दूसरा भाग हम कौन हैं: मन और शरीर की एकता (心身一體) बनाम आत्मा और देह का संघर्ष (靈肉鬪爭) · अध्याय 3

पूर्व और पश्चिम के मानव-स्वभाव संबंधी सिद्धांत: मानव-स्वभाव बदलता है या स्थिर है?

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1) पश्चिमी मानव-स्वभाव सिद्धांत: न बदलने वाला मानव-स्वभाव

मन-पूजा की दार्शनिक व्यवस्था ने हज़ारों वर्षों तक पश्चिमी दर्शन के इतिहास पर शासन किया। पर चरम पर पहुँची वस्तु उलट जाती है (物極必反): मन-पूजा के शिखर पर पहुँचे बीसवीं शताब्दी के विचारधाराओं के युग के अंत के साथ पश्चिमी दार्शनिक व्यवस्था मानव-स्वभाव के सिद्धांत से जुड़ी एक मूलभूत समस्या से टकरा गई। वह मानव-स्वभाव सिद्धांत के इस लौह-नियम से टकरा गई कि मन मनुष्य पर शासन नहीं करता। विचारधाराओं के युग में फ़ासीवाद ने उस सामाजिक डार्विनवाद का अनुसरण किया जो संघर्षपूर्ण योग्यतम की उत्तरजीविता को ही मानव-स्वभाव समझ बैठा था, और वह बुरी तरह विफल हुआ। फ़ासीवाद मानव-स्वभाव के इस सिद्धांत पर खड़ा था कि सहज वृत्ति मनुष्य पर शासन कर सकती है। साम्यवाद इसलिए विफल हुआ क्योंकि वह इस निराधार सामाजिक डार्विनवाद पर आधारित था कि मानव-स्वभाव को बदला जा सकता है। मार्क्स ने अपना साम्यवादी सिद्धांत मानव-स्वभाव के इस सिद्धांत पर खड़ा किया कि विकास के द्वारा मन मनुष्य पर शासन कर सकता है: “साम्यवाद विकासवादी साधनों से प्राप्त किया जाना है।” 303

पर मानव-स्वभाव के विकास को न हम उत्पन्न कर सकते हैं, न उसके भविष्य का पूर्वानुमान कर सकते हैं। मानव-स्वभाव पर मन शासन नहीं करता; वह सहज वृत्ति और मन के जुड़ाव से अभिव्यक्त होता है। होमो सेपियंस, चाहे पूर्व का हो या पश्चिम का, सब एक ही मानव-स्वभाव लेकर जन्म लेते हैं। दार्शनिक व्यवस्थाओं को इस विचार के साथ मानवीय मामलों तक पहुँचना चाहिए कि मन और सहज वृत्ति से बना मानव-स्वभाव किसी पूर्वानुमेय अवधि में नहीं बदलता। मनुष्य द्वारा सोची गई हर दार्शनिक व्यवस्था की सत्यता या असत्यता अंततः इस प्रश्न से तय होती है कि वह सही मानव-स्वभाव पर खड़ी की गई है या ग़लत मानव-स्वभाव पर।

पूर्व और पश्चिम की सभ्यताओं ने मानव-स्वभाव का विश्लेषण कैसे किया है? दार्शनिक रूप से मानव-स्वभाव को तीन मतों में बाँटा जाता है: स्वभाव शुभ है, स्वभाव अशुभ है, और स्वभाव न शुभ है न अशुभ (या पश्चिम का Tabula Rasa, कोरी स्लेट का सिद्धांत)। इस एकरूप विभाजन में सरलता का गुण तो है, पर यह पूर्व और पश्चिम के मानव-स्वभाव सिद्धांतों के मूलभूत अंतर की उपेक्षा करता है। मानव-स्वभाव के सिद्धांत में पश्चिम “जो सृजित है वह नहीं बदलता” वाले सत्ता के दर्शन (存在論, ontology) का अनुसरण करता है, और पूर्व “सब कुछ सदा बदलता है” वाले परिवर्तन के दर्शन (變化論, transformationism) का। पश्चिम की दृष्टि में मानव-स्वभाव जन्म से ही नहीं बदलता। पश्चिमी मानव-स्वभाव सिद्धांत को सत्ता के दर्शन वाले मानव-स्वभाव पर आधारित ईश्वर के साथ वाचा या सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत की आवश्यकता होती है। पूर्व की दृष्टि में मानवीय चरित्र “जन्मजात स्वभाव की सीमा के भीतर, मन की भूमिका से बदलता” है। पूर्वी मानव-स्वभाव सिद्धांत सामाजिक अनुबंध पर नहीं, बल्कि परिवर्तन के दर्शन के अनुसार चरित्र-निर्माण पर केंद्रित होता है। सहज वृत्ति प्रकाश के स्रोत की भूमिका निभाती है, और मन दर्पण की।

पश्चिम के अशुभ-स्वभाव सिद्धांत, शुभ-स्वभाव सिद्धांत और कोरी स्लेट का सिद्धांत, तीनों सत्ता के दर्शन का अनुसरण करते हैं। पश्चिम के अशुभ-स्वभाव सिद्धांत (प्रकाशित धर्म और हॉब्स) के अनुसार मनुष्य अशुभ जन्म लेता है, और चूँकि वह उसी रूप में “अस्तित्व” रखता है, इसलिए नहीं बदलता। अशुभ-स्वभाव सिद्धांत के अनुसार मनुष्य अशुभ चरित्र लेकर जन्मता है और मृत्यु तक नहीं बदलता। उसे मरने से पहले आत्म-चिंतन और पश्चात्ताप करना चाहिए, और जीते-जी अपने अस्तित्व के लिए किसी पैग़ंबर या राजा को अपने अधिकार सौंप देने चाहिए। पश्चिम के शुभ-स्वभाव सिद्धांत (प्लेटो या रूसो) के अनुसार मनुष्य मूलतः शुभ जन्म लेता है और उसका शुभ स्वभाव नहीं बदलता। शुभ स्वभाव के बल पर मनुष्य सत्य की खोज करने और उसे पाने के मार्ग पर चल सकता है। जो सत्य पा लेता है वह नेता बनता है और शेष मनुष्यों का मार्गदर्शन करता है। सच्ची वास्तविकता न बदलने वाले सार, “प्रत्यय” (Idea), में है, और जो उसे पा लेता है वह नेता बनता है; या फिर बात उस “सामान्य इच्छा” को खोज निकालने की है जो व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर पूरे समुदाय के सार्वजनिक कल्याण की ओर लक्षित हो। पश्चिम के कोरी स्लेट के सिद्धांत (अरस्तू और लॉक) के अनुसार मनुष्य बिना किसी लिखावट वाले कोरे काग़ज़ की तरह जन्म लेता है, इसलिए शिक्षा से हर मनुष्य सत्य को प्राप्त कर सकता है। यह वह स्थिति है जो रूप को यथार्थ में अंतर्निहित मानती है और अनुभव तथा अवलोकन से सार की खोज करना चाहती है। कोरी स्लेट की अवस्था में भी मनुष्य वह प्राणी है जो अपनी इच्छित वस्तु स्वतंत्र रूप से चुन सकता है। चूँकि मनुष्य जन्म से ही प्राकृतिक अधिकार (जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति) रखता है, इसलिए यह तर्क दिया जाता है कि सरकार उन्हें सुनिश्चित करने के लिए ही अस्तित्व में है।

अतीत में अच्छाई-बुराई की धारणा पर आधारित मानव-स्वभाव सिद्धांत, और उन पर टिके सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत से जुड़े मानव-स्वभाव सिद्धांत प्रचलन में थे, पर अब उनकी प्रासंगिकता बहुत घट गई है। हाल में पश्चिम में अतीत के पश्चिमी मानव-स्वभाव सिद्धांतों से भिन्न स्तर का एक प्रकृति-दर्शनीय मानव-स्वभाव सिद्धांत सामने आया है। प्रोफ़ेसर ओल्सन (Olson, 1932-1998) ने मानव-समाज में नेतृत्व कैसे बनता है, इसका आगमनात्मक स्तर पर विश्लेषण करते हुए मानव-स्वभाव की एक नई व्याख्या प्रस्तुत की है। प्रोफ़ेसर ओल्सन द्वारा प्रस्तुत मानव-स्वभाव सिद्धांत बहुत से पहलुओं में पूर्व के मानव-स्वभाव सिद्धांत से मेल खाता है। क्योंकि प्रोफ़ेसर ओल्सन का मानव-स्वभाव सिद्धांत, सत्ता के दर्शन पर टिके अतीत के पश्चिमी सिद्धांतों से भिन्न, परिवर्तन के दर्शन पर आधारित है।

प्राचीन मानव-स्वभाव सिद्धांत: धर्म का अशुभ-स्वभाव सिद्धांत, प्लेटो का शुभ-स्वभाव सिद्धांत, अरस्तू का कोरी स्लेट का सिद्धांत

पश्चिम में मानव-स्वभाव के सिद्धांत लंबे समय तक धार्मिक सिद्धांतों का अनुसरण करते रहे। धर्म मानव-स्वभाव के अशुभ होने के सिद्धांत से आरंभ करता है। प्रकाशित धर्मों में ईश्वर (神) मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार बनाता है। ईसाई धर्म में, पृथ्वी के जीवन से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण परलोक में, भले लोग स्वर्ग जाते हैं और बुरे लोग नरक। मध्य युग के हज़ार वर्षों में चर्च का अशुभ-स्वभाव सिद्धांत टॉमस एक्विनास के मूल पाप संबंधी दर्शन आदि से कुछ हद तक संशोधित भी हुआ, पर उसका सार कट्टर अशुभ-स्वभाव सिद्धांत पर ही टिका रहा। अशुभ-स्वभाव सिद्धांत में सहज वृत्ति को मनुष्य के उद्धार में बाधा डालने वाली वस्तु माना जाता है।

यूनानी मिथकों में भी अच्छाई और बुराई का चित्रण इसी प्रकार होता है। प्रोमेथियस ने मिट्टी से मनुष्य का आकार गढ़ा और देवी एथेना ने उसमें प्राण फूँके, और इस प्रकार मनुष्य अस्तित्व में आया। पर जब पहली स्त्री पैंडोरा ने वर्जित पिटारा खोला, तो मानव-समाज में अच्छाई और बुराई आरंभ हो गई। पुराने नियम में भी यह विश्वास था कि मनुष्य यूनानी मिथक जैसे ही ढंग से बनाया गया। सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान ईश्वर ने एक सप्ताह में पृथ्वी, आकाश और तारे बनाए। फिर अपने स्वरूप के अनुसार मिट्टी गढ़कर पुरुष बनाया, और उसकी पसली से स्त्री बनाई। पहले मनुष्य आदम और हव्वा ईश्वर की आज्ञा तोड़कर भले-बुरे के ज्ञान के वर्जित फल को खाते हैं और पाप करते हैं। ईसाई धर्म का भले-बुरे के ज्ञान का फल और यूनानी मिथक का पैंडोरा का पिटारा बुराई का द्वार खोलने वाले मूल स्रोत बन जाते हैं।

ईसाई धर्म में मूल पाप की यह चेतना मनुष्य का पीछा करने लगी। इसलिए मध्य युग तक पश्चिम मूल पाप की चेतना से दबा रहा और मानव-स्वभाव पर तर्कसंगत चर्चा असंभव थी। क्योंकि सबसे महत्त्वपूर्ण यह था कि हर व्यक्ति पश्चात्ताप करे और शीघ्र आने वाले अंतिम न्याय की तैयारी करे। ऑगस्टीन (Augustine, 354-430) का मानव-स्वभाव संबंधी दर्शन भी मूलतः अच्छाई-बुराई की धारणा पर टिका था। उनके मूल पाप के सिद्धांत के अनुसार मनुष्य एक हानिकारक इच्छा (hurtful desire), यानी प्रबल “कामवासना” (concupiscence), लेकर जन्म लेता है। तब मन और सहज वृत्ति के विभाजन को स्वाभाविक मानने वाली ईश्वर की सभ्यता में सहज वृत्ति निंदा का पात्र बन जाती है। मनुष्य के पूर्वजों द्वारा किए गए मूल पाप का सिद्धांत और जन्म के साथ आने वाली कामवासना का सिद्धांत धर्म-सुधार के समय भी ज्यों के त्यों बचे रहे। लूथर, काल्विन आदि धर्म-सुधार के नेताओं ने मूल पाप और कामवासना को मानव-स्वभाव का सार बताया। जो भी हो, मूल पाप धोने के लिए मनुष्य को निरंतर प्रायश्चित्त और पश्चात्ताप करना पड़ता था, और उसी के अंग के रूप में भले कर्म करके स्वर्ग जाने का प्रयास करना पड़ता था। मूल पाप के इस सिद्धांत ने हज़ार वर्षों से अधिक तक पश्चिमी संसार पर छाया रखा। इसी धार्मिक शक्ति के कारण पश्चिम आधुनिक काल तक मानव-स्वभाव पर दार्शनिक दृष्टि से विचार नहीं कर सका।

आधुनिक काल से पहले के मानव-स्वभाव सिद्धांतों में धर्म के अशुभ-स्वभाव सिद्धांत के विपरीत दर्शन प्लेटो में मिलता है। प्लेटो मानते थे कि मनुष्य जन्म से ही कुछ “जन्मजात प्रत्यय” (Innatism) रखता है। प्लेटो के अनुसार मनुष्य में सत्य खोजने का स्वभाव है। उनका शुभ-स्वभाव सिद्धांत इस दावे पर टिका है कि मनुष्य के भीतर सत्य और परम सत्य को खोजने वाले जन्मजात प्रत्यय हैं। इसके लिए प्लेटो आत्मा के महत्त्व पर बल देते हैं। उन्होंने यह कहते हुए कि “आत्मा की आँख देह की दस हज़ार आँखों से अधिक मूल्यवान है, क्योंकि केवल उसी से सत्य देखा जाता है”, तर्क दिया कि जन्म से हमारे पास विद्यमान आत्मा की आँख से सत्य को ग्रहण करना चाहिए। यह आत्मा और सहज वृत्ति को अलग करने वाला द्वैतवादी, विरोधमूलक मानव-स्वभाव सिद्धांत है।

अरस्तू ने कोरी स्लेट का सिद्धांत रखा, जिसके अनुसार कोई निश्चित मानव-स्वभाव नहीं होता। इसे उन्होंने “ताबुला रासा” शब्द से व्यक्त किया। ताबुला रासा लैटिन में Tabula rasa लिखा जाता है, और इसका अर्थ है बिना किसी लिखावट वाली साफ़ “कोरी पटिया” (blank slate)। कोरियाई में इसे कोरे काग़ज़ का सिद्धांत कहते हैं। कुल मिलाकर, मानव-स्वभाव के प्रसंग में Tabula rasa का दावा यह है कि मनुष्य बिना किसी मानव-स्वभाव के जन्म लेता है। चूँकि अरस्तू मानते थे कि मानव-स्वभाव मन में है, इसलिए वे सहज वृत्ति की भूमिका स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार मन सहज वृत्ति के जुए से मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से नए क्षेत्रों में आगे बढ़ सकता है और मनुष्य का नेतृत्व कर सकता है। यही तत्त्वमीमांसा का आरंभ है। इस बिंदु पर यह आरंभ से ही पूर्व के परिवर्तनशील मानव-स्वभाव सिद्धांत से भिन्न है। पूर्व का परिवर्तनशील मानव-स्वभाव सिद्धांत परिवर्तन का दर्शन है: वह सहज वृत्ति की भूमिका स्वीकार करते हुए मानता है कि मन की भूमिका के अनुसार मनुष्य का चरित्र बदलता है। पश्चिम के कोरी स्लेट के सिद्धांत में कोरी अवस्था सहज वृत्ति की उपेक्षा करने वाला सत्ता के दर्शन का मूल्य रखती है।

आधुनिक मानव-स्वभाव सिद्धांत और सामाजिक अनुबंध: हॉब्स का अशुभ-स्वभाव सिद्धांत, रूसो का शुभ-स्वभाव सिद्धांत, लॉक का कोरी स्लेट का सिद्धांत

पश्चिम के आधुनिक मानव-स्वभाव सिद्धांत यूनानी सिद्धांतों जैसी ही दिशा में बढ़ते हैं, पर उनकी विशेषता यह है कि वे सामाजिक अनुबंध के साथ आते हैं। आधुनिक समाज में पश्चिम ने ईश्वर के विधान के बजाय मन पर निर्भर होकर मानव-स्वभाव का मूल्यांकन करना आरंभ किया। इसी कारण पश्चिम के आधुनिक मानव-स्वभाव सिद्धांतों में दस आज्ञाओं का स्थान लेने वाले सामाजिक अनुबंध को ध्यान में रखकर मानव-स्वभाव की परिकल्पना की गई। पश्चिमी धर्म में ईश्वर और मनुष्य के संबंध का केंद्र दोनों के बीच बँधी “वाचा” (covenant) है: “अब मैं वाचा बाँधता हूँ” (निर्गमन 34:10)। इस वाचा का स्थान लेने वाली किसी चीज़ की आवश्यकता तीव्र हो गई थी।

आधुनिक काल के आरंभ के साथ पश्चिम में देववाद के उदय के साथ मनुष्य का मन ईश्वर का स्थान लेने लगता है। इसी काल में पश्चिम में मानव-स्वभाव की चर्चा और सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत साथ-साथ सामने आते हैं। धर्म पर आधारित ईश्वर और मनुष्य के बीच की वाचा के स्थान पर मन द्वारा आदेशित “सामाजिक अनुबंध” (social contract) का सिद्धांत सामने आता है। मनुष्यों के बीच अनुबंध आवश्यक है, और यहाँ यह स्वभाव महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि मनुष्य कौन है। क्योंकि मानव-स्वभाव के अनुसार सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत की विषय-वस्तु बदल जाती है। ईश्वर के सिद्धांतों के बजाय मनुष्य के मन के अनुसार राजा या सरकार के अस्तित्व को मान्यता देने वाला सामाजिक अनुबंध का सिद्धांत आना ही था।

सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत का समर्थन करने वाले मानव-स्वभाव सिद्धांत उसके साथ ही सामने आते हैं। हॉब्स (1588-1679), लॉक (1632-1704) और रूसो (1712-1778) के मानव-स्वभाव और सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत पश्चिम का प्रतिनिधित्व करते हैं। पश्चिमी सभ्यता की अच्छाई-बुराई की धारणा मानव-स्वभाव में परिवर्तन को स्वीकार नहीं करती। शुभ हो या अशुभ, बात वहीं समाप्त। शासन क़ानूनों और संस्थाओं से करना होगा। चूँकि मनुष्य ने बुरा कर्म किया, इसलिए उसे बुरे मनुष्य के रूप में मृत्यु तक ईश्वर के सामने पश्चात्ताप और प्रायश्चित्त करना होगा; परिणाम का निर्णय ईश्वर करता है। आधुनिक मन के युग में प्रवेश करके भी पश्चिम ने सत्ता के दर्शन वाले मानव-स्वभाव सिद्धांत की नींव ज्यों की त्यों बनाए रखी। हॉब्स के अशुभ-स्वभाव सिद्धांत में भी अशुभ मानव-स्वभाव नहीं बदलता। इस अशुभ मानव-स्वभाव का उपयोग इस तर्क के लिए किया गया कि शक्तिशाली राजसत्ता को स्वीकार करके व्यक्तियों की सुरक्षा की जानी चाहिए। लॉक ने अच्छाई-बुराई के बजाय कोरी स्लेट का सिद्धांत रखा। उनका कोरी स्लेट का सिद्धांत भी यही कहता है कि शिक्षा द्वारा सबको स्वतंत्रता के पक्षधर शुभ मनुष्य बनाया जाए; शुभ मनुष्य गढ़ने वाली शिक्षा और क़ानूनों पर निर्भर रहना पर्याप्त है। रूसो के शुभ-स्वभाव सिद्धांत में भी शुभ मानवीय चरित्र नहीं बदलता। बात यह है कि शुभ मानव-स्वभाव पर निर्भर होकर सामाजिक अनुबंध किया जाए और उसी पर भरोसा किया जाए। बल इस पर रहता है कि सामान्य इच्छा को प्रभावी बनाने वाले क़ानून और संस्थाएँ बनाई जाएँ।

