृत्यों के शामिल होने की प्रबल संभावना होती है। सामाजिक संदर्भ में यह उस आलोचनात्मक दृष्टि को प्रतिबिंबित करता है जिसके अनुसार पूँजीवादी समाज में धन-संचय की प्रक्रिया अक्सर शोषण, सत्ता के दुरुपयोग और अवैध लेन-देन से उलझी रहती है। इसका दार्शनिक आशय, नैतिकता और धन के संबंध में “वैध धन” की अवधारणा पर प्रश्न उठाते हुए, धन-संचय की प्रक्रिया पर आलोचनात्मक चिंतन का आह्वान करता है।

    ↩
  37. 495

    Weber, Max (2002-04-30). The Protestant Ethic and the Spirit of Capitalism: and Other Writings (Penguin Twentieth-Century Classics) (p. 301 and location 647 of 9560). Penguin Group US. Kindle Edition.

    ↩
  38. 496

    Ferguson, Niall (2011-11-01). Civilization: The West and the Rest (p. 280-282). Penguin Group. Kindle Edition.

    ↩
  39. 497

    The Economist August 20th, 2011

    ↩
  40. 498

    वॉशिंगटन पोस्ट में 2005 के उनके लेख “U.S. Trade Deficit Hangs in a Delicate Imbalance” (अमेरिकी व्यापार-घाटा एक नाज़ुक असंतुलन पर टिका है) से।

    ↩
  41. 499

    Ferguson, Niall (2011-11-01). Civilization: The West and the Rest (pp. 332-333). Penguin Group. Kindle Edition.

    ↩
  42. 500

    Poivre, पूर्वोक्त, पृ. 87।

    ↩
  43. 501

    http://en.wikipedia.org/wiki/John_Locke लॉक के इन विचारों ने अमेरिका के संस्थापक दस्तावेज़ों को प्रभावित किया, जिससे स्वतंत्रता की घोषणा अधिकारों का अपना कथन “सभी मनुष्य समान रचे गए हैं” से आरंभ करती है। पश्चिम ने लॉक के इन विचारों को विकसित करके सामाजिक अनुबंध का यह सिद्धांत स्थापित किया कि चूँकि सभी मनुष्य समान रचे गए हैं, इसलिए सरकार को नागरिकों की सहमति से शासन करना चाहिए।

    ↩
  44. 502