हॉब्स ने अपने सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत के लिए मानव-स्वभाव के रूप में अशुभ-स्वभाव सिद्धांत को आगे रखा। हॉब्स ने प्राकृतिक अवस्था के समाज को “सबके विरुद्ध सबका युद्ध” कहकर परिभाषित किया। और मनुष्य के जीवन को “एकाकी, दरिद्र, घिनौना, पाशविक और अल्पकालिक” बताया। 304 मनुष्य अशुभ स्वभाव लेकर जन्म लेता है। वे सत्ता के दर्शन का अनुसरण करते हैं, जिसके अनुसार यह मानव-स्वभाव नहीं बदलता। 1651 में प्रकाशित अपनी पुस्तक लेवियाथन (Leviathan) में वे अशुभ मानव-स्वभाव पर बार-बार बल देते हैं। हॉब्स ने 1642 से 1651 तक दस वर्ष चले राजपक्ष और संसद-पक्ष के बीच के उग्र अंग्रेज़ी गृहयुद्ध को देखकर अपने दार्शनिक विचार खड़े किए। लगता है उन्होंने संघर्ष के बीच जीते मनुष्यों के आचरण को भली-भाँति देखा था। उनका सामाजिक अनुबंध का सिद्धांत इस प्रस्थापना से आरंभ होता है कि अशुभ स्वभाव वाले मनुष्य दूसरे मनुष्यों के बुरे कर्मों से अपनी रक्षा करते हैं। प्रजा राजा से सुरक्षा का लाभ पाती है, और बदले में अपने अधिकारों का कुछ भाग राजा को सौंपकर उसके प्रति निष्ठा रखती है।

मानव-स्वभाव के आकलन में लॉक हॉब्स से भिन्न हैं। लॉक ने कोरी स्लेट का सिद्धांत रखा, जिसके अनुसार मनुष्य बिना स्वभाव के जन्म लेता है। कोरी स्लेट का सिद्धांत पहले अरस्तू ने रखा था, पर अंग्रेज़ अनुभववादी विचारक लॉक (1632-1704) द्वारा फिर से प्रतिपादित किए जाने पर यह पश्चिम में फिर प्रचलित हुआ: “मनुष्य आरंभ में कोरी स्लेट की अवस्था में जन्म लेता है, और जो कुछ अर्जित करता है उससे भरकर व्यक्ति बनता है।” इसलिए लॉक शिक्षा के महत्त्व पर बल देते हैं:

जिन मनुष्यों से हम मिलते हैं, उनमें से दस में से नौ जैसे हैं वैसे, शुभ हों या अशुभ, उपयोगी हों या नहीं, अपनी शिक्षा के कारण हैं। मनुष्यों के बीच बड़ा अंतर यही पैदा करती है। 305

लॉक मानते थे कि शिक्षा के द्वारा मनुष्य को ऐसा स्वभाव दिया जा सकता है जो स्वतंत्रता की खोज कर सके। उन्हें विश्वास था कि सामान्य व्यक्तियों और नेताओं, दोनों को स्वतंत्रता का सम्मान करना सिखाया जा सकता है। इसलिए लॉक प्रतिरोध के अधिकार का प्रतिपादन करते हैं, जिसके अनुसार व्यक्ति की स्वतंत्रता की उपेक्षा करने वाले सत्ताधारी को हटाया जा सकता है। यह मेंशियस के मिनबेन (民本主義, जनता के लिए शासन) के आधार, “जनता मूल्यवान है, शासक हल्का” (民貴君輕) के विचार से मिलता-जुलता है। लॉक का कोरी स्लेट का सिद्धांत सत्ता के दर्शन पर आधारित निरपेक्षता पर बल देने लगता है: उसका दावा है कि मनुष्य कहीं भी जन्म ले, पारिस्थितिक रूप से उदारवादी कोरी स्लेट लेकर जन्म लेता है। लॉक का तर्क है कि स्वतंत्रता का सम्मान करने वाली सरकार स्वतंत्रता का सम्मान करने वाली प्रजा के साथ अनुबंध कर सकती है। लॉक के सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत में उदारवाद सबसे महत्त्वपूर्ण आधार है। रूसो का विचार भी फ़्रांसीसी क्रांति के माध्यम से स्वतंत्रता को व्यक्ति का सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकार बताता है। लॉक ऐसे सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत का प्रतिपादन करते हैं जिसके अनुसार हर कोई उदारवादी विचार अर्जित कर सकता है और उसी के आधार पर समाज की रचना की जा सकती है। लॉक के विचारों ने संयुक्त राज्य अमेरिका की स्थापना की प्रक्रिया पर बहुत प्रभाव डाला।

हॉब्स और लॉक के बाद रूसो सामाजिक अनुबंध और मानव-स्वभाव का एक नया सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं। हॉब्स के अशुभ-स्वभाव सिद्धांत के विपरीत रूसो शुभ-स्वभाव सिद्धांत का प्रतिपादन करते हैं। रूसो अशुभ मानव-स्वभाव का प्रतिपादन करने के लिए हॉब्स और स्पिनोज़ा की तीखी आलोचना करते हैं। उनके अनुसार मनुष्य मूलतः भला जन्म लेता है। रूसो का मानना था कि जंगली पशुओं में उदात्त गुण और स्वस्थ शरीर होता है, पर पालतू (domesticated) बनते हुए पशु वे सारे अच्छे गुण त्यागकर दुर्बल और असंतुलित स्वभाव तथा शरीर पा लेते हैं। मनुष्य में भी मूलतः “सच्ची मित्रता, वास्तविक सम्मान, पूर्ण विश्वास” होता है, पर सभ्य समाज में रहते हुए ये “ईर्ष्या, संदेह, उदासीनता, भय, घृणा, छल” में बदल जाते हैं। इसलिए सभ्यता के बुरे प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए मनुष्य सरकार की स्थापना करते हैं, ताकि सरकार के द्वारा साझा लाभ की खोज की जाए। रूसो ने समझाया कि “सामान्य इच्छा” (General will) महत्त्वपूर्ण है: यह व्यक्ति के हित का नहीं, बल्कि समाज के सभी सदस्यों के हित का प्रतिनिधित्व करती है, सदा सही होती है, और स्वतंत्रता तथा समानता की खोज करती है। इस सामान्य इच्छा को साकार करने के लिए प्रजा और सरकार के बीच सामाजिक अनुबंध होना चाहिए। रूसो के मानव-स्वभाव और सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत ने तत्कालीन पश्चिम पर बड़ा प्रभाव डाला। फ़्रांसीसी क्रांति से जन्मी सरकार रूसो से प्रभावित थी। स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व उसके तीन बड़े लक्ष्य बने।

ओल्सन का आधुनिक मानव-स्वभाव सिद्धांत: डाकू और निवासियों के पारस्परिक हित से नेतृत्व का जन्म

पश्चिम के इन सामाजिक अनुबंध के सिद्धांतों के सामने हाल में पश्चिम में नेतृत्व के निर्माण की एक नई व्याख्या सामने आ रही है। पश्चिम के मानव-स्वभाव और सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत पश्चिमी दर्शन के केंद्र, सत्ता के दर्शन, पर आधारित हैं। पर हाल में “प्रकृति-दर्शन” पर आधारित एक मानव-स्वभाव सिद्धांत सामने रखा जा रहा है: पश्चिम के विशिष्ट दार्शनिक दायरे से बाहर, प्रकृतिवाद पर आधारित, परिवर्तन के दर्शन वाला मानव-स्वभाव सिद्धांत। यह पूर्व के प्रकृति-दर्शन द्वारा प्रतिपादित मानव-स्वभाव सिद्धांत से मिलता-जुलता है। प्रोफ़ेसर ओल्सन (Olson, 1932-1998) का सिद्धांत इसका प्रतिनिधित्व करता है।

ओल्सन के मानव-स्वभाव सिद्धांत की शुनज़ी (荀子) के मानव-स्वभाव सिद्धांत से तुलना करें, तो दोनों इस बात में समान हैं कि वे मानव-स्वभाव को स्वार्थी और इच्छा-केंद्रित मानते हैं, और इस पर बल देते हैं कि सामूहिक सहयोग अपने-आप नहीं उपजता और उसके लिए बाहरी कारक आवश्यक हैं। ओल्सन ने यह मत रखा कि मनुष्य निजी हित को प्राथमिकता देने वाला प्राणी है, और लोकहित क़ानूनों और संस्थाओं जैसी बाध्यकारी शक्ति या चयनात्मक प्रोत्साहनों से ही संभव होता है। शुनज़ी ने भी यह मत रखा कि मनुष्य सहज वृत्ति से निजी हित की खोज करता है, पर क़ानून और शिक्षा के द्वारा लोकहित की खोज करने की क्षमता पा सकता है। ओल्सन बीसवीं शताब्दी के आधुनिक व्यक्ति थे और उन्होंने अर्थशास्त्र पर ध्यान केंद्रित किया; शुनज़ी प्राचीन व्यक्ति थे और उनका ध्यान कुछ हद तक नैतिकता पर था। पर प्राचीन और आधुनिक के अंतर के बावजूद दोनों विचारकों के मानव-स्वभाव पर मिलते-जुलते मत हैं, और दोनों ने यह मत रखा कि राजनीति और अर्थव्यवस्था, दोनों पक्षों में लोकहित की खोज करने वाला मानवीय चरित्र गढ़ा जाना चाहिए। ओल्सन के मानव-स्वभाव सिद्धांत की विशेषता यह है कि पश्चिमी मानव-स्वभाव सिद्धांतों में पहली बार उसने परिवर्तन के दर्शन का प्रतिपादन किया, और पूर्व-पश्चिम के मानव-स्वभाव सिद्धांतों की तुलना में यह पूर्व और पश्चिम का एक महत्त्वपूर्ण मिलन-बिंदु बनता है।

ओल्सन उन मानव-स्वभाव और सामाजिक अनुबंध के सिद्धांतों से दूर रहे जिन्हें पारंपरिक पश्चिमी विचारकों ने अपने समय की राजनीतिक स्थिति के अनुरूप निकाला था। और यथार्थवादी प्रकृति-दर्शन के आधार पर वे विश्लेषण करते हैं कि मानव-समाज में नेतृत्व कैसे उत्पन्न हुआ। प्रोफ़ेसर ओल्सन मानते हैं कि नेता और निवासियों के बीच मेल खाने वाले हितों के कारण सरकार बनी।

कबीले की इकाई से आगे के मानव-समाज की शासन-व्यवस्थाएँ सामाजिक अनुबंध से या अधिकारों को स्वेच्छा से सौंपने जैसी स्थितियों से नहीं बनतीं। बल्कि वे उन लोगों के बीच, जिनके पास सबसे अधिक हिंसा का प्रयोग करने की क्षमता होती है, तर्कसंगत हित की खोज की प्रक्रिया में बनती हैं।306

यह आत्म-संरक्षण के प्राकृतिक सिद्धांत पर आधारित है, और उसी आत्म-संरक्षण के सिद्धांत से मेल खाता है जिस पर पूर्व का मानव-स्वभाव सिद्धांत टिका है। पूर्वी सभ्यता की दृष्टि से सरकार सामाजिक अनुबंध से नहीं, बल्कि अंततः शासकों और शासितों के पारस्परिक हितों के मेल से बनती है। यह दिखाता है कि सरकार बनने के बाद भी नेता और निवासियों के पारस्परिक हित की विषय-वस्तु के अनुसार सरकार बनी रहती है, या दुर्बल होकर लुप्त हो जाती है। इस प्रक्रिया को नेता और शासितों के बीच अनवरत चलने वाले पारस्परिक नियंत्रण की स्थिति के रूप में देखा जा सकता है: नेता और निवासी सब एक ही मानव-स्वभाव लेकर जन्म लेते हैं, और इस मानव-स्वभाव से, जन्म के बाद के प्रयास के अनुसार, पारस्परिक हित चाहने वालों और केवल अपना हित साधने वालों में बँटने की परिवर्तन-प्रक्रिया से गुज़रते हैं।

यह सिद्धांत कहता है कि नेता और निवासियों का “समावेशी हित” (encompassing interest) समाज के गठन की मूल प्रेरणा है। उनका सिद्धांत अनुमान करता है कि आरंभ में मनुष्य का सामाजिक जीवन आचरण के एक ही सिद्धांत से चलता रहा होगा: दूसरों का माल छीन लेने वाली लूट (raid)। ओल्सन ने इन्हें “घुमंतू डाकू” (roving bandit) कहा। पर लंबा समय बीतने पर डाकुओं में कुछ ऐसे निकले जिन्होंने समझा कि हर वर्ष की फ़सल लूट ले जाने के बजाय अच्छी फ़सल वाली जगह बसकर हर वर्ष उचित मात्रा में लेना अधिक लाभदायक है। इस प्रकार वे एक ही जगह टिकने वाले “स्थायी डाकू” (stationary bandit) बन जाते हैं।

स्थायी डाकू बनने पर वे समझते हैं कि निवासियों से छीनने की मात्रा को नियंत्रित करना होगा। उन्हें पता चलता है कि घुमंतू डाकुओं की तरह सब कुछ छीन लेना लाभदायक नहीं। निवासियों के पास साल भर का भोजन और अगली उपज के लिए आवश्यक सामग्री छोड़कर लेना स्थायी डाकू के हित में है। और उन्हें यह भी पता चलता है कि अन्न-उत्पादन बढ़ाने के लिए सड़कें, जलाशय और बाज़ार बनवाना निवासियों और स्थायी डाकू, दोनों के लिए बेहतर है।

किसी देश का नेता निवासियों के लिए आधारभूत ढाँचा खड़ा करता है, तो इसका कारण वह “समावेशी हित” है जिसमें उस आधारभूत ढाँचे में उसका अपना हित भी शामिल होता है। 307

इस प्रकार स्थायी डाकू लुटेरे से नेता बन जाता है। ओल्सन समझाते हैं कि डाकू और निवासियों के बीच के “समावेशी हित” ने नेता को जन्म दिया।

अतः स्थायी डाकू हिरण का शिकार करने वाला भेड़िया नहीं है। बल्कि वह उस पशुपालक जैसा हो जाता है जो ध्यान रखता है कि उसके बाड़े के पशु भली-भाँति सुरक्षित रहें और खुलकर पानी पी सकें। 308

ओल्सन को यह अंतर्दृष्टि 1920 के दशक में चीन के मंचूरिया में सरदारों (युद्ध-सामंतों) के बनने और उनमें से किसके सत्ता हासिल करने की स्थिति की पड़ताल करते हुए मिली। ओल्सन ने मंचूरियाई सरदारों के संघर्ष में घुमंतू डाकुओं और स्थानीय डाकुओं की तुलना की। घुमंतू डाकुओं की हार का कारण यह था कि उन्हें निवासियों का समर्थन नहीं मिला। उन्होंने यह देखकर अपना सिद्धांत खड़ा किया कि स्थायी डाकू निवासियों का समर्थन पाकर “नेता” बनते हैं और अंततः विजयी होते हैं।309 यही डाकू और निवासियों के पारस्परिक हित का सिद्धांत है। ओल्सन का सिद्धांत पश्चिम के विविध सामाजिक अनुबंध के सिद्धांतों से अधिक यथार्थवादी है। पूर्वी नेता के “स्वर्ग के आदेश” (天命, Mandate of Heaven) का विचार भी इससे निकाला जा सकता है। यदि नेता प्रजा को अच्छी तरह जीने दे, तो उसके पास स्वर्ग का आदेश है; यदि वह इसमें विफल हो, तो स्वर्ग का आदेश लुप्त हो जाता है।

ओल्सन की उत्कृष्ट अंतर्दृष्टि से हम मानव-स्वभाव के विषय में एक महत्त्वपूर्ण बात जान सकते हैं। ओल्सन का सिद्धांत सामाजिक अनुबंध का प्रतिपादन करने के लिए अशुभ-स्वभाव या शुभ-स्वभाव का सिद्धांत सामने नहीं रखता, बल्कि मानव-स्वभाव को जैसा है वैसा देखकर यह पड़ताल करने से आरंभ होता है कि नेता कैसे उत्पन्न हुए। यह प्रकृति-दर्शनीय मानव-स्वभाव सिद्धांत पर आधारित है। यह आधुनिक काल के आरंभ के पश्चिमी विचारकों के सिद्धांतों से स्पष्ट रूप से भिन्न मानव-स्वभाव सिद्धांत की परिकल्पना करता है: नेता हों या निवासी, सब अपना हित साधने वाला मानव-स्वभाव लेकर जन्म लेते हैं, और इसी आधार पर संबंध बनते हैं। अपने हित के लिए जीना मानव-स्वभाव है; पर नेता पारस्परिक हित के लिए अपना तात्कालिक हित निवासियों के लिए छोड़कर टिकाऊ हित पाने का रवैया दिखाता है। पूर्वी सभ्यता ने 2,500 वर्ष पहले युद्धरत राज्यों के काल से गुज़रते हुए यह स्थिति देखी, मानव-स्वभाव को समझा, और राजनीतिक नैतिकता का दर्शन खड़ा किया। पूर्वी समाज में नेता के उदय की प्रक्रिया को प्रोफ़ेसर ओल्सन ने घुमंतू डाकुओं से स्थायी डाकुओं के उदय की प्रक्रिया से बहुत मिलती-जुलती स्थिति के रूप में चित्रित किया।

छोटा चोर पकड़ा जाता है, बड़ा चोर सामंत बन जाता है। (ज़ुआंगज़ी, “डाकू झी”)

सेना का गठन भी इसी प्रकार पारस्परिक हित से, नेता और निवासियों की सहमति से, होता है। स्थानीय डाकू, अर्थात नेता, अपनी और निवासियों की रक्षा के लिए सेना भी बनाता है। ऐसे विवेकी नेता को पाकर निवासी चाहते हैं कि वह आगे भी उनका नेतृत्व करता रहे, और “राजा चिरंजीवी हो!” (Long live the King!) की कामना करने लगते हैं। अंततः राजा और निवासी एक-दूसरे के हित के लिए सरकार नामक संस्था सहज रूप से बना लेते हैं। पर सरकार बन जाने से स्थिति सुलझ नहीं जाती। सरकार का नेतृत्व करने वालों और निवासियों के बीच पारस्परिक हित सुनिश्चित करने की रस्साकशी जारी रहती है। इसके द्वारा ओल्सन ने स्थानीय डाकू और निवासियों के संबंध से उपजने वाला राजनीतिक अर्थशास्त्र का एक प्राकृतिक सिद्धांत विकसित किया। दोनों पक्षों का पारस्परिक हित ही उसका केंद्र है।

यह दार्शनिक विचार उस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर देता है जिससे पश्चिम जूझ रहा है। स्वभाव या पालन-पोषण (nature or nurture) का प्रश्न पश्चिम में आज तक एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक समस्या बना हुआ है। हित की खोज सबका स्वभाव है; पालन-पोषण के द्वारा स्थानीय डाकू और निवासी अपने मन का प्रयोग करके वह समझौता-रेखा खोजते हैं जो दोनों के लिए लाभदायक हो। यही पूर्वी दर्शन का केंद्र है। पालन-पोषण के बिना हर कोई जन्मजात तात्कालिक लाभ ही साधने वाली बुरी सरकार और बुरे निवासी बन जाता है। यह बात विशेष रूप से नेताओं के लिए समस्या है। वास्तव में पश्चिम में बीसवीं शताब्दी तक ऐसे मूर्ख राजा रहे जो निवासियों के भविष्य की चिंता किए बिना अपने लाभ के लिए भारी कर वसूलते थे।

इतिहास इसका प्रमाण है। निरंकुश राजा अपने सैन्य उद्देश्यों के लिए प्रायः जितना हो सके उतना कर वसूलते थे। पश्चिमी इतिहास में सबसे व्यापक निरंकुश अधिकार रखने वाले राजाओं के बारे में सोचिए। बूर्बों वंश के राजाओं (विशेषकर फ़्रांसीसी क्रांति से पहले के राजा सहित) ने जितना हो सका उतना कर वसूला। स्पेन के हाब्सबर्ग राजा भी ऐसे ही थे। रोमन साम्राज्य ने भी अंततः कर बढ़ाने का प्रयास जारी रखा, और कम से कम राजस्व के स्रोतों की सीमा तक उसे अधिकतम कर दिया। 310

यह बात पूर्व में भी वैसी ही है। जब सम्राट सुशासन (善政) नहीं दे पाता, तो ऐसी स्थिति बनती है जिसमें वह निवासियों के हित को छोड़कर अंततः केवल अपना तात्कालिक लाभ साधने लगता है। स्वर्ग का आदेश लुप्त हो जाता है। पूर्व में जब राजवंश बदलते थे, तो नए राजवंश का पहला क़दम कर घटाना होता था। क्योंकि पतन की ओर जाता राजवंश कर और शोषण की सीमा को पहले ही अधिकतम तक बढ़ा चुका होता था। कर घटाना जन-मन जीतकर सुशासन देने और स्वर्ग का आदेश सुनिश्चित करने का विचार था। प्रोफ़ेसर ओल्सन का मानव-स्वभाव संबंधी सिद्धांत धर्म के मूल पाप के सिद्धांत या हॉब्स, लॉक और रूसो के मानव-स्वभाव सिद्धांतों से कहीं अधिक मानव-स्वभाव के सार के निकट है। और यह मानव-स्वभाव, सरकार के गठन और गठन के बाद के कार्यों की व्याख्या को आश्चर्यजनक रूप से अच्छी तरह व्यक्त करता है।

मानव-स्वभाव में अंतर्निहित हित के द्वारा नेता और सहभागी के बीच की समस्याओं को सुलझाने में ओल्सन पूर्व के मानव-स्वभाव सिद्धांत से मिलते-जुलते हैं। पश्चिमी सभ्यता मूलतः सिद्धांत और संस्थाएँ गढ़ने की दिशा में उन्मुख है। इसी आधार पर पश्चिम ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को आगे बढ़ाया, और सत्ता के तर्कसंगत परिवर्तन की संस्था बनाई। संस्थाओं के जिस पक्ष में पूर्व विफल रहा, उसमें पश्चिम सफल हुआ, और पूर्व पश्चिम से ये संस्थाएँ सीख रहा है। समस्या उस संस्था में है जो तय करती है कि सत्ता-परिवर्तन कैसे हो। पश्चिम की सभी राजनीतिक व्यवस्थाएँ दलीय व्यवस्था से चलती हैं। क्या दलीय व्यवस्था सचमुच ठीक से काम करेगी? समस्या यह है कि दलीय व्यवस्था का प्रबंधन भी वे मनुष्य करते हैं जो अब भी मानव-स्वभाव से बँधे हैं। प्रश्न यह है कि जब जनता का हित, यानी लोकहित, और दल की जीत, यानी निजी हित, आपस में टकराएँ, तो क्या पश्चिमी दल निजी हित का त्याग करके लोकहित की खोज कर सकते हैं? क्या मानव-स्वभाव इसकी अनुमति देगा?

जब तक युद्ध जैसी सबके साथ-साथ नष्ट होने की स्थिति सामने न हो, मानव-स्वभाव लोकहित के बजाय निजी हित ही चुनता है। द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हुए बहुत समय बीत चुका है, और आज के दल लोकहित के बजाय निजी हित चुनने के अभ्यस्त हैं। क्योंकि मानव-स्वभाव ऐसा ही है। जलवायु परिवर्तन या अमीर-गरीब की बढ़ती खाई जैसी वैश्विक समस्याएँ लोकहित के अंतर्गत आती हैं। पर दल इन समस्याओं के समाधान को गौण मानने और तुरंत अगला चुनाव जिताने वाले उपायों, यानी निजी हित, को आगे रखने के अभ्यस्त हैं। यहीं लोकतांत्रिक संस्थाओं की वह समस्या है जिसे प्रोफ़ेसर ओल्सन ने पहचाना। वे बताते हैं कि लोकतंत्र राजा, राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री जैसे राष्ट्र के नेताओं को राज्य के वित्त का मनमाना उपयोग करने से रोकने वाली एक अच्छी संस्था है, पर हित-समूहों को होड़ करके अपने-अपने हित साधने से रोकने में वह कोई ख़ास प्रभावी नहीं है।

यद्यपि लोकतंत्र अपने नेताओं को समाज के अधिशेष को मनमाने ढंग से निकालकर उपयोग करने से रोकने की बहुत अनुकूल स्थिति में है, फिर भी लंबे समय से स्थिर लोकतंत्र में विशेष हित-समूहों को देश की समूची आर्थिक नीति पर हावी होने से रोकना बहुत कठिन है।311

ओल्सन इस तथ्य को सीधे देख रहे थे कि “व्यक्तियों से बने समूह निजी हित के लिए काम करते हैं, लोकहित के लिए नहीं”। इसलिए उन्होंने पूर्वानुमान किया और चिंता जताई कि विशेष हित-समूहों द्वारा बनाई गई राजनीतिक-आर्थिक नीतियाँ लोकहित को हानि पहुँचाएँगी। पश्चिमी लोकतंत्र ने सर्वोच्च नेता को लोकहित की हानि करने से रोकने वाली सफल संस्थाएँ तो बनाईं, पर अब वह एक नई चुनौती के सामने है। उन्होंने यह रेखांकित किया कि पश्चिमी लोकतंत्र राज्यवाद (statism) से तो अच्छी तरह बचाव करता है, पर विशेष हित-समूहों, यानी कबीलावाद (tribalism), से बचाव में स्पष्ट रूप से कमज़ोर है। यह दलों और पूँजी का कारोबार करने वाले व्यवसायों के बीच उस साँठगाँठ पर एक पैनी अंतर्दृष्टि है जिससे आज पश्चिम गुज़र रहा है। 312

2) पूर्वी मानव-स्वभाव सिद्धांत: जन्मजात मानव-स्वभाव के भीतर बदलता मानवीय चरित्र

जब पूर्व और पश्चिम के विचारक मानव-स्वभाव का अध्ययन करते हैं, तो हर कोई उसे अपने-अपने पूर्वी या पश्चिमी दार्शनिक चिंतन की सीमा के भीतर परखता है। पश्चिम मानव-स्वभाव तक “सत्ता के दर्शन” से पहुँचता है: जब से ईश्वर ने मनुष्य को रचा, मानव-स्वभाव नहीं बदलता। चूँकि पश्चिम ऐसे मानव-स्वभाव सिद्धांत की परिकल्पना करता है जिसमें सब कुछ निश्चित है, इसलिए वह धार्मिक विधान, यानी क़ानूनों और संस्थाओं, से मानवीय चरित्र का प्रबंधन करने का दृष्टिकोण अपनाता है। इस प्रकार निश्चित किया गया मानव-स्वभाव सिद्धांत ईश्वर के साथ वाचा या सामाजिक अनुबंध को अपना ढाँचा बनाता है। पूर्व “परिवर्तन के दर्शन” से पहुँचता है: जन्म के समय मिलने वाला मानव-स्वभाव एक-सा है, पर उसी सीमा के भीतर उसे व्यक्त करने वाला मानवीय चरित्र बदलता चलता है। मानव-स्वभाव का प्रबंधन कैसे करके सकारात्मक “मानवीय चरित्र” गढ़ा जाए, यही पूर्वी सभ्यता का केंद्र है।

पूर्व में मानव-स्वभाव का सिद्धांत परिवर्तन के दर्शन का अनुसरण करता है। पूर्वी मानव-स्वभाव सिद्धांत का केंद्र यह है कि मनुष्य एक ही स्वभाव लेकर जन्म लेते हैं, पर उसी सीमा के भीतर जन्म के बाद शिक्षा और प्रयास के अनुसार मानवीय चरित्र बदलता है। यह सिद्धांत सहज वृत्ति और मन के संबंध का विश्लेषण सहज वृत्ति को प्रकाश का स्रोत और मन को दर्पण मानकर करता है। 313 अर्थात मानवीय चरित्र जन्म के बाद यिन और यांग की तरह “बदलता” है। अलौकिक ईश्वर के बजाय प्रकृति के दाओ (道) में विश्वास करने वाले पूर्व में, जैसे प्राचीन काल में ईश्वर और मनुष्य के बीच कोई वाचा नहीं थी, वैसे ही आधुनिक काल में भी सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत की आवश्यकता नहीं पड़ी। क्योंकि दाओ नामक प्रकृति के नियम पर आधारित पूर्वी मानव-स्वभाव सिद्धांत प्राचीन और आधुनिक काल में बिना बदले ज्यों का त्यों काम करता है।

पूर्वी मानव-स्वभाव सिद्धांत परिवर्तन के दर्शन पर आधारित है। मनुष्य जन्म से एक ही मानव-स्वभाव साझा करते हैं, पर जन्म के बाद अपना मानवीय चरित्र गढ़ते हैं। परस्पर जुड़ी सहज वृत्ति और मन, व्यक्ति के प्रयास के अनुसार, अनंत परिवर्तन दिखाने वाला चरित्र रचते चलते हैं। यहीं मानव-समाज की अनियमितता और उसका आकर्षण है। पश्चिमी दर्शन में मन और सहज वृत्ति के संबंध में विभाजन का प्रतिपादन करने वाला द्वैतवाद (dualism) है, जैसा देकार्त का मत है। इसके विरोध में एकत्ववाद (monism) है, जैसे मार्क्स का भौतिकवादी एकत्ववाद। यह पश्चिमी शैली का द्वैतवाद-एकत्ववाद विभाजन है। पर यदि हम पूर्व के मन-शरीर और ली-ची (理氣) सिद्धांतों की विषय-वस्तु का विश्लेषण करें, तो वे न मन-शरीर एकत्ववाद का प्रतिपादन करते हैं न मन-शरीर द्वैतवाद का, बल्कि वे पूरकता का सिद्धांत हैं, जिसके अनुसार मन और सहज वृत्ति “एक-दूसरे के पूरक होकर सामंजस्य बनाते हैं”।314 इसमें स्पिनोज़ा के मन और सहज वृत्ति को जोड़ने वाले सिद्धांत से कुछ समानता है। पर पूर्व का पूरकता का सिद्धांत, मन और शरीर की एकता (心身一體) के सिद्धांत की तरह, मन और सहज वृत्ति को अलग नहीं करता। पश्चिम ने मन और शरीर के संबंध पर “विभाजन या एकरूपता” के रूप में बहस की, पर पूर्व ने आरंभ से ही विभाजन को प्रश्न ही नहीं बनाया, और सामंजस्य तथा संतुलन को महत्त्व देने वाले “पूरकता के सिद्धांत” का प्रतिपादन किया।

पूर्व का चरित्र-निर्माण बनाम पश्चिम का सामाजिक अनुबंध का सिद्धांत

पश्चिम के सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत को उन पश्चिमी लोगों ने रचा जो हज़ार वर्षों से अधिक तक पश्चिमी संसार पर छाए रहे ईश्वर और मनुष्य के बीच की “वाचा” के सिद्धांत के प्रभुत्व में थे। यह ईश्वर की सभ्यता के प्रभुत्व में जीने वाले पश्चिमी लोगों के लिए किया गया प्रयास था। पश्चिम के क़ानूनों और संस्थाओं को महत्त्व देते हुए और सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत की सहायता लेकर नेताओं के लोकतांत्रिक परिवर्तन की संस्था स्थापित करना मानव-इतिहास में एक बहुत महत्त्वपूर्ण प्रगति है। यह बात पूर्व के लिए सीखने योग्य है। पर पूर्वी सभ्यता की दृष्टि से, सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत के आधार बने “पश्चिमी मानव-स्वभाव सिद्धांत” में कमियाँ हैं।

हॉब्स का अशुभ-स्वभाव सिद्धांत यह नहीं समझा पाता कि नेता को व्यवस्था क्यों बनाए रखनी चाहिए। इसकी कोई व्याख्या नहीं कि क्या नेता अशुभ-स्वभाव सिद्धांत का अपवाद है, या केवल नेता ही ईश्वर या मन के द्वारा परोपकार की भावना पाता है। लॉक के कोरी स्लेट के सिद्धांत में यह भूल, या ख़तरा, निहित है कि मन दर्पण के रूप में नहीं, बल्कि प्रकाश के स्रोत के रूप में सहज वृत्ति से मुक्त हो जाता है। कोरी स्लेट का यह विचार कि स्वतंत्रता सिखा देने भर से ऐसी सामाजिक व्यवस्था बन जाती है जिसे सब स्वीकार करते हैं, यथार्थ से परे है। रूसो का शुभ-स्वभाव सिद्धांत समस्या को मनुष्य में नहीं, सभ्यता में खोजता है, और उलटे यह निष्कर्ष निकालता है कि मानव-स्वभाव शुभ है। पर चूँकि सभ्यता भी मनुष्य से ही उपजती है, यह समस्या रह जाती है कि वह यह नहीं समझा सकता कि शुभ मानव-स्वभाव से बुरी सभ्यता कैसे निकली। उनके द्वारा प्रतिपादित सामान्य इच्छा का सर्वसत्तावादी विचार की ओर बह जाना संभव है। लगता है हॉब्स युद्ध और चरम संघर्ष के निरंतर वातावरण में बड़े हुए, और उसमें मानव-स्वभाव के अशुभ रूप में प्रकट होने को ही सामान्य मानव-स्वभाव मानने की भूल कर बैठे। यह प्रवृत्ति इससे मिलती-जुलती है कि पश्चिम के मैकियावेली (1469-1527) और हान फ़ेइज़ी (280-233 ई.पू.) ने, हॉब्स की ही तरह युद्ध और संघर्ष के निरंतर वातावरण में जीवन बिताकर, हॉब्स जैसा यह मानव-स्वभाव सिद्धांत खड़ा किया कि मनुष्य अशुभ है, और उसी के अनुसार अपने यथार्थवादी राजनीति (Realpolitik) के सिद्धांत रचे। और लगता है ऐसे मानव-स्वभाव के आधार पर हॉब्स ने ऐसा सामाजिक अनुबंध का सिद्धांत रचा जो अव्यवस्था के बीच व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक है, पर शांति-काल में लागू करना कठिन है।

लॉक का कोरी स्लेट का सिद्धांत मानव-स्वभाव को नकारता है। शिक्षा से मनुष्य बनता है, इस सिद्धांत ने शिक्षा को महत्त्व देने में योगदान दिया है। साथ ही यह एक बहुत ख़तरनाक मार्ग भी खोल देता है: हठधर्मी सिद्धांतों के बहकावे में आ जाने का। कोरी स्लेट के सिद्धांत के अनुसार मनुष्य स्वभाव से स्वतंत्र है। यदि मान लिया जाए कि उसका कोई स्वभाव नहीं, तो मनुष्य “कुछ भी कर सकने वाला मनुष्य” बन जाता है। भविष्य के लिए, या किसी काल्पनिक आदर्श-लोक के लिए, हठधर्मी सिद्धांतों से शिक्षा दी जाए, तो मनुष्य को नैतिकता की उपेक्षा करने वाला राक्षस बनाया जा सकता है। शिक्षा या सिद्धांत का संचालन कौन करता है और प्रशिक्षण कौन देता है, यही परिणाम पहले से तय कर देता है। लॉक और कन्फ़्यूशियसवाद, दोनों शिक्षा को महत्त्व देते हैं। पर यह पहचानना होगा कि पश्चिम की ताबुला रासा शैली की शिक्षा और पूर्व की कन्फ़्यूशियसवादी शिक्षा की मानव-स्वभाव संबंधी नींव बहुत भिन्न है। पश्चिम का मत है कि “ताबुला रासा” वाले मनुष्य का कोई स्वभाव नहीं, इसलिए शिक्षा और प्रशिक्षण से कुछ भी संभव है। पूर्व का दावा है कि स्वभाव होता है, और वह चरित्र-निर्माण पर केंद्रित है, यह मानते हुए कि उसी स्वभाव की सीमा के भीतर नैतिकता और शिक्षा से मनुष्य को मनुष्य बनाया जा सकता है। वह स्वभाव की सीमा के भीतर चरित्र की शिक्षा पर बल देता है। इस अर्थ में पूर्वी शिक्षा नैतिकता के सिद्धांतों के विरुद्ध नहीं जा सकती। पर मानव-स्वभाव को स्वीकार न करने वाला लॉक का यह सिद्धांत कि स्वभाव न शुभ है न अशुभ (性無善惡論), नैतिकता से परे जाने वाले या उससे विश्वासघात करने वाले विचारों को खड़ा करना संभव बना देता है।

रूसो का शुभ-स्वभाव सिद्धांत ईसाई धर्म के अशुभ-स्वभाव सिद्धांत के विपरीत एक क्रांतिकारी मानव-स्वभाव सिद्धांत है। यह पश्चिमी दार्शनिक व्यवस्था को नई संभावनाएँ देता है। पर शुभ-स्वभाव और सामान्य इच्छा में उनके विश्वास का आधार कमज़ोर है। रूसो के शुभ-स्वभाव सिद्धांत से उपजी सामान्य इच्छा के सदा सही हो सकने का विश्वास निराधार विश्वास है। इस “विश्वास” का दुरुपयोग लोकतांत्रिक सरकारें बनाने के बजाय तानाशाही व्यवस्थाओं को उचित ठहराने में हुआ। वास्तव में 1789 की फ़्रांसीसी क्रांति रोबेस्पियर आदि के आरंभिक नेक इरादों के बावजूद अंततः आतंक के शासन में समाप्त हुई। बीसवीं शताब्दी के विचारधाराओं के युग में भी फ़ासीवादी और साम्यवादी तानाशाहियों ने दावा किया कि उनकी पूरी राजनीति “सामान्य इच्छा” को प्रतिबिंबित करती है। लॉक और रूसो के मानव-स्वभाव और सामाजिक अनुबंध के सिद्धांतों के बल पर पश्चिमी सभ्यता में व्यक्ति की स्वतंत्रता विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाती है। “मुझे स्वतंत्रता दो, या मृत्यु दो!” (Give me liberty, or give me death!) पुकारने वाले पैट्रिक हेनरी (1736-1799) के कथन की तरह, स्वतंत्रता को मानो एक निरपेक्ष नैतिकता माना जाने लगा। पर उदारवाद अंततः आत्म-संरक्षण नामक अधिक मूलभूत प्रस्थापना के सामने अपनी शक्ति खो देता है। ब्रिटेन का “ब्रेक्ज़िट” (Brexit, यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के निकलने की घोषणा) हमें एक बार फिर यह लौह-नियम याद दिलाता है कि “उदारवाद” जैसी प्रबल नैतिकता से अधिक महत्त्वपूर्ण मानव-स्वभाव पर आधारित “आत्म-संरक्षण” है। न केवल ब्रिटेन, बल्कि अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी देशों के पास भी स्थिति कठिन होने पर राष्ट्र और जनता के संरक्षण के लिए स्वतंत्रता या मानवाधिकारों से अधिक महत्त्वपूर्ण आत्म-संरक्षण के सिद्धांत की खोज करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं। आत्म-संरक्षण का यह सिद्धांत हाल में पश्चिम में तेज़ी से बल पकड़ रहा है। स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व महत्त्वपूर्ण घोषणाएँ हैं। जहाँ तक हो सके इनका पालन करने से ही समाज या राज्य स्वस्थ रह सकते हैं। पर ये मन की रचनाएँ हैं। अंततः स्थिति बदलने पर इन सिद्धांतों को निरपेक्ष प्रस्थापनाओं के रूप में बनाए रखना असंभव हो जाता है। क्योंकि उन्हें सहज वृत्ति से समझौता करना पड़ता है। अर्थात यह याद रखना होगा कि मन और सहज वृत्ति के संबंध में सहज वृत्ति कर्म का स्रोत है, और मन सहज वृत्ति में अंकित सीमा के भीतर स्वतंत्रता का उपभोग करता है।

पश्चिम के “सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत” के स्थान पर पूर्व “चरित्र-निर्माण का सिद्धांत” प्रस्तुत करता है। ऐसी भिन्न दिशाएँ इसलिए संभव हैं क्योंकि पूर्व और पश्चिम मानव-स्वभाव के सिद्धांत में मूलभूत अंतर दिखाते हैं। चरित्र-निर्माण करने वाला मानव-स्वभाव सिद्धांत सहज वृत्ति और मन का विश्लेषण कैसे करता है, और उनके जुड़ाव को कैसे परिकल्पित करता है? जैसे नया मस्तिष्क सहज वृत्ति को मिटा नहीं सकता, वैसे ही उलटा भी सच है। पुराना मस्तिष्क मनुष्य की मानसिक क्षमता को न उत्पन्न कर सकता है, न मिटा सकता है। यह नियति है कि मनुष्य में अन्य पशुओं की तरह मूल इच्छाएँ और भावनाएँ हैं। इसी प्रकार यह भी नियति है कि मनुष्य में मानसिक क्षमता है। उसे न मिटाया जा सकता है, न बदला जा सकता है। अर्थात मनुष्य सहज वृत्ति की नियति की सीमा के भीतर मानसिक क्षमता की स्वतंत्रता का उपभोग करता है। रसेल, मन और भावावेग को संघर्ष और विरोध के संबंध में देखने वाली पश्चिमी सभ्यता के बोझ तले भी, यह अनुमान लगाते हैं कि क्या मन और भावावेग को अंततः सामंजस्य में नहीं आना चाहिए:

इच्छा, भावना या भावावेग (आप कौन-सा शब्द चुनें, यह आपकी स्वतंत्रता है) ही कर्म के एकमात्र संभव कारण हैं। बुद्धि कर्म का कारण नहीं, केवल उसका नियामक है। 315

मनुष्य का अस्तित्व अंततः “नियति के भीतर स्वतंत्रता” की शर्त के साथ जन्म लेता है। ऐसा नहीं कि मनुष्य पशु की तरह जी सकता है और नहीं जीता, बल्कि वह कितना भी प्रयास करे, ऐसा नहीं कर सकता। पशुओं से भिन्न, मनुष्य नया मस्तिष्क लेकर जन्म लेता है। यहाँ मनुष्य दो संभावनाएँ प्रकट कर सकता है: पुराने मस्तिष्क की सहज वृत्ति को स्वार्थ से भरे लोभ में बदलने वाला भी नया मस्तिष्क है, और सहज वृत्ति में विद्यमान थोड़े से परोपकार को जुटाकर मनुष्य से नेता बन सकने वाला चरित्र प्रकट करवाने वाला भी नया मस्तिष्क ही है। पर याद रखना होगा कि मानव-स्वभाव में स्वार्थ परोपकार से कहीं अधिक प्रबल रूप में विद्यमान है।

मनुष्य करुणा की अपेक्षा प्रतिशोध की ओर अधिक सहजता से झुकते हैं। (स्पिनोज़ा, नीतिशास्त्र, IV, परिशिष्ट, XIII)

मानव-स्वभाव की इस व्यवस्था को नैतिक बोध के नाम पर दोष नहीं दिया जा सकता। क्योंकि स्वार्थ, यानी इच्छा, मानव-स्वभाव का केंद्र है, हमारे जीवित रहने का कारण है, और सभ्यता को चलाने वाली शक्ति है।

इच्छा मनुष्य का सार है, अर्थात वह प्रयास जिससे मनुष्य अपने अस्तित्व को बनाए रखने का प्रयत्न करता है। (स्पिनोज़ा, नीतिशास्त्र, IV, प्रमेय IV; IV, प्राक्कथन)

पर सहज वृत्ति ही वह शक्ति बनती है जो “मानवीय चरित्र” तय करती है, यानी यह कि मन की शक्ति से वह किस दिशा में “व्यक्त” होती है। चिकित्सा-विज्ञान यह सिद्ध करता जा रहा है कि सहज व्यवहार और अर्जित व्यवहार इतनी गहराई से परस्पर जुड़े हैं कि दोनों के बीच भेद करना भी ग़लत है।

अब तक जुटाए गए प्रमाणों से स्पष्ट हो रहा है कि ‘सहज’ व्यवहार को ‘अर्जित’ व्यवहार से बिल्कुल असंबद्ध, अलग व्यवहार मानना अयथार्थ और ग़लत है। दोनों आपस में घुले-मिले हैं।316

यह कथन कि सहज व्यवहार और अर्जित व्यवहार में भेद करना अयथार्थ है, दिखाता है कि सहज वृत्ति और मन एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। नैतिक भाषा में कहें तो स्वार्थ और परोपकार के संघर्ष के बीच मनुष्य परोपकार को बढ़ा सकता है। इसके उलट मनुष्य स्वार्थ को भी चरम तक बढ़ा सकता है। मनुष्य सहज वृत्ति द्वारा दी गई “नियति की सीमा” को पहचानता है, और उस सीमा के भीतर मन जितना चाहे उतना स्वतंत्र हो सकता है। यही उसकी पूरी स्वतंत्रता है। मन सहज वृत्ति की उपेक्षा करके स्वतंत्र गतिविधि नहीं कर सकता।

ऐसा भी होता है कि इस मानव-स्वभाव पर आधारित मानवीय मामले इतिहास में ज्यों के त्यों व्यक्त होते हैं। पश्चिम का आधुनिक काल के आरंभ का इतिहास यह दिखाता है। पश्चिम में प्रबोधन-काल और देववाद के उदय से पश्चिमी लोगों के बीच आस्तिकवाद में विश्वास पूरी तरह मिट नहीं गया। पश्चिमी विचारकों में देववाद व्यापक रूप से फैला, पर बहुत से लोग देववाद के बौद्धिक तर्कों से निरपेक्ष, आस्तिकवाद में ज्यों का त्यों विश्वास और भरोसा करते रहे। धर्म अपने भीतर के हठधर्म को अस्वीकार करने की प्रक्रिया से, यानी इस मान्यता से कि बाइबल या ईश्वर का वचन निरपेक्ष नहीं, गुज़रने के बाद भी मनुष्य के लिए एक आवश्यक तत्त्व बना रहता है। क्योंकि मानव-स्वभाव मानसिक कम, और बहुत हद तक भावनात्मक और सहज वृत्तिमूलक है। विशेष रूप से यदि यह मानव-स्वभाव सिद्धांत स्वीकार कर लिया जाए कि सहज वृत्ति प्रकाश का स्रोत है और मन दर्पण, तो धर्म की आवश्यकता बनी रहती है।

इस “भावनात्मक” परिघटना की व्याख्या उस “विरोधाभास” से होती है कि मनुष्य की बौद्धिक क्षमता में सीमाएँ और संभावनाएँ, दोनों एक साथ हैं। आधुनिक पश्चिमी संस्कृति में इस विरोधाभास को लंबे समय तक अस्वीकार किया गया। शास्त्रीय भौतिकी ऐसे विरोधाभास को अस्वीकार करते हुए ही बनी। पर जैसा इस प्रमाण से दिखता है कि प्रकाश में कण और तरंग, दोनों के गुण हैं, विरोधाभास को उलटे प्रकृति के मूल गुण के रूप में भी स्वीकार किया जा सकता है। परमाणु से छोटी पदार्थ की इकाइयाँ कभी कणों की तरह, कभी तरंगों की तरह व्यवहार करती हैं। प्रकाश भी यही द्वैत दिखाता है।317 वास्तव में आइंस्टाइन द्वारा प्रकाश के कण-स्वरूप को सिद्ध करने से यह प्रमाणित हुआ कि मन और शरीर की तरह एक साथ द्वैत और एकत्व वाली वस्तु प्रकृति-जगत में भी विद्यमान है। प्रकाश का द्वैत उस अधिक गहरे और महत्त्वपूर्ण द्वैत का संकेत है जो पूरी प्रकृति में सार्वभौमिक होता जा रहा है, और शायद यह प्रकृति का सार्वभौमिक गुण है।

माना जाता है कि प्रकाश कुछ परिस्थितियों में कणों की धारा की तरह और अन्य परिस्थितियों में तरंग की तरह व्यवहार करता है। यह ‘तरंग-कण द्वैत’ हमारे सामान्य बोध से मेल नहीं खाता। पर यह प्रकाश संबंधी प्रयोगों के परिणामों से अच्छी तरह मेल खाता है।318

प्रकाश की तरह एक साथ द्वैत और एकत्व वाले मनुष्य के मन और शरीर के संबंध का वर्णन इस प्रकार किया गया है:

मैं नहीं मानता कि शरीर और आत्मा एक शुद्ध और मौलिक द्वैत बनाते हैं। मुझे तो वे अनेक संभव विभाजनों में से एक प्रतीत होते हैं। और यह संभव विभाजन उस ध्रुवता (ध्रुवीकरण) के द्वारा यथार्थ में प्रकट होता है जिसे मैंने, बहुत अयथार्थ ढंग से ही सही, विषयी और विषय का विरोध कहा था।319

अंततः चिंतन की दृष्टि से प्रकृति में एकत्व और द्वैत के सामंजस्य को अपवाद नहीं, बल्कि सार्वभौमिक नियम के रूप में देखना होगा। पश्चिमी दर्शन ने इसे विरोधाभास माना, पर पूर्वी दर्शन ने, जैसा यिन और यांग के सिद्धांत में दिखता है, इस तथ्य को स्वाभाविक रूप से स्वीकार किया कि विरोधों का सामंजस्य या पूरकता प्रकृति में अंतर्निहित है।

सहज वृत्ति प्रकाश का स्रोत, मन दर्पण

पूर्वी मानव-स्वभाव सिद्धांत में सहज वृत्ति और मन की भूमिका को सबसे विश्वसनीय ढंग से ई युलगोक ने समझाया: “सभी परिघटनाओं में ची (氣, सहज वृत्ति) गतिमान होता है, और ली (理, मन) उस पर सवार होकर प्रकट होता है।” लगभग यही मानव-स्वभाव सिद्धांत पश्चिम में लगभग तीन शताब्दी बाद सामने आता है। रसेल ने इसे व्यक्त किया: “मन सहज वृत्ति का स्वामी नहीं, केवल उसका सेवक है।” “मन सहज वृत्ति को मिटा नहीं सकता; वह केवल उसका नियमन करता है।” फ़्रायड का मानव-स्वभाव सिद्धांत भी मिलता-जुलता था: “मन (अहं) घोड़े की लगाम थामे रहता है, पर सहज वृत्ति (इदम्) नामक घोड़ा कभी भी लगाम तोड़कर भाग सकता है।” मानव-स्वभाव वह है जो हम जन्म से लेकर आते हैं, और उसी के भीतर मानवीय चरित्र बदलता है। सहज वृत्ति प्रकाश का स्रोत बनती है, और मन दर्पण।

यह दिखाता है कि मनुष्य के कर्म में सहज वृत्ति प्रकाश के स्रोत की भूमिका निभाती है, और मन उसे ग्रहण करके दर्पण की भूमिका।320 पूर्वी मानव-स्वभाव सिद्धांत जिस मानवीय चरित्र को केंद्रीय मानता है, वह इसी प्रकार सहज वृत्ति और मन की भूमिकाओं के जुड़कर सक्रिय होने से उत्पन्न होता है। सहज वृत्ति प्रकाश का स्रोत और मन दर्पण, भूमिकाओं का यह बँटवारा उन वैज्ञानिक तथ्यों से भी मेल खाता है जिन्हें आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान लगातार उजागर कर रहा है। आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान भी शरीर-रचना की भाषा में मिलती-जुलती बात कहता है: “नया मस्तिष्क (मन) लिम्बिक तंत्र (सहज वृत्ति) पर वैसे ही सवार बैठा है जैसे कोई सवार बिना लगाम के घोड़े पर बैठा हो।”

पश्चिमी मानव-स्वभाव सिद्धांत का दावा है कि मनुष्य के सोचने वाले मन, यानी नए मस्तिष्क, ने ही अंततः मानव-इतिहास रचा। यह ऐसी घोषणा है जो मनुष्य की चर्चा करते समय नए और पुराने मस्तिष्क की भूमिका के बारे में भ्रांति की बड़ी गुंजाइश छोड़ती है। आइए एक बार फिर इस बात पर विचार करें कि पुराना मस्तिष्क कर्म का स्रोत है, और नया मस्तिष्क केवल उसका नियमन करता है। विशेष रूप से भूमिकाओं के इस बँटवारे पर विचार करें कि मनुष्य के कर्म का स्रोत केवल पुराने मस्तिष्क से आता है, और नया मस्तिष्क उसे बढ़ाने या घटाने का नियामक काम ही करता है, तो हम समस्या की जड़ तक पहुँच सकते हैं।

यह कहना कि नया मस्तिष्क इतिहास रचता है, एक अधूरा विचार है, जिसके अनुसार मन और सहज वृत्ति के संबंध में मन सहज वृत्ति की पूरी भूमिका का स्थान ले सकता है। पर विशेष रूप से पश्चिमी सभ्यता ने दावा किया कि मन, यानी नया मस्तिष्क, स्वायत्त होकर नया संसार और नया मानव-स्वभाव रच सकता है। हमें स्वीकार करना होगा कि मनुष्य की संभावनाएँ केवल उसी से फैल सकती हैं जो हम जन्म से लेकर आए हैं, यानी केवल सहज वृत्ति की सीमा के भीतर। इस सीमा को पार करना चाहना, यानी केवल “मन की क्षमता” पर ध्यान केंद्रित करके सहज वृत्ति की मूल भूमिका को कम आँकना, यही पश्चिमी सभ्यता का सार है। इससे सहज वृत्ति की उपेक्षा करके, “ईश्वर द्वारा केवल मनुष्य को दिए गए मन” पर सब कुछ दाँव पर लगाकर आदर्श-लोक को साकार करने का दुस्साहस हो सकता है। ऐसी परिघटना पश्चिमी इतिहास में वास्तव में घटी: पश्चिम द्वारा रचा गया बीसवीं शताब्दी का विचारधाराओं का युग। पर ऐसे प्रयासों में मानव-स्वभाव की उपेक्षा चरम सीमा तक होती है, इसलिए वे आसानी से नैतिकता को रौंदने वाली त्रासदियों को जन्म देते हैं।

सहज वृत्ति को पश्चिम में मानवीय दासता (human bondage) के रूप में और पूर्व में ची (氣) के रूप में समझा जाता है। जब पश्चिम सहज वृत्ति को मानवीय दासता समझता है, तो वह यह मानना चाहता है कि सहज वृत्ति न हो तो मनुष्य मन का स्वतंत्र उपयोग करके अनंत संभावनाओं की खोज कर सकता है। सहज वृत्ति नामक दासता को छोड़कर ईश्वर की तरह स्वतंत्र हो जाना, यूनानी काल से आज तक पश्चिमी लोगों का सपना रहा है। जीवन का लक्ष्य भी सुखी होना है, और अरस्तू के बाद से पश्चिमी लोगों ने मनुष्य द्वारा प्राप्य सर्वोच्च सुख की अवस्था को “ईश्वर की तरह सुखी होना” कहकर परिभाषित किया। वास्तव में यूनानी-रोमन काल में देवताओं और मनुष्यों में अधिक अंतर नहीं माना जाता था, और अर्ध-देवता भी थे। रोमन काल में एक समय ऐसा भी था जब किसी व्यक्ति के दाह-संस्कार के समय कोई यह गवाही दे देता कि उसने उसकी आत्मा को (ऊपर उठते) देखा, तो उस व्यक्ति को देवता माना जाता था।

इसके विपरीत पूर्वी सभ्यता प्रकृति के रचयिता ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करती थी, और उस दर्शन पर आधारित थी जो प्रकृति, यानी प्रकृति के दाओ, को परम मूल्य मानता है। पूर्व के प्रकृति-दर्शन ने पश्चिम से भिन्न, सहज वृत्ति को शक्ति का स्रोत समझा। ची के बिना ली काम नहीं कर सकता। बात यह है कि सहज वृत्ति को मनुष्य के कर्म का स्रोत स्वीकार किया जाए, और उसी के भीतर मनुष्य की संभावनाएँ खोजी जाएँ। इस प्रकार मानवीय चरित्र केवल मानव-स्वभाव के भीतर, यानी केवल सहज वृत्ति की सीमा के भीतर, मन की भूमिका के अनुसार बनता है। यह मानना कि मन स्वतंत्र रूप से सहज वृत्ति को छोड़कर आदर्श-लोक की खोज में निकल सकता है, मानव-स्वभाव के बारे में एक मूलभूत भूल करना है।

पश्चिम मन और सहज वृत्ति की भूमिकाओं के बँटवारे तक पूर्व से भिन्न ढंग से पहुँचता है। ईश्वर की सभ्यता में, चूँकि मन ईश्वर द्वारा मनुष्य को विशेष रूप से दिया गया है, सहज वृत्ति की उपेक्षा करने वाला विरोधमूलक विभाजन अनिवार्य है। “मन ऊपर, सहज वृत्ति नीचे” भूमिकाओं का यह बँटवारा पश्चिमी सभ्यता की मुख्य धारा बनाता है। यह दो हज़ार वर्षों से अधिक से चला आ रहा है। पर यह दावा कि मन और सहज वृत्ति को बाँटा नहीं जा सकता और उन्हें एक ही मानना चाहिए, वही मानव-स्वभाव है जिसकी परिकल्पना पूर्वी सभ्यता करती है, और ऐसे दावे पश्चिम में भी सामने आते हैं। निस्संदेह, उन्हें एक मानने का सबसे प्रसिद्ध मत सत्रहवीं शताब्दी में स्पिनोज़ा का है: “मन और शरीर एक ही वस्तु हैं।” मन और शरीर की ही दूसरी अभिव्यक्ति, “मनोविज्ञान और शरीर-क्रिया”, को भी एक इकाई मानने वाला मत चिकित्सा-ग्रंथों में लगातार पुष्ट हो रहा है: “मनोविज्ञान और शरीर-क्रिया एक अविभाज्य इकाई हैं।” बौद्धिक क्षमता भी मनुष्य की शरीर-क्रिया, इच्छाओं और भावनाओं की सीमा से बाहर नहीं जा सकती।

मनोविज्ञान और शरीर-क्रिया एक अविभाज्य इकाई के अतिरिक्त कुछ नहीं 321

दूसरे शब्दों में, बौद्धिक क्षमता को उसी दिशा की ओर लक्षित होना पड़ता है जिस ओर शरीर-क्रिया, इच्छाएँ और भावनाएँ लक्षित होती हैं: आत्म-संरक्षण और परिवेश के साथ अनुकूलन। पर सहज वृत्ति के साथ-साथ मनुष्य के पास मन की भूमिका भी है। स्पिनोज़ा ने मानवीय दासता शब्द का प्रयोग इस अर्थ में किया कि जो मनुष्य मन का उपयोग नहीं कर पाता, वह सहज वृत्ति के दास की तरह जीने लगता है।

मनुष्य अनिवार्यतः सदा भावावेगों के अधीन रहता है (स्पिनोज़ा, नीतिशास्त्र, IV, प्रमेय IV)।

स्पिनोज़ा ने मानव-स्वभाव में भावावेग की केंद्रीय भूमिका को महत्त्वपूर्ण माना, पर साथ ही भावावेग के संबंध में मन जो भूमिका निभा सकता है, उसे भी महत्त्वपूर्ण माना। उनका विश्लेषण था कि मन की भूमिका तो है, पर मनुष्य मन के परामर्श का पालन नहीं करता।

भावावेग ही मनुष्य का स्वभाव है। भावावेग के द्वारा मनुष्य अपने अस्तित्व की निरंतर पुष्टि करता रहता है… मनुष्य मन के परामर्श का पालन नहीं करता। (स्पिनोज़ा, नीतिशास्त्र, IV, प्रमेय XVIII)

भावावेग और मन के जुड़ाव का प्रतिपादन करने वाले स्पिनोज़ा के इस यथार्थवाद के विपरीत, पश्चिमी सभ्यता मन की भूमिका को चरम तक बढ़ाने की अभ्यस्त है। यह दावा कि मन मानव-स्वभाव सिद्धांत का स्रोत है, सुकरात के बाद ईसाई सिद्धांतों के साथ घुलकर मध्य युग पर छाया रहा, और आधुनिक काल में देकार्त के बुद्धिवाद के रूप में पश्चिम में प्रबल हुआ। यहाँ से एक क़दम और आगे बढ़ें, तो यह वैचारिक दावा संभव हो जाता है कि मन ही सब कुछ है। आधुनिक काल के आरंभ का पश्चिमी दर्शन तथाकथित बुद्धिवादियों के हाथ में था। बाइबल में लिखे इस सिद्धांत को कि मन ईश्वर ने मनुष्य को दिया है, देकार्त जैसे बुद्धिवादी धर्म से अलग होकर “वैज्ञानिक और तर्कसंगत” पद्धतियों से प्रतिपादित करने लगे। इससे पश्चिम में यह सोचने की आदत बन गई कि ईश्वर से अलग होकर भी मन ही मनुष्य का कर्ता है।

इन बुद्धिवादियों के विरुद्ध सिद्धांत ब्रिटिश अनुभववाद (Empiricism) में मिलता है। अनुभववादियों का अनुसरण करने पर यह विचार सामने आता है कि मनुष्य के कर्म का कर्ता मन नहीं, सहज वृत्ति है। जैसा पहले बताया गया, ह्यूम (Hume) का कहना था कि “बुद्धि भावावेगों की दासी है, और उसे केवल दासी ही रहना चाहिए”। मनुष्य के सभी कर्मों का स्रोत सहज वृत्ति से आता है। मानव-विकास की प्रक्रिया पर दृष्टि डालें, तो इस विश्लेषण को और अधिक समझा जा सकता है। इस दृष्टि से पुराना मस्तिष्क प्रकाश के स्रोत की भूमिका निभाता है, और नया मस्तिष्क दर्पण की। तब नैतिकता का स्रोत भी सहज वृत्ति से ही आता है। क्योंकि यदि सहज वृत्ति में ऐसा स्रोत न होता, तो नैतिकता उत्पन्न ही नहीं हो सकती थी। दूसरे शब्दों में, यह सिद्धांत कि मन प्रकाश का स्रोत नहीं बल्कि दर्पण है, इस विश्लेषण से समझाया जाता है कि नैतिकता का स्रोत मन में नहीं, भावना में है। कई विचारकों ने अपनी दूरदर्शिता से यह विचार पहले ही भाँप लिया था कि मन दर्पण है। स्पिनोज़ा, डेविड ह्यूम, रसेल आदि ने यह दूरदर्शिता दिखाई। साथ ही आधुनिक युग में आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान की सहायता से यह दिखाने वाली महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक खोजें लगातार हो रही हैं कि मन और सहज वृत्ति परस्पर जुड़े हैं।

नैतिकता को भावना पर आधारित करने वाला ह्यूम का सिद्धांत, मानव-स्वभाव सिद्धांत में, मूलतः नैतिकता को मन पर आधारित करने वाले कांट के सिद्धांत का प्रतिपक्ष है। ह्यूम का यह सिद्धांत पूर्व-पश्चिम के मानव-स्वभाव सिद्धांतों से मेल खाता है। ह्यूम के लिए नैतिकता भावना के दर्पण के रूप में बनती है, जबकि कांट के लिए मन भावना को छोड़कर स्वयं प्रकाश के स्रोत के रूप में नीति और नैतिकता गढ़ने की भूमिका निभाता है। कांट के यहाँ नीति सहज वृत्ति से मुक्त पूर्ण “स्वतंत्रता” का उपभोग करती है। ह्यूम “सहज वृत्ति के भीतर स्वतंत्रता” का प्रतिपादन करते हैं, और कांट “सहज वृत्ति से अलग स्वतंत्रता” का। वास्तव में ह्यूम के जटिल सिद्धांत की अपेक्षा कांट के दावों को पश्चिमी बुद्धिवाद का समर्थन मिला। कांट ने, ईश्वर का स्थान मन को देते हुए, यह तर्क रखा कि नीति मन के द्वारा, मानो ईश्वर की दी हुई हो, अब भी एक निर्विवाद कर्तव्य के रूप में मनुष्य के भीतर विद्यमान है। पश्चिमी बुद्धिवादियों ने उन्हें “कोपर्निकसीय” क्रांति करने वाला माना।

ह्यूम को पश्चिम के प्रमुख विचारकों ने स्पिनोज़ा की ही तरह धर्मत्यागी मान लिया। धर्म पर ह्यूम की पुस्तक प्राकृतिक धर्म पर संवाद उनके जीवनकाल में छिपाकर रखी गई और मृत्यु के बाद (1779) प्रकाशित हुई। धार्मिक दृष्टि से भी ह्यूम पर “विधर्मी” होने का संदेह किया गया, और इसी कारण वे दर्शन का प्राध्यापक पद पाने में विफल रहे। अठारहवीं शताब्दी, जिसमें ह्यूम रहे, वह समय था जब ईश-निंदा (瀆神罪, blasphemy) एक मान्य अपराध था। ह्यूम के जन्म से चौदह वर्ष पहले, 1697 में, एडिनबरा में बीस वर्ष के छात्र टॉमस एकनहेड (Thomas Aikenhead) को फाँसी दी गई: पता चला था कि उसने मुहम्मद का उल्लेख किया था और मित्रों से कहा था कि त्रित्व के सिद्धांत आदि पश्चिमी धर्म की कुछ बातें बेतुकी हैं। उसका अभियोग ईश-निंदा था। ह्यूम का यह दावा कि सहज वृत्ति प्रकाश का स्रोत है और मन दर्पण, उस समय भी प्रबल, मन को महत्त्व देने वाले ईश्वर-केंद्रवादी विचार के लिए स्वीकार करना कठिन था।

परिवर्तनशील मानव-स्वभाव सिद्धांत: गाओज़ी का “स्वभाव न शुभ न अशुभ” सिद्धांत, मेंशियस का शुभ-स्वभाव सिद्धांत, शुनज़ी का अशुभ-स्वभाव सिद्धांत

पूर्व का परिवर्तन का दर्शन पूर्वी चिंतन के मूल सिद्धांत, “सदा बदलती प्रकृति” की ब्रह्मांड-दृष्टि, से उपजता है। पूर्व का मानव-स्वभाव सिद्धांत परिवर्तन के दर्शन पर आधारित है: “मनुष्य सहज वृत्ति और मन से बना एक ही मानव-स्वभाव लेकर जन्म लेता है। पर जन्म के बाद वह जो आचरण व्यक्त करता है, यानी मानवीय चरित्र, वह भिन्न होता है।” पूर्व के ये मत कि स्वभाव न शुभ है न अशुभ (गाओज़ी), कि स्वभाव शुभ है (मेंशियस), और कि स्वभाव अशुभ है (शुनज़ी), सभी इसी व्यवस्था का अनुसरण करते हैं। महत्त्वपूर्ण यह है कि न बदलने वाले मानव-स्वभाव को स्वीकार करते हुए भी, चूँकि जन्म के बाद बदलने वाला मानवीय चरित्र ही महत्त्वपूर्ण है, वे आत्म-साधना और शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करते हैं। ये मानव-स्वभाव सिद्धांत परिवर्तन के दर्शन नामक प्रकृति-दर्शन का अनुसरण करते हैं। चूँकि पूर्वी मानव-स्वभाव सिद्धांत को न धर्म से जोड़ा गया, न सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत से, इसलिए पश्चिम के प्राचीन और आधुनिक मानव-स्वभाव सिद्धांतों से भिन्न, उसमें एक ही मानव-स्वभाव सिद्धांत के प्राचीन काल से आज तक चलते रहने की टिकाऊ शक्ति है।

गाओज़ी (告子, 420-350 ई.पू.) पूर्वी विचारकों में पहले थे जिन्होंने मानव-स्वभाव पर अपने विचार छोड़े। गाओज़ी मानते थे कि मनुष्य और अन्य पशुओं में कोई अंतर नहीं। मनुष्य दो इच्छाएँ लेकर जन्म लेता है: भूख और काम। उनका दावा है कि पशुओं में भी न शुभ है न अशुभ, और मनुष्यों में भी न शुभ है न अशुभ। वे शुभ-स्वभाव और अशुभ-स्वभाव, दोनों सिद्धांतों को नकारते हैं, और यह प्रतिपादित करते हैं कि स्वभाव न शुभ है न अशुभ (性無善惡論):

गाओज़ी मानते थे कि मनुष्य का स्वभाव शुभ (善) और अशुभ (不善) में बँटा हुआ नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे जल पूर्व और पश्चिम में बँटा हुआ नहीं होता। (मेंशियस 6A:2)

गाओज़ी की मानव-स्वभाव पर चिंतन वाली पुस्तकें आगे की पीढ़ियों तक नहीं पहुँचीं। मेंशियस की पुस्तक में जो उद्धृत है, वही गाओज़ी के मानव-स्वभाव संबंधी विचारों के बारे में हमारा सारा ज्ञान है। मेंशियस की पुस्तक मेंशियस के छठे खंड, “गाओज़ी” (告子), में मानव-स्वभाव संबंधी विविध व्याख्याएँ हैं। गाओज़ी का यह दर्शन कि स्वभाव न शुभ है न अशुभ (性無善惡論), व्याख्या के अनुसार, अरस्तू या लॉक के कोरी स्लेट के सिद्धांत जैसा है। पर पूर्व में किसी ने भी गाओज़ी के इस मानव-स्वभाव संबंधी मत को विकसित करके अपने समाज-सुधार के सिद्धांत में उसका उपयोग नहीं किया। गाओज़ी का यह सिद्धांत सत्ता के दर्शन का नहीं, पूर्व के परिवर्तन के दर्शन का अनुसरण करता था। उस स्थिति में बहुत संभव है कि गाओज़ी ने भी ऐसे मानव-स्वभाव सिद्धांत का प्रतिपादन किया हो जिसमें अच्छाई-बुराई मानव-स्वभाव से तय नहीं होती, बल्कि बल जन्म के बाद बदलने वाले मानवीय चरित्र के पोषण पर होता है। पश्चिम के कोरी स्लेट के सिद्धांत और गाओज़ी के “स्वभाव न शुभ न अशुभ” दर्शन का यही मूलभूत अंतर है: सत्ता के दर्शन और परिवर्तन के दर्शन का अंतर।

गाओज़ी के बाद विचारकों का चिंतन “स्वभाव न शुभ न अशुभ” के बजाय “स्वभाव में शुभ या अशुभ है” की दिशा में स्थिर होता है। वह मेंशियस के शुभ-स्वभाव सिद्धांत और शुनज़ी के अशुभ-स्वभाव सिद्धांत में बँट जाता है। पर पूर्व के शुभ-स्वभाव और अशुभ-स्वभाव सिद्धांत उस सत्ता के दर्शन पर नहीं रुकते जिसमें मनुष्य अपने स्वभाव से बँधा हो। वे परिवर्तन के दर्शन से इस तक पहुँचते हैं: स्वभाव जो भी हो, मनुष्य को मानवीय चरित्र के “पोषण” के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ करना चाहिए। मानवीय चरित्र के पोषण को अंतिम लक्ष्य मानने में मेंशियस और शुनज़ी में कोई अंतर नहीं, और पीछे जाएँ तो दोनों के गुरु कन्फ़्यूशियस के यहाँ भी यही केंद्रीय लक्ष्य अपरिवर्तित है। इस दृष्टि से देखें तो गाओज़ी का “स्वभाव न शुभ न अशुभ” सिद्धांत भी, परिवर्तन के दर्शन की स्थिति से, मानवीय चरित्र के पोषण पर ध्यान केंद्रित करने में मेंशियस के शुभ-स्वभाव सिद्धांत या शुनज़ी के अशुभ-स्वभाव सिद्धांत से भिन्न नहीं माना जा सकता।

मेंशियस (372-289 ई.पू.) ने गाओज़ी के मत के विपरीत यह स्थापित किया कि मनुष्य और पशु में अंतर है। मनुष्य जल जैसा नहीं। मनुष्य पूर्व और पश्चिम में नहीं, ऊपर और नीचे में बँटते हैं। उनका तर्क था कि यदि मनुष्य शुभ और अशुभ में भेद न करे, तो मानवता और न्याय (仁義) जैसी नैतिकता ढह जाएगी:

हर मनुष्य में ऐसा हृदय है जो दूसरों का दुःख सह नहीं सकता… करुणा का हृदय मानवता (仁) का अंकुर है; लज्जा का हृदय न्याय (義) का अंकुर है; विनय का हृदय रीति (禮) का अंकुर है; सही और ग़लत में भेद करने वाला हृदय प्रज्ञा (知) का अंकुर है। मनुष्य में ये चार अंकुर वैसे ही हैं जैसे हमारे चार अंग हैं। (मेंशियस 2A:6)

यही मेंशियस के शुभ-स्वभाव सिद्धांत (性善說) का सार है। उन्होंने समझाया कि मानवता, न्याय, रीति और प्रज्ञा चार हृदयों से प्रकट होते हैं: करुणा का हृदय (惻隱之心), लज्जा का हृदय (羞惡之心), विनय का हृदय (辭讓之心), और सही-ग़लत जानने वाला हृदय (是非之心)। पश्चिम में रूसो ने भी शुभ-स्वभाव सिद्धांत का प्रतिपादन किया, पर उन्होंने मनुष्य के बिगड़ने की समस्या की जड़ सभ्यता या संस्थाओं में खोजी और समाज-सुधार के द्वारा उसे ठीक करना चाहा। उनका कहना था: “मनुष्य स्वभाव से शुभ जन्म लेता है, पर समाज उसे भ्रष्ट कर देता है।” यदि रूसो ने समस्या बाहर खोजनी चाही, तो मेंशियस ने भीतर। मेंशियस ने शुभ-स्वभाव में आने वाली बाधाओं को व्यक्ति के बाहरी परिवेश या शिक्षा की कमी में देखा, और प्रयास तथा साधना में समाधान खोजना चाहा। मेंशियस ने समझाया कि मनुष्य जन्म से ही नैतिकता लेकर आता है। कठिनाई में पड़े व्यक्ति को देखकर उसकी सहायता करने की, और दुर्भाग्य झेलते व्यक्ति को देखकर उसके साथ न्याय करने की इच्छा हर किसी में होती है। मेंशियस मानते थे कि यह नैतिकता शिक्षा जैसी परिस्थितियों के अनुसार प्रकट भी हो सकती है और छिपी भी रह सकती है। उनका तर्क था कि जैसे सुकाल और अकाल के अनुसार फ़सल भिन्न होती है, वैसे ही शिक्षा के अनुसार मनुष्य की नैतिकता प्रकट भी हो सकती है और छिपी भी रह सकती है। मेंशियस के शुभ-स्वभाव सिद्धांत का निष्कर्ष यह है कि जैसे प्रकृति को सुकाल मिलता है, वैसे ही मनुष्य का अच्छा पोषण किया जाए।

शुनज़ी (310-235 ई.पू.) अपनी पुस्तक शुनज़ी के तेईसवें अध्याय, “मानव-स्वभाव अशुभ है”, में अपनी स्थिति स्पष्ट करते हैं। शुनज़ी के अशुभ-स्वभाव सिद्धांत में महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य ऐसा जन्मजात स्वभाव लेकर पैदा होता है जो, अपने हाल पर छोड़ दिया जाए तो, सामाजिक जीवन को कठिन बना देता है:

मनुष्य का स्वभाव अशुभ है; उसमें जो शुभ है, वह बाद में गढ़ा जाता है… यदि केवल स्वभाव का अनुसरण किया जाए और केवल भावनाओं के अनुसार चला जाए, तो परस्पर लड़ने और छीनने वाला हिंसक समाज ही बनेगा। इसलिए क़ानून और नैतिकता आवश्यक हैं। नैतिकता और क़ानून के द्वारा लोग एक-दूसरे के लिए त्याग करते हैं और मानदंडों का पालन करते हैं, और एक स्थिर समाज बनाया जा सकता है। (शुनज़ी 23:1)

यही शुनज़ी के अशुभ-स्वभाव सिद्धांत का सार है, और उसकी जड़ मानव-स्वभाव को जैसा है वैसा, प्राकृतिक अवस्था में, देखने में है। नेता (जुनज़ी, 君子) हो या सहभागी (शियाओरेन, 小人), दोनों मनुष्य के रूप में अनिवार्यतः एक ही जन्मजात स्वभाव लेकर पैदा होते हैं:

स्वभाव वह है जिसके साथ हम जन्म लेते हैं। स्वभाव को न सीखकर बदला जा सकता है, न श्रम करके परिवर्तित किया जा सकता है। नैतिकता और क़ानून ज्ञानियों (聖人) की उपलब्धि हैं। वे सीखकर बनाए गए हैं, परिवर्तन करके बनाए गए हैं। (शुनज़ी 23:5)

अतः सभी मनुष्य अपने हित की खोज करते हैं, और बेलगाम छोड़ दिए जाएँ तो समाज में झगड़ों तक बात पहुँचने की संभावना रहती है। लोभ के पीछे चलने की प्रवृत्ति नेता और सहभागी, दोनों जन्म से लेकर आते हैं। शुनज़ी का लक्ष्य इसका पोषण करना है ताकि यह सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने में सहायक हो। पश्चिम में हॉब्स ने अशुभ-स्वभाव सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए अपने हित के लिए लड़ने वाले मनुष्यों के लिए “मनुष्य मनुष्य के लिए भेड़िया है” अभिव्यक्ति का प्रयोग किया। “मनुष्य मनुष्य के लिए भेड़िया है” अभिव्यक्ति लैटिन सूक्ति “Homo homini lupus est” से आई है। यह प्राचीन रोमन नाटककार प्लाउटस (Plautus) द्वारा सबसे पहले प्रयुक्त, मानव-समाज के स्वरूप को निर्ममता से उघाड़ने वाला वाक्यांश है। हॉब्स ने एक सामाजिक समाधान प्रस्तुत किया: चूँकि प्राकृतिक अवस्था अराजकता या युद्ध की अवस्था जैसी है, इसलिए प्रबल शक्ति वाला निरंकुश राजा आवश्यक है।

जहाँ हॉब्स बाहरी समाधान खोजते हैं, वहीं शुनज़ी भीतरी समाधान प्रस्तुत करते हैं। शुनज़ी का बल इस पर था कि चूँकि मनुष्य जन्म से स्वार्थी इच्छाएँ रखता है, इसलिए व्यक्तिगत प्रयास और शिक्षा से उन्हें परिष्कृत किया जाए, ताकि नेता और सहभागी में से मनुष्य नेता जैसा बने। शुनज़ी के अशुभ-स्वभाव सिद्धांत में मानव-स्वभाव को सुधारने का कोई विचार नहीं है। बात यह है कि मनुष्य को सहज रूप से, जैसा वह है वैसा, देखकर उसका प्रबंधन किया जाए और ऐसा मानवीय चरित्र पोषित किया जाए जो समाज के लिए सहायक हो।

गाओज़ी, मेंशियस और शुनज़ी के मानव-स्वभाव सिद्धांत परिवर्तन के दर्शन वाले हैं। इस बात में उनका आरंभ-बिंदु पश्चिम के सत्ता के दर्शन वाले मानव-स्वभाव सिद्धांतों से भिन्न है। पूर्व का परिवर्तन का दर्शन समझना कठिन है। उसके अनुसार सहज वृत्ति में मनुष्य एक जैसे हैं, पर मन के प्रयास के अनुसार उन कर्मों में अंतर आ जाता है जिनमें सहज वृत्ति प्रकट होती है। उनका मानना था कि नेता और सहभागी में मानव-स्वभाव का कोई अंतर नहीं, पर जन्म के बाद जो वे सीखते हैं उसके अनुसार कर्म में प्रकट होने वाले मानवीय चरित्र में अंतर आ जाता है।

स्वभाव में ज्ञानी (聖人) भी सामान्य जनता से भिन्न नहीं होते। वे कर्म में भिन्न होते हैं। (शुनज़ी 23:5)

मेंशियस और शुनज़ी, दोनों कन्फ़्यूशियसवादी विचारक हैं। उनके गुरु कन्फ़्यूशियस ने मिलता-जुलता मानव-स्वभाव सिद्धांत रखकर पहले ही उनके दर्शन की नींव डाल दी थी।

स्वभाव से मनुष्य सब एक-से हैं। पर कर्म में मनुष्य बहुत भिन्न दिखते हैं। (संवाद 17:2)

परिवर्तन के दर्शन का अनुसरण करने वाले पूर्वी मानव-स्वभाव सिद्धांत में पश्चिम के सत्ता के दर्शन वाले मानव-स्वभाव पर आधारित सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत के उभरने की आवश्यकता नहीं होती। हॉब्स, लॉक और रूसो के मानव-स्वभाव सिद्धांत मानते हैं कि मनुष्य ऐसा ही जन्मा है और बदलता नहीं, इसलिए इसी आधार पर वे संस्थाओं और क़ानूनों को महत्त्व देने वाले सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत सामने रखते हैं। और उनके द्वारा रखे गए सामाजिक अनुबंधों के अनुसार मनुष्य का मूल्यांकन अच्छाई-बुराई के रूप में होने लगता है।

गाओज़ी, मेंशियस और शुनज़ी के मानव-स्वभाव सिद्धांत मानवीय चरित्र के उस बदलने वाले पक्ष पर ध्यान केंद्रित करते हैं, कि मनुष्य मानव-स्वभाव लेकर जन्मता तो है, पर जन्म के बाद वह कैसा मनुष्य बनता है। अपने प्रयास के अनुसार मनुष्य या तो समाज के लिए सहायक चरित्र वाले व्यक्ति बनते हैं या समाज के लिए असहायक चरित्र वाले। मेंशियस का शुभ-स्वभाव सिद्धांत या शुनज़ी का अशुभ-स्वभाव सिद्धांत यह सत्ता के दर्शन वाली व्याख्या नहीं कि मनुष्य भला है या बुरा।322 वह केवल यह कहने का ढंग है कि नियति से और प्रकृति से मनुष्य ऐसा बना है। यह व्याख्या कि मानव-स्वभाव अपरिवर्तनीय रूप से शुभ निश्चित है, मेंशियस के दर्शन का केंद्र नहीं। इसी प्रकार यह विचार कि मानव-स्वभाव अपरिवर्तनीय रूप से अशुभ निश्चित है, शुनज़ी के दर्शन का केंद्र नहीं। मेंशियस और शुनज़ी मानते हैं कि मनुष्य, चाहे शुभ स्वभाव लेकर जन्मे या अशुभ, सामाजिक जीवन में समस्याएँ उत्पन्न करने को बाध्य है। मेंशियस के दर्शन का केंद्र यह है कि शुभ जन्म लेने वाला भी जन्म के बाद सामाजिक जीवन में बुरे प्रभाव झेल सकता है, इसलिए उसे स्वयं को भली-भाँति साधना चाहिए और शिक्षा पानी चाहिए ताकि उसका शुभ पक्ष बढ़ता जाए। शुनज़ी का अशुभ-स्वभाव सिद्धांत भी ऐसी दार्शनिक व्यवस्था है जो प्रबल स्वार्थ को नैतिकता और क़ानून के अनुसार भली-भाँति साधकर उत्तम मानवीय चरित्र देना चाहती है। मेंशियस और शुनज़ी, दोनों के लिए केंद्र मानव-स्वभाव नहीं, बल्कि मानवीय चरित्र का पोषण है।

मेंशियस के शुभ-स्वभाव सिद्धांत और शुनज़ी के अशुभ-स्वभाव सिद्धांत में महत्त्वपूर्ण है वह आगमन जो नैतिकता पर जाकर समाप्त होता है। पश्चिम के सत्ता के दर्शन में महत्त्वपूर्ण यह है कि शुभ-स्वभाव या अशुभ-स्वभाव का महत्त्व निगमनात्मक और अपरिवर्तनीय है। हॉब्स के अशुभ-स्वभाव सिद्धांत में वे संस्थाएँ और व्यवस्था महत्त्वपूर्ण हैं जिनके द्वारा व्यक्ति अपने अधिकार राजा को सौंपता है, और रूसो का शुभ-स्वभाव सिद्धांत सामान्य इच्छा को सुनिश्चित करने वाली संस्थाएँ और क़ानून बनाने पर केंद्रित है। इसलिए पश्चिमी व्यवस्थाओं का केंद्र यह है कि अशुभ या शुभ, सत्ता के दर्शन वाले मानव-स्वभाव को क़ानून और संस्थाओं से नियंत्रित किया जाए। इसके विपरीत पूर्व के परिवर्तन के दर्शन में शुभ-स्वभाव और अशुभ-स्वभाव का महत्त्व आगमनात्मक, परिवर्तन का महत्त्व है। मानदंडात्मक क़ानून नहीं, बल्कि समझाने-बुझाने वाली नैतिकता महत्त्वपूर्ण हो जाती है।

इस दृष्टि से पूर्व का स्वभाव-सिद्धांत भवन (becoming) का सिद्धांत है। मेंशियस का शुभ-स्वभाव सिद्धांत और शुनज़ी का अशुभ-स्वभाव सिद्धांत, दोनों मानवीय चरित्र के पोषण को उत्पन्न करने पर केंद्रित हैं। क्या मनुष्य “निश्चित मानव-स्वभाव” (fixed human nature) लेकर जन्म लेता है, इस प्रश्न पर पूर्वी मानव-स्वभाव सिद्धांत का उत्तर स्पष्ट है। मानव-स्वभाव में शुभ और अशुभ, दोनों हैं। अर्थात मनुष्य प्रबल स्वार्थ और दुर्बल परोपकार, दोनों लेकर जन्म लेता है। पूर्व में, यिन और यांग की तरह, मनुष्य की यह सहज वृत्ति, यानी पुराना मस्तिष्क, दोनों संभावनाएँ लेकर जन्म लेती है। केंद्रीय बात यह है कि जन्म के बाद नया मस्तिष्क इस यिन-यांग वाले मानव-स्वभाव का प्रबंधन करते हुए मानवीय चरित्र को प्रबुद्ध स्वार्थ की ओर उन्मुख करके गढ़ता चले।

अच्छे चरित्र वाले व्यक्ति को देखो, तो उसके जैसा बनने का प्रयास करो; बुरे चरित्र वाले व्यक्ति को देखो, तो अपने भीतर झाँको और उसके जैसा न बनने का प्रयास करो। (संवाद 4:17)

शुनज़ी भी मिलता-जुलता मत व्यक्त करते हैं। हर मनुष्य ज्ञानी बन सकता है। महत्त्वपूर्ण यह है कि वह स्वयं ऐसा चाहे, और नैतिकता तथा क़ानून इसमें उसकी सहायता कर सकते हैं। चरित्र-निर्माण ही लक्ष्य बन जाता है।

सड़क का आदमी भी ज्ञानी बन सकता है। वह नैतिकता और पारदर्शी क़ानून से ऐसा बन सकता है। (शुनज़ी 23:11)

पूर्व में स्वभाव संबंधी मत भिन्न हों, तब भी इस पर सहमति है कि उसकी सीमा के भीतर मानवीय चरित्र के पोषण का लक्ष्य साधना चाहिए। पर पश्चिम का स्वभाव-सिद्धांत पहले से निर्धारित उद्देश्य की ओर बढ़ने में प्रयुक्त होता है, अर्थात सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत पर लागू होता है। पश्चिम का अशुभ-स्वभाव सिद्धांत राजा के अधिकार को मान्यता देने में प्रयुक्त हुआ, कोरी स्लेट का सिद्धांत उदारवाद के विस्तार में, और शुभ-स्वभाव सिद्धांत जन-संप्रभुता की ओर बढ़ने में। इस प्रकार पूर्व और पश्चिम के स्वभाव-सिद्धांत अपने उद्देश्यों और लक्ष्यों में मूलभूत अंतर दिखाते हैं। इसी कारण पूर्व के स्वभाव-सिद्धांत को भवन (Becoming) के सिद्धांत के रूप में और आगमनात्मक रूप में देखा जा सकता है। इसके विपरीत पश्चिम के मानव-स्वभाव को सत्ता (Being) के सिद्धांत के रूप में और निगमनात्मक रूप में देखा जा सकता है।

दोहराना होगा कि मेंशियस और शुनज़ी के मानव-स्वभाव सिद्धांतों का बल शुभ-स्वभाव या अशुभ-स्वभाव के सत्ता के दर्शन पर नहीं, बल्कि जन्मजात स्वभाव की सीमा के भीतर परिवर्तन के दर्शन के द्वारा सही मानवीय चरित्र के पोषण पर है। पूर्वी मानव-स्वभाव सिद्धांत का उद्देश्य यह है कि जन्मजात मानव-स्वभाव को स्वीकार किया जाए, उसकी सीमा के भीतर नैतिकता और क़ानून से उसका प्रबंधन किया जाए, और सही मानवीय चरित्र विकसित करके समाज का हित किया जाए। यह ऐसा मानव-स्वभाव सिद्धांत है जो धर्म या तत्त्वमीमांसीय सिद्धांतों से प्रभावित नहीं हुआ, और पूर्व में प्राचीन काल से आज तक बिना बदले लागू होता है।

3) मानव-स्वभाव का प्रबंधन: पूर्व में नियति के भीतर स्वतंत्रता बनाम पश्चिम में नियतिवाद और स्वतंत्र इच्छा का विरोध

पृथ्वी पर अनगिनत पेड़ हैं। एक पेड़ पर बहुत-सी पत्तियाँ होती हैं। फिर भी हर पत्ती अलग आकार की होती है। संसार में दो एक जैसी पत्तियाँ नहीं हैं। पृथ्वी पर मनुष्य भी अब आठ अरब से अधिक हो चुके हैं। हर कोई अलग चरित्र लेकर जीता है। पृथ्वी पर दो ऐसे व्यक्ति नहीं जो एक जैसा चरित्र लेकर जीवन बिताएँ। तब हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि मनुष्य एक ही स्वभाव लेकर जन्म लेते हैं, पर सब अलग-अलग चरित्र लेकर जीते हैं। पूर्वी सभ्यता मानती है कि मानव-स्वभाव जन्मजात है, पर मानवीय चरित्र जन्म के बाद बनता है। फिर भी मानवीय चरित्र स्वभाव से स्वतंत्र नहीं। वह स्वभाव के भीतर विद्यमान “प्रबल स्वार्थ और दुर्बल परोपकार की पारस्परिक क्रिया” की सीमा के भीतर गति करता है। और उस सीमा के भीतर कोई कैसा मानवीय चरित्र पा सकता है, यह पूरी तरह व्यक्ति पर निर्भर है। “प्रकाश के स्रोत के रूप में सहज वृत्ति, दर्पण के रूप में मन”, ऐसे स्वभाव के साथ जन्म लेने वाला मनुष्य “नियति के भीतर स्वतंत्रता” का उपभोग करता है।

अंततः सभी मनुष्य एक ही मानव-स्वभाव की सीमा के भीतर जन्म लेते हैं। निस्संदेह मानव-स्वभाव में हम पर शासन करने वाले विविध भावावेगों की प्रबलता में अंतर होता है, और स्वार्थ तथा परोपकार के सापेक्ष आकार में भी अंतर होता है। पर यह नकारना कठिन है कि हम प्रबल स्वार्थ, दुर्बल परोपकार और दूसरों पर प्रभुत्व जमाने का भावावेग लेकर जन्म लेते हैं। उदाहरण के लिए, दूसरों पर प्रभुत्व जमाने का प्रबल भावावेग लेकर जन्मे लोगों में भी यह सहज वृत्ति किस दिशा में व्यक्त होती है, यह पूरी तरह शिक्षा और उनके अपने प्रयास पर निर्भर है। द्वितीय विश्वयुद्ध में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले दो व्यक्तियों के नाम पूछे जाएँ, तो चर्चिल और हिटलर का नाम आएगा। दोनों विरल स्वभाव लेकर जन्मे थे: अपना प्रभुत्व फैलाने का प्रबल भावावेग। पर एक इतिहास में सम्मानित व्यक्ति बना, और दूसरे को लगभग पागल माना जाता है। ऐसा इसलिए हुआ कि दोनों को स्वभाव ने नहीं, बल्कि परिवेश और उनके अपने प्रयास ने अलग किया। अंततः मानव-स्वभाव नहीं, बल्कि मानवीय चरित्र तय करता है कि कोई व्यक्ति कैसा है, और वही इतिहास में उसके मूल्यांकन को तय करने वाला कारक बनता है।

मानव-सभ्यता मानव-स्वभाव में अंतर्निहित स्वार्थ से उपजती है। पर यदि इस स्वार्थ का प्रबंधन न किया जाए, तो सभ्यता टिक नहीं सकती। पूर्व की नैतिकता और पश्चिम का धार्मिक विधान मानव-स्वभाव के स्वार्थ का प्रबंधन करने के लिए ही आरंभ हुए। पश्चिमी सभ्यता का आरंभ इस धारणा से होता है कि क़ानून और नैतिकता ईश्वर ने मनुष्य को दिए। मूसा की दस आज्ञाएँ और यीशु की पड़ोसी-प्रेम की नैतिकता, दोनों ईश्वर से आई हैं। पूर्व क़ानून और नैतिकता को मानव-स्वभाव से उपजा हुआ समझाता है। मानव-स्वभाव को उसके हाल पर छोड़ दिया जाए, तो मानव-समाज में झगड़े और होड़ अनिवार्य हैं। स्वार्थ मानव-स्वभाव का सबसे प्रबल अंश है। और स्वार्थ ही मानव-समाज की चालक शक्ति है। इसीलिए विचार यह है कि क़ानून और नैतिकता बनाकर मानव-समाज का प्रबंधन किया जाए। यहाँ महत्त्वपूर्ण यह है कि क़ानून ईश्वर नहीं, मनुष्य बनाएगा, इसलिए वह अंततः आसानी से समस्याएँ पैदा करता है; अतः क़ानून से ऊपर की अवधारणा, नैतिकता, को क़ानून से अधिक महत्त्वपूर्ण मानना ही पूर्वी सभ्यता है। दाओ दे जिंग और संवाद की केंद्रीय अवधारणा नैतिकता है। पूर्व और पश्चिम की सभ्यताओं की तुलना करें, तो पूर्व में यह विचार निहित है कि ईश्वर द्वारा सूचित धार्मिक विधान से अधिक महत्त्व दाओ द्वारा सूचित नैतिकता को दिया जाए। नैतिकता ईश्वर के आदेश से नहीं, बल्कि मानव-स्वभाव का प्रबंधन करने के लिए मानव-समाज में आत्म-संरक्षण के सिद्धांत के द्वारा स्थापित हुई है।

मेंशियस और शुनज़ी के शुभ-स्वभाव और अशुभ-स्वभाव सिद्धांतों की पड़ताल करते हुए हम देख सकते हैं कि मानव-स्वभाव पर उनकी चर्चा का अंतिम पड़ाव मानवीय चरित्र की शिक्षा है। मेंशियस का शुभ-स्वभाव सिद्धांत और शुनज़ी का अशुभ-स्वभाव सिद्धांत सामाजिक अनुबंध का सिद्धांत गढ़ने के लिए नहीं, बल्कि नैतिकता की शिक्षा पर केंद्रित हैं। मेंशियस और शुनज़ी की पुस्तकें इस परिभाषा पर केंद्रित नहीं कि मानव-स्वभाव ऐसा है, बल्कि इस पर कि ऐसे स्वभाव वाले मनुष्य को शिक्षा के द्वारा अच्छा मानवीय चरित्र कैसे दिया जा सकता है। इस दृष्टि से मेंशियस और शुनज़ी, दोनों अपने गुरु कन्फ़्यूशियस जैसे हैं। क्योंकि कन्फ़्यूशियस मानव-स्वभाव पर चर्चा किए बिना मानवीय चरित्र के पोषण पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

वे मानवता, न्याय, रीति और प्रज्ञा को उस चरित्र के लक्ष्यों के रूप में प्रस्तुत करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो मनुष्य को पाना चाहिए। यह उस दर्शन से मिलता-जुलता है जो पश्चिम ने प्रबोधन-काल से गुज़रते हुए मानव-स्वभाव पर विचार करके रचा। विशेष रूप से यह बेंजामिन फ़्रैंकलिन के दर्शन जैसा ही है। फ़्रैंकलिन पश्चिमी तत्त्वमीमांसा की पड़ताल करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि तत्त्वमीमांसीय बहस का कोई बड़ा अर्थ नहीं। और वे लिखते हैं कि जीवन जीने के लिए महत्त्वपूर्ण वह है जिसे मनुष्य ने सदा महत्त्व दिया है: मनुष्यों के आपसी संबंध, यानी दूसरों का ध्यान, निष्ठा, परिश्रम, ईमानदारी आदि।

इस अर्थ में माना जा सकता है कि मानव-स्वभाव पर पूर्व की चर्चा तत्त्वमीमांसा छोड़कर पहले ही ठोस “मानवीय चरित्र” के पक्ष तक पहुँच चुकी थी। महत्त्वपूर्ण यह है कि मानवीय चरित्र स्वभाव और मन की सहमति से बनता है; अर्थात चरित्र को वह माना गया जिसे मन स्वभाव तक पहुँचकर रचता है। इस दृष्टि से मेंशियस की प्रागनुभविक नैतिक दृष्टि को सहज वृत्ति में विद्यमान परोपकार की शिक्षा के रूप में देखा जा सकता है। इस अर्थ में मेंशियस की प्रागनुभविकता का यह महत्त्वपूर्ण अर्थ है कि वह सहज वृत्ति पर टिकी है। पर मेंशियस का सहज वृत्ति के प्रबल स्वार्थ के बजाय केवल दुर्बल परोपकार को महत्त्व देना शायद मनुष्य के अंतिम चरित्र-निर्माण के लिए उनका अपना प्रयास हो। फिर भी प्रबल स्वार्थ की उपेक्षा के लिए उन्हें शुनज़ी के अशुभ-स्वभाव सिद्धांत की आलोचना झेलनी पड़ती है। और शुनज़ी, पूरा ध्यान प्रबल स्वार्थ पर केंद्रित करके दुर्बल परोपकार की उपेक्षा करने के कारण, मेंशियस के अनुयायियों की आलोचना के पात्र हो सकते हैं। चूँकि परोपकार भी सहज वृत्ति का अंश है, इसलिए शुनज़ी का यह विचार कि सारी नैतिकता जन्म के बाद उपजती है, प्रागनुभविकता पर पर्याप्त ध्यान नहीं देता। पर ध्यान देना होगा कि मेंशियस और शुनज़ी, दोनों का विचार सहज वृत्ति और मन की परस्पर पूरक भूमिकाओं से चरित्र गढ़ने का है। यदि पश्चिमी मानव-स्वभाव सिद्धांत अंततः सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत या क़ानूनों और संस्थाओं में विकसित हुआ, तो कहा जा सकता है कि पूर्वी मानव-स्वभाव सिद्धांत अंततः मानवीय चरित्र के सिद्धांत, यानी राजनीतिक नैतिकता और राजनीतिक अर्थशास्त्र में विकसित हुआ।

क़ानून और नैतिकता अंततः मानव-स्वभाव से उपजते हैं। पहले देखा गया शुनज़ी का मानव-स्वभाव दर्शन इसे भली-भाँति व्यक्त करता है: “यदि केवल स्वभाव का अनुसरण किया जाए और केवल भावनाओं के अनुसार चला जाए, तो परस्पर लड़ने और छीनने वाला हिंसक समाज ही बनेगा। इसलिए क़ानून और नैतिकता आवश्यक हैं।” “स्वभाव वह है जिसके साथ हम जन्म लेते हैं। स्वभाव को न सीखकर बदला जा सकता है, न श्रम करके परिवर्तित किया जा सकता है। नैतिकता और क़ानून ज्ञानियों (聖人) ने बनाए हैं।” 323

यदि हम स्वभाव के सिद्धांत और पालन-पोषण के सिद्धांत के संबंध को पूर्वी ढंग से सुलझाएँ, तो “नियतिवाद और स्वतंत्र इच्छा” की वह समस्या, जिससे पश्चिम इतना जूझता है, लुप्त हो जाती है। ईश्वर की सभ्यता ने, यह विश्वास करते हुए कि ईश्वर ने मनुष्य को रचा और वह मानवीय मामलों की देखरेख करता है, “नियतिवाद और स्वतंत्र इच्छा” की कठिन समस्या स्वयं ही खड़ी कर ली। मानव-स्वभाव नियतिवाद के अनुरूप अंश है। पालन-पोषण स्वतंत्र इच्छा के अनुरूप अंश है। अंततः मनुष्य को स्वभाव और पालन-पोषण, दोनों की आवश्यकता है। स्वभाव के बारे में कुछ नहीं किया जा सकता, क्योंकि हम उसे लेकर ही जन्मते हैं। पर उस स्वभाव को सामाजिक जीवन के लिए उपयोगी बनाना पालन-पोषण की भूमिका है। पश्चिम की ईश्वर की सभ्यता में अंतर्निहित संघर्ष के सिद्धांत से नियतिवाद और स्वतंत्र इच्छा की समस्या सुलझाना कठिन है। इस विचार का अनुसरण करें कि ईश्वर सब कुछ तय करता है, तो यह नियतिवाद का समर्थन है। पर मनुष्य के मन की भूमिका पर बल दें, तो यह स्वतंत्र इच्छा का समर्थन है। कठिनाई इस स्थिति से उपजती है कि दोनों में से एक को चुनना होगा। पर पूर्व की दाओ की सभ्यता में अंतर्निहित सामंजस्य के सिद्धांत का अनुसरण करें, तो समस्या आसानी से सुलझ जाती है। यह सोचें कि नियतिवाद और स्वतंत्र इच्छा, दोनों आवश्यक हैं, तो यह समस्या लुप्त हो जाती है। पुराना मस्तिष्क नियतिवाद है और नया मस्तिष्क स्वतंत्र इच्छा। इसलिए दोनों पर एक साथ विचार करने से ही मानव-स्वभाव की पहेली सुलझती है। पर एक शर्त है: नया मस्तिष्क पुराने मस्तिष्क के ढाँचे के भीतर स्वतंत्र है। अर्थात नियति के भीतर स्वतंत्रता की अवधारणा सिद्ध होती है।

पूर्वी सभ्यता शिक्षा को इतना महत्त्व क्यों देती है, यह प्रश्न भी आसानी से सुलझ जाता है। अपना प्रयास और शिक्षा वह परम और जीवन-मरण का कार्य बन जाते हैं जिसे मनुष्य को जन्म लेने के बाद हर हाल में करना ही है। इसीलिए दाओ की सभ्यता में शिक्षा ईश्वर की सभ्यता से लगभग दो हज़ार वर्ष पहले आरंभ हुई। ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में मेंशियस की माता द्वारा पुत्र की शिक्षा के लिए तीन बार कठिनाई से घर बदलकर शिक्षा के लिए परिश्रम करने की कथा हर माता-पिता जानते हैं।

मध्य युग के हज़ार वर्षों के ईश्वर-केंद्रवादी युग में सब कुछ बाइबल में लिखा था, और उसका भली-भाँति पालन करके स्वर्ग जाना ही सर्वोच्च लक्ष्य था। बाइबल के अतिरिक्त कुछ पढ़ने की आवश्यकता नहीं थी। मध्य युग के हज़ार वर्षों पर छाई शिक्षा विद्वद्वाद (स्कोलैस्टिसिज़्म), यानी बाइबल का अध्ययन, थी। वह प्रज्ञा की नहीं, ज्ञान की शिक्षा थी। लगभग हज़ार वर्षों तक पश्चिम में केवल धर्म और ईश्वर संबंधी पुस्तकें ही प्रकाशित हुईं। धर्म से बाहर की पहली पुस्तकें चौदहवीं शताब्दी में पुनर्जागरण के समय प्रकाशित हुईं। इसलिए चरित्र-निर्माण में रुचि के मामले में पूर्व और पश्चिम के बीच दो हज़ार वर्षों का अंतर है। पश्चिम में चरित्र-निर्माण पर केंद्रित राष्ट्रीय शिक्षा में रुचि लॉक और रूसो आदि के प्रभाव से अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में वास्तविक रूप से आरंभ होती है। ईसा पूर्व छठी शताब्दी के कन्फ़्यूशियस का संवाद आदि से अंत तक चरित्र-निर्माण की पुस्तक है। वह नेता (君子) गढ़ने पर केंद्रित है। मेंशियस और शुनज़ी के शुभ-स्वभाव और अशुभ-स्वभाव सिद्धांत चरित्र-निर्माण की भूमिका जैसे हैं। उनके मानव-स्वभाव सिद्धांतों ने चरित्र-निर्माण के द्वारा नेता गढ़ने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रवेशिका की भूमिका भर निभाई।

पूर्वी सभ्यता में शुभ-स्वभाव और अशुभ-स्वभाव के सिद्धांत लोगों के मन में “स्वभाव में शुभ और अशुभ दोनों हैं” वाले सिद्धांत के रूप में स्थिर हो गए: मानव-स्वभाव में स्वार्थ और परोपकार, दोनों हैं। पर पश्चिमी सभ्यता ने दूसरा मार्ग अपनाया। हॉब्स का अशुभ-स्वभाव सिद्धांत उनके सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत का केंद्र है, इसलिए उसका न सामंजस्य हो सकता है न संशोधन। वह राजतंत्र के समर्थन के लिए था, इसलिए राजतंत्र के ढहने के साथ उनका अशुभ-स्वभाव सिद्धांत अपना आधार खो बैठा। लॉक का स्वतंत्र सरकार का सिद्धांत भी कोरी स्लेट के सिद्धांत पर आधारित था। यह सिद्धांत तभी टिकता है जब नेता और सहभागी, दोनों शिक्षा के द्वारा अपनी स्वतंत्र इच्छा की पुष्टि कर सकें। प्रागनुभविक स्वतंत्र इच्छा न हो, तो यह दावा टिक ही नहीं सकता। रूसो का शुभ-स्वभाव सिद्धांत राजतंत्र का नहीं, जन-संप्रभुता का प्रतिपादन करने वाला सिद्धांत बन जाता है। पर यदि उनके द्वारा प्रतिपादित “सामान्य इच्छा” (General Will) न टिके, तो उनका सामाजिक अनुबंध का सिद्धांत और शुभ-स्वभाव सिद्धांत भी ढह जाते हैं। विशेष रूप से निजी संपत्ति को मान्यता न देने वाले विचार को शुभ-स्वभाव सिद्धांत से जोड़कर उनके शुभ-स्वभाव सिद्धांत ने जन-संप्रभुता के सहारे सर्वसत्तावाद से जुड़ने की गुंजाइश छोड़ दी। यह वह विचार है जिसका विचारधाराओं के युग में पश्चिमी नेताओं ने सक्रिय रूप से उपयोग किया।

महत्त्वपूर्ण यह है कि पश्चिमी विचारकों में, विशेष रूप से मानव-स्वभाव पर चर्चा करने वालों में, किसी ने भी मानवीय चरित्र के पोषण के लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित नहीं किया। लॉक हों या रूसो, वे नैतिकता के पोषण के लिए नहीं, बल्कि अपने द्वारा प्रतिपादित स्वतंत्र इच्छा या सामान्य इच्छा का प्रतिपादन करने वाली शिक्षा चाहते थे। दोहराना होगा कि पूर्वी विचारकों के, मानव-स्वभाव पर मत भिन्न होते हुए भी, अंततः नैतिकता-केंद्रित मानवीय चरित्र के पोषण को लक्ष्य बनाने में कन्फ़्यूशियस, मेंशियस और शुनज़ी, सब एकमत थे।

पूर्वी सभ्यता जिस मानवीय चरित्र की खोज करती है, उसकी दृष्टि से देखें तो स्वभाव और पालन-पोषण की वह समस्या भी लुप्त हो जाती है जिससे पश्चिम अब भी जूझ रहा है। स्वभाव (nature) और पालन-पोषण (nurture) में कौन अधिक महत्त्वपूर्ण है, इस पर बहुत बहस होती है। पूर्वी मानव-स्वभाव सिद्धांत के अनुसार हम स्वभाव और पालन-पोषण पर अपने विचारों को व्यवस्थित कर सकते हैं। हर मनुष्य प्रबल स्वार्थ और दुर्बल परोपकार लेकर जन्म लेता है। प्रबल स्वार्थ के कारण हर कोई धन और शक्ति चाहता है। यह अपने हित की रक्षा करने वाली आत्म-संरक्षण की सहज वृत्ति है। हम कितना भी प्रयास करें, अगली पीढ़ी के लोग भी वैसा ही प्रबल स्वार्थ और दुर्बल परोपकार लेकर जन्म लेते हैं। और हम कितना भी प्रयास करें, ऐसा समाज नहीं बना सकते जो परोपकार से चले। यही मानव-स्वभाव है।

तब पालन-पोषण कैसे काम करता है? पालन-पोषण मानव-स्वभाव की संभावनाओं के भीतर काम करता है। प्रयास के द्वारा परोपकार को बढ़ाना, और स्वार्थ को नियंत्रित करने के उपाय सीखना और साधना, यही पालन-पोषण का काम है। मनुष्य में प्रबल स्वार्थ और दुर्बल परोपकार है। उसे परोपकार का उपयोग करके अपने हित को लंबे समय तक बनाए रखना चाहिए। परोपकार को प्रबुद्ध स्वार्थ बनना चाहिए। यहीं पालन-पोषण की भूमिका है। चिकित्सा की दृष्टि से स्वभाव पुराना मस्तिष्क है। पालन-पोषण नया मस्तिष्क है। दोनों जुड़े हुए हैं: यह वह परिघटना है जिसे चिकित्सा-विज्ञान “मस्तिष्कीकरण” कहता है। जुड़े होने का अर्थ है कि स्वभाव और पालन-पोषण परस्पर पूरक रूप से काम करते हैं। स्वभाव और पालन-पोषण के परस्पर पूरक प्रयासों से स्वार्थ को असीम रूप से बढ़कर लोभ बनने से रोकना होगा। इसके लिए परोपकार के प्रति जागना होगा। तभी अच्छा मानवीय चरित्र विकसित होता है। परोपकार के प्रति जागा हुआ स्वार्थ प्रबुद्ध स्वार्थ बन जाता है। यही नेता की अनिवार्य शर्त है।

यदि हम कोरी स्लेट के सिद्धांत को अलग रख दें, तो सभी मनुष्य एक ही मानव-स्वभाव लेकर जन्म लेते हैं। प्रबल स्वार्थ और दुर्बल परोपकार मानव-स्वभाव में अंतर्निहित हैं। इनका नियमन कैसे किया जाता है, इसके अनुसार मनुष्य नेता (जुनज़ी) और सहभागी (शियाओरेन) में बँटते हैं। मानव-समाज में दो प्रकार के मानव-समूह बनते हैं: नेता और सहभागी। “एक मानव-स्वभाव और दो मानव-समूह”, यह पूर्व और पश्चिम की समाज-रचना का एक समान तत्त्व है। पूर्व उन्हें नेता और सहभागी में बाँटता है। कोई भी नेता बन सकता है और कोई भी सहभागी बन सकता है। दोनों साथी हैं। एक समूह न रहे, तो दूसरा भी नहीं रहता। सामंजस्य का सिद्धांत दोनों समूहों को जोड़ता है।

पश्चिम भी मनुष्यों को दो समूहों में बाँटता है। पर ये दो मानव-समूह जन्म के बाद चरित्र के पोषण से तय नहीं होते, बल्कि जन्म के समय ही तय हो जाते हैं। यह प्रकारमूलक विभाजन है: धर्म, नस्ल और क्षेत्र के अनुसार। यही दाओ की सभ्यता और ईश्वर की सभ्यता का अंतर है। यूनानी काल में मनुष्यों को आत्मा वाले यूनानियों और आत्माहीन “बर्बरों” में बाँटा जाता था। कहा जाता था कि बर्बर पशुओं जैसे हैं और उन्हें दास बनाना चाहिए। ईसाई धर्म के अधीन उन्हें आस्तिकों (उद्धार पाए हुए) और नास्तिकों (त्यागे हुए) में बाँटा गया। पोप के कार्यालय ने भी आदेश जारी किया कि नास्तिकों को दास बनाया जा सकता है। मन के युग में मनुष्यों को “मन” वाले पश्चिमी लोगों और मन से रहित ग़ैर-पश्चिमी लोगों में बाँटा गया। और विचारधाराओं के युग में उन्हें वैचारिक सिद्धांत में विश्वास करने वालों और विरोधियों में बाँटा जाने लगा। वैचारिक सिद्धांत के विरोधियों को मिटा देना चाहिए। उचित व्यवहार पाने के लिए यूनान में जन्म लेकर आत्मा रखनी पड़ती थी, या पश्चिम में जन्म लेकर मन। इसलिए पश्चिम का दो समूहों वाला विभाजन बहुत हद तक जन्म-स्थान और माता-पिता कौन हैं, इस पर निर्भर करता है। अर्थात यह जन्म और आस्था पर आधारित विभाजन है। दोनों समूह संघर्ष का संबंध बनाते हैं। एक पक्ष दूसरे को सहन नहीं करता।

पूर्व मनुष्यों का विभाजन प्रकारमूलक नहीं, संबंधमूलक ढंग से करता है: किसके वंशज, किस परिवार के, राजा-प्रजा और पिता-पुत्र के संबंध आदि। पर दार्शनिक स्तर पर वह व्यावहारिक जीवन के इन विभाजनों को मान्यता नहीं देता। उसका विभाजन नेता और सहभागी का है। नेता और सहभागी हर मानव-समाज में होते हैं। यह विभाजन मनुष्य की उस छवि पर आधारित है जो किसी के प्रकार का निर्धारण करने से पहले की है। पश्चिम में भी नेता (जुनज़ी) और सहभागी (शियाओरेन) हैं। पर पश्चिम के संघर्षमूलक विभाजन में मनुष्य इस आधार पर बँटते हैं कि उनके पास आत्मा, मन, बुद्धि या विचारधारा है या नहीं। जिनके पास ये नहीं, वे मनुष्य के स्थान से बाहर कर दिए जाते हैं। ऐसे विभाजन में पालन-पोषण के सिद्धांत के लिए कोई स्थान नहीं। यदि आप किसी अनजान जगह जन्मे, तो कितना भी अच्छा पालन-पोषण हो, पश्चिम जिनका दावा करता है और जिन्हें लेकर आप जन्मे नहीं, वे आत्मा, मन, बुद्धि या विचारधारा उत्पन्न होने से रहे। पर पूर्व का नेता-सहभागी विभाजन पूरी तरह पालन-पोषण से तय होता है। हर समाज में नेता और सहभागी सदा होते ही हैं। प्रबल स्वार्थ और दुर्बल परोपकार लेकर जन्मे मनुष्यों में कुछ ऐसे होते हैं जो किसी शिक्षा और बोध से स्वार्थ और परोपकार का नियमन करके नेता का मार्ग अपनाते हैं, और कुछ ऐसे जो सहभागी बने रहते हैं और उनका स्वार्थ लोभ बन जाता है। सब कुछ पालन-पोषण का सिद्धांत तय करता है।

पूर्वी सभ्यता ने दो हज़ार वर्ष से भी पहले मानव-स्वभाव (nature) पर अपनी चर्चा को व्यवस्थित करके पालन-पोषण (nurture) की ओर क़दम बढ़ाया। उसका मानना था कि हर मनुष्य अपना हित हथियाने का प्रयास करने वाला मानव-स्वभाव लेकर जन्म लेता है। और मानव-स्वभाव से आगे बढ़कर उसने मनुष्य के चरित्र (人性, 品性, स्वभाव-गुण, व्यक्तित्व, मानवीय चरित्र) की चर्चा और दर्शन पर ध्यान केंद्रित किया। पश्चिम इस पर केंद्रित है कि मानव-स्वभाव क्या है, और पूर्व इस पर कि मानवीय चरित्र को कैसे विकसित किया जाए। चरित्र कब बनता है? क्या यह चरित्र स्वभाव में पहले से अंकित संकेतों के अनुसार बदलता है? या पालन-पोषण के अनुसार? क्या स्वभाव और पालन-पोषण अलग-अलग काम करते हैं, या पारस्परिक क्रिया के अधीन चरित्र गढ़ते हैं? दाओ की सभ्यता ने यह दर्शन स्थापित किया कि स्वभाव और पालन-पोषण पारस्परिक क्रिया के अधीन मानवीय चरित्र गढ़ते हैं।

पश्चिमी सभ्यता अपने मानव-स्वभाव सिद्धांत में कोरी स्लेट के सिद्धांत बनाम स्वभाव के सिद्धांत की दार्शनिक समस्या पर ही अटकी हुई है। इसके विपरीत पूर्वी सभ्यता इस स्तर को छोड़कर मानव-स्वभाव और चरित्र-निर्माण के दर्शन पर आधारित नैतिक दृष्टि और राजनीति-शास्त्र रच रही थी। उसने मानवीय चरित्र पर, विशेष रूप से नैतिकता को महत्त्व देने वाले मानवीय चरित्र पर, ध्यान केंद्रित किया। लक्ष्य यह था कि अपने हित के लिए प्रयास करने वाले मनुष्यों को सामाजिक जीवन के अनुकूल मानवीय चरित्र दिया जाए।

पश्चिम में मनुष्य के चरित्र पर चर्चा अपेक्षाकृत हाल की बात है। मध्य युग के हज़ार वर्ष ऐसा समय थे जब ईसाई विचार के कारण चरित्र के पोषण की कोई आवश्यकता अनुभव ही नहीं हुई। मनुष्य की शिक्षा के महत्त्व पर विचार लॉक के कोरी स्लेट के सिद्धांत और रूसो के शिक्षा-सिद्धांत के प्रभाव से हुआ, यानी तीन-चार सौ वर्ष पहले। पूर्वी सभ्यता ने दो हज़ार वर्षों तक शिक्षा के महत्त्व पर ध्यान केंद्रित किया। क्योंकि वह स्वभाव को स्वीकार करती थी, पर मानती थी कि मनुष्य कैसे बड़ा होता है, यानी मानवीय चरित्र का निर्माण, पालन-पोषण (nurture) की शक्ति है। आधुनिक काल के आरंभ के पश्चिमी विचारकों को जेसुइट पादरियों के द्वारा भेजे गए पूर्व के समाचार मिल सके। उन्होंने उस शाही परीक्षा-प्रणाली पर आश्चर्य और ईर्ष्या व्यक्त की, जिसमें पूर्व में सब लोग शिक्षा में जुटे रहते थे और शिक्षा में सफलता के अनुसार अधिकारी चुने जाते थे। उस समय पश्चिम में सभी पद कृपा-पद प्रणाली के अनुसार ख़रीदे-बेचे जाते थे।

पूर्व का यथार्थ-प्रबंधन बनाम पश्चिम की आदर्श-खोज

अर्थ की खोज करने वाला पश्चिमी मनुष्य पूरी मानवता के लिए एक दृष्टि के पीछे दौड़ता है। धर्म का प्रचार और विचारधारा की खोज इसके प्रतिनिधि उदाहरण हैं। पहली नज़र में उनमें कुछ महान और भव्य है। पर हर धर्म-प्रचार और विचारधारा-प्रसार की तरह उनकी मूल समस्या यह है कि वे यथार्थ से परे हैं। विशेष रूप से विचारधारा द्वारा खोजी जाने वाली सभी दृष्टियाँ मानव-स्वभाव को विकृत करके रची गईं। समस्या उस मानव-स्वभाव सिद्धांत में है जो आत्मा, मन या बुद्धि को मनुष्य का सार मानता है।

पश्चिम जिस अर्थ की खोज करता है, वह अंततः व्यक्तिवाद नामक दर्शन पर टिका है। व्यक्ति और ईश्वर का, या व्यक्ति और विचारधारा का संबंध दूसरे मनुष्यों के साथ संबंध से अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अर्थ की खोज करने वाला पूर्वी मनुष्य अव्यक्त के सिद्धांत और संबंधवाद पर आधारित है। दाओवाद और कन्फ़्यूशियसवाद की ये स्वीकारोक्तियाँ यही सिखाती हैं: “दाओ का कोई अंत नहीं”, “जीवन की सीमा है, पर ज्ञान की कोई सीमा नहीं”, “दाओ कभी पूर्ण नहीं होता”, “रेन (仁) के विषय में कोई गुरु नहीं”। नैतिक पक्ष में अर्थ खोजने वाला मनुष्य किसी दृष्टि की नहीं, बल्कि अनवरत प्रयास से मानवीय संबंधों के सामंजस्य की खोज करता है। पूर्व का अर्थ संबंधवाद नामक दर्शन पर टिका है। संबंधवाद परिवर्तन के दर्शन पर आधारित है। मनुष्य जिन परिस्थितियों में जीता है, वे समय और स्थिति के अनुसार निरंतर बदलती रहती हैं।

पश्चिमी सभ्यता सुख की खोज करने वाले “व्यक्तिवाद” के उत्कर्ष के लिए क़ानूनों और संस्थाओं पर ध्यान केंद्रित करती है। क्योंकि सुख व्यक्तिवादी है। पूर्व में मनुष्यों के बीच “संबंधवाद” पर आधारित नैतिकता सभ्यता का केंद्र है। नैतिकता मानव-स्वभाव में अंतर्निहित स्वार्थ के प्रति सतर्कता से आती है। बात यह है कि स्वार्थ से स्वाभाविक रूप से प्रकट होने वाले लोभ के सामने संबंधवाद की नैतिकता को आत्मसात करके सामाजिक जीवन में मनुष्यों के बीच सामंजस्य स्थापित किया जाए। पूर्व का दाओवाद ज्ञानी को लक्ष्य बनाता है। कन्फ़्यूशियसवाद जुनज़ी (君子) को लक्ष्य बनाता है। ज्ञानी हो या जुनज़ी, दोनों अंततः “नेता” के लक्ष्य पर पहुँचते हैं। यह संबंधवादी अभिव्यक्ति है। पश्चिम में स्पिनोज़ा जैसे अव्यक्त के चिंतकों ने “प्रज्ञावान मनुष्य” को लक्ष्य बनाया। यह व्यक्तिवादी अभिव्यक्ति है।

पश्चिमी दर्शन के केंद्र, व्यक्त का सिद्धांत (示現論), व्यक्तिवाद के केंद्रीय मूल्य का प्रतिनिधित्व करता है। सत्य (ईश्वर, तत्त्वमीमांसीय सत्य, विचारधारा आदि) मेरे लिए सबसे महत्त्वपूर्ण हो जाता है, और सत्य के साथ मेरा संबंध किसी भी दूसरे मनुष्य के साथ मेरे संबंध से अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि दूसरों के साथ मेरा संबंध सत्य के साथ मेरे संबंध के अधीन होता है, और मैं धर्म या विचारधारा के अनुसार दूसरों का मूल्यांकन करने लगता हूँ। इसी आधार पर व्यक्तिवाद में व्यक्ति की स्वायत्तता और स्वतंत्रता को सबसे ऊपर महत्त्व दिया जाता है। अपने द्वारा ग्रहण किए गए सत्य की खोज करना और बहुत से समर्थक बनाना पश्चिमी लोगों की जीवन-शैली बन जाता है।

पूर्वी सभ्यता का केंद्र अव्यक्त का सिद्धांत (不現論) है। अव्यक्त का सिद्धांत यह है कि “सत्य है, पर मनुष्य उसे व्यक्त नहीं कर सकता”। पश्चिम में हेराक्लिटस आदि ने इसका प्रतिपादन किया था, पर सुकरात के बाद पश्चिमी दर्शन में यह नष्ट हो गया और ऐसी अवधारणा बन गया जो अब अस्तित्व में नहीं है। अव्यक्त का सिद्धांत वह चिंतन है जो दाओवाद, कन्फ़्यूशियसवाद और बौद्ध धर्म का आधार बनाता है। इसे भली-भाँति व्यक्त करने वाला दाओ दे जिंग का पहला वचन है: 道可道非常道, जो दाओ व्यक्त किया जा सके वह शाश्वत दाओ नहीं है। अव्यक्त की सभ्यता के चिंतन के अनुसार, जिस “सत्य” को मनुष्य खोज लेने का दावा करता है, वह मनुष्य-मनुष्य के संबंध के केंद्र, नैतिकता, यानी रेन (仁, मानवता), से ऊपर नहीं जा सकता। अपने खोजे “सत्य” को दूसरों पर थोपा भी नहीं जा सकता। यही दर्शन मनुष्य को दिए गए संबंधवाद का केंद्र है।

बदलते मानवीय चरित्र के पोषण के लिए पूर्वी सभ्यता में जो विचार स्थापित हुए, वे हैं कन्फ़्यूशियसवाद का नेता (जुनज़ी) का विचार और दाओवाद का अकर्म (वू वेई, 無爲) का विचार। इनका केंद्र ऐसा दर्शन है जो आदर्श को साकार करने के बजाय मानव-स्वभाव नामक यथार्थ का प्रबंधन करना चाहता है। शुनज़ी मानते हैं कि मनुष्य जिस समस्याग्रस्त जन्मजात स्वभाव के साथ पैदा होता है, उसके बारे में कुछ नहीं किया जा सकता। वे उसे प्रकृति के अंश के रूप में स्वीकार करते हैं। पर चूँकि मानव-स्वभाव में समस्या है, इसलिए वे इस पर ध्यान केंद्रित करते हैं कि जन्म के बाद नैतिकता और क़ानून से उसका भली-भाँति शासन करके समाज के लिए सहायक मानवीय चरित्र गढ़ा जाए; यह “नियति के भीतर स्वतंत्रता” के दर्शन से मेल खाता है। अंततः शुनज़ी का उद्देश्य यह नहीं कि मनुष्य का जन्मजात स्वभाव समस्याग्रस्त है इसलिए उसे बदला जाए, मिटाया जाए या उससे ऊपर उठा जाए, बल्कि यह कि नैतिकता और क़ानून के द्वारा मानवीय चरित्र का “पोषण” किया जाए। यही कारण है कि मानव-समाज के लिए नैतिकता और क़ानून आवश्यक हैं। उन्होंने नैतिकता और क़ानून को ऐसी चीज़ बताया जो आकाश से नहीं टपकती, बल्कि जिसे मानव-समाज को भली-भाँति परखकर नेताओं और ज्ञानियों ने बनाया। वे प्रागनुभविकता और लोकोत्तरता को नकारते हैं।

ऐसी पूर्वी सभ्यता यथार्थ में सहभागिता पर ध्यान केंद्रित करती है: नेता का विचार और अकर्म का विचार। वह बदलते मानवीय चरित्र का पोषण करके मानव-समाज के प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करती है। अर्थात यह इस बात का दर्शन है कि जन्म से मिले मानव-स्वभाव के साथ मनुष्य समाज के अनुकूल कैसे हो सकता है। वह राजनीतिक नैतिकता (ethico-politics) और राजनीतिक अर्थशास्त्र (political economy) पर ध्यान केंद्रित करती है। यह धर्मशास्त्र, तत्त्वमीमांसा और विचारधारा पर केंद्रित पश्चिमी सभ्यता के विपरीत है। पश्चिम के सभी मानव-स्वभाव सिद्धांत मानव-समाज के प्रबंधन को नहीं, बल्कि आदर्श-लोक को साकार करने को लक्ष्य बनाते हैं।

स्पष्ट होता है कि मेंशियस ने मनुष्य को मुख्यतः मन, यानी नए मस्तिष्क, के पक्ष से समझा, और शुनज़ी ने इसके विपरीत मुख्यतः सहज वृत्ति, यानी पुराने मस्तिष्क, के पक्ष से। फिर भी मेंशियस ने मनुष्य की भावनाओं या सहज वृत्तियों की न उपेक्षा की, न उन्हें पाप माना; इसी प्रकार शुनज़ी ने नीति या सामाजिक मानदंडों को मनुष्य की सहज वृत्ति को जकड़ने वाली चीज़ मानकर ठुकराया नहीं। मेंशियस और शुनज़ी, दोनों सहज वृत्ति और मन के अस्तित्व और आवश्यकता को स्वीकार करते थे। उद्देश्य एक ही है। मेंशियस हों या शुनज़ी, दोनों का बल “मानवीय चरित्र के पोषण” पर है। शुनज़ी इस बात के महत्त्व पर बल देते हैं कि मानव-स्वभाव उचित को जानता है और उसका विवेक रखता है, पर अच्छे गुरु और अच्छे मित्र पाकर आत्म-साधना करनी होगी:

हर मनुष्य में ऐसा जन्मजात स्वभाव है जो उचित को जान सकता है, और ऐसा हृदय जो उसका विवेक कर सकता है। पर इस स्वभाव को बढ़ाने के लिए मनुष्य को अवश्य ही अच्छा गुरु पाकर सीखना होगा, और अच्छे मित्र पाकर उनकी संगति करनी होगी (शुनज़ी 23:15)

पश्चिम में स्पिनोज़ा ही शुनज़ी से सबसे मिलती-जुलती मानव-स्वभाव और प्रकृति की दृष्टि व्यक्त करते हैं। शुनज़ी का मानव-स्वभाव सिद्धांत स्पिनोज़ा के मानव-स्वभाव सिद्धांत जैसा है। स्पिनोज़ा ने जन्मजात सहज वृत्तियों के अनुसार अपने हित के पीछे चलने वाले मानव-स्वभाव को मानवीय दासता (human bondage) कहा। उनका मानना था कि मनुष्य में इन सहज वृत्तियों के साथ मन भी है, और मन में सहज वृत्ति पर शासन करने की क्षमता है। पर उनका मानना था कि बहुत थोड़े लोग ही इसे प्राप्त कर पाते हैं। स्पिनोज़ा ने इन्हें स्वतंत्र मनुष्य (free man) कहा, और दासता में जीने वाले शेष अधिकांश लोगों को जनसमूह (multitude) कहा। स्पिनोज़ा द्वारा मनुष्यों का “स्वतंत्र मनुष्य और जनसमूह” में विभाजन शुनज़ी द्वारा मनुष्यों के “नेता और सहभागी” में विभाजन से बहुत मिलता-जुलता है। पर शुनज़ी से भिन्न, स्पिनोज़ा के यहाँ राजनीतिक नैतिकता का पक्ष व्यक्ति की स्वतंत्रता में है; शुनज़ी के यहाँ वह समाज के नेताओं में है। स्पिनोज़ा का नीतिशास्त्र स्वतंत्र मनुष्य को लक्ष्य बनाता है। पर शुनज़ी का उद्देश्य यह है कि मनुष्यों को नैतिकता का पालन करने वाला और राजनीतिक रूप से सक्षम नेता कैसे बनाया जाए।

शुनज़ी और स्पिनोज़ा प्रकृति की दृष्टि में भी एक ही स्थिति अपनाते हैं। “दाओ, या ईश्वर, मानवीय मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता।” “मनुष्य को अपने हित के लिए दाओ, या ईश्वर, के मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।” “दाओ, या ईश्वर, का मार्ग मानव-स्वभाव में प्रकट होता है।” “जो दाओ, या ईश्वर, से प्रेम करता है, वह यह अपेक्षा नहीं कर सकता कि दाओ, या ईश्वर, बदले में उससे प्रेम करेगा।” “यह नकारा नहीं जा सकता कि मनुष्य प्रकृति का अंश है।” “मनुष्य सहित ब्रह्मांड की सभी वस्तुएँ दाओ, या ईश्वर, की शक्ति से अस्तित्व में हैं।” ऐसी अभिव्यक्तियाँ शुनज़ी के “स्वर्ग पर विमर्श” (天論) अध्याय में, और स्पिनोज़ा के नीतिशास्त्र (Ethics) में मिलती हैं। अंतर इतना है कि शुनज़ी ने इन्हें दाओ को और स्पिनोज़ा ने ईश्वर को केंद्र में रखकर व्यक्त किया।

मेंशियस और शुनज़ी का चरित्र-निर्माण कन्फ़्यूशियस में ज्यों का त्यों पहले ही व्यक्त है। कन्फ़्यूशियसवादी महान शिक्षा अध्याय 8 में आत्म-साधना और परिवार की व्यवस्था (修身齊家), अध्याय 9 में राज्य के शासन (治國), और अध्याय 10 में आकाश के नीचे की शांति (平天下) तक पहुँचने का मार्ग समझाती है। इसका अर्थ, यानी स्वयं को साधना, परिवार को व्यवस्थित करना, राज्य का शासन करना और पूरे संसार में शांति लाना, 修身齊家治國平天下 सूत्र के रूप में व्यापक रूप से प्रसिद्ध है। नेता का उद्देश्य सही शासन है। इसके लिए वह मानवीय चरित्र को नेता के रूप में पोषित करने पर ध्यान केंद्रित करती है:

सब मनुष्यों के पास एक ही स्वभाव और एक ही संभावनाएँ हैं। फिर भी कोई नेता बनता है और कोई सहभागी। उनके भिन्न होने का कारण उनके स्वभाव और संभावनाओं के अंतर में नहीं, बल्कि उनकी आदतों और प्रयासों में मिलता है। (शुनज़ी 4:7)

मेंशियस और शुनज़ी, दोनों में कन्फ़्यूशियस के साथ कन्फ़्यूशियसवाद का यह विशिष्ट राजनीतिक पक्ष प्रबल है कि नेता तैयार करने चाहिए। शुनज़ी राजनीतिक-नैतिक कर्म पर बल देते हैं:

सुनना न सुनने से अच्छा है। देखना सुनने से अच्छा है। समझना देखने से अच्छा है। कर्म करना समझने से अच्छा है। अध्ययन का लक्ष्य कर्म में है। (शुनज़ी 8:9)

यहाँ शुनज़ी यह प्रश्न उठाते हैं: क्या सभी मनुष्यों को ज्ञानी बनाया जा सकता है? यदि सब ऐसा चाहें, तो बन सकते हैं। पर समस्या यह है कि किसी को ऐसा चाहने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। अंततः व्यक्ति का चुनाव ही महत्त्वपूर्ण है:

मनुष्य अध्ययन और कर्म से ज्ञानी (聖人) बन सकता है। तो सभी ऐसे क्यों नहीं बन पाते? यह संभव तो है, पर इसे थोपा नहीं जा सकता। सहभागी नेता बन सकता है, पर न चाहे तो नहीं बन सकता। नेता सहभागी बन सकता है, पर न चाहे तो नहीं बन सकता…। ऐसा बनना कठिन नहीं। अर्थ केवल इतना है कि इसे बलपूर्वक नहीं बनाया जा सकता। (शुनज़ी 23:12)

यहाँ पूर्व और पश्चिम की सभ्यताओं का अंतर है: “ईश्वर में आस्था” बनाम “मानवीय चरित्र का पोषण” का अंतर। ईश्वर की सभ्यता में निर्धारित धार्मिक विधान में विश्वास की घोषणा करने से व्यक्ति आस्तिक बन जाता है। आस्तिक बनने पर विधान के द्वारा “बाहर से” आस्तिक का प्रबंधन किया जाता है। दाओ की सभ्यता में नेता बाहर से नहीं, “भीतर से” तय होता है। व्यक्ति स्वयं तय करता है कि वह नेता है या सहभागी:

नेता जो चाहता है, वह उसके अपने भीतर है। सहभागी जो चाहता है, वह बाहर से तय होता है। (संवाद 15:20)।

कन्फ़्यूशियस का यह विचार शुनज़ी में आकर और स्पष्ट रूप से समझाया जाता है। नेता के सामने नेता का लक्ष्य है: आकाश के नीचे की शांति। नेता इस लक्ष्य के अनुसार चलता है। सहभागी के पास यह नैतिक लक्ष्य नहीं होता, और वह अपनी व्यक्तिगत इच्छा के पीछे चलता है।

नेता विचारों और वस्तुओं का उपयोग करता है। सहभागी विचारों और वस्तुओं के द्वारा उपयोग किया जाता है। (शुनज़ी 2:5)।

कन्फ़्यूशियसवाद का नेता का विचार दाओवाद के अकर्म के विचार से मेल खाता है। बाहरी कर्म को न्यूनतम करना अकर्म का नियम है। धार्मिक विधान में बाहरी समझाना और उसे स्वीकार करना महत्त्वपूर्ण है। इसीलिए ईसाई धर्म धर्मांतरण को मान्यता देता है। चूँकि केवल निर्धारित विधान का पालन करना पर्याप्त है, इसलिए कैथोलिक प्रोटेस्टेंट बन सकता है और उलटा भी। पर दाओ की सभ्यता में नेता और सहभागी धर्मांतरण करके अपनी जगहें नहीं बदल सकते। ऐतिहासिक रूप से धर्मांतरण बहुत बार ज़बरदस्ती से हुआ है: वे राजाज्ञाएँ इसका उदाहरण हैं जिनमें यहूदियों से कहा गया कि ईसाई बनो, नहीं तो सारी संपत्ति ज़ब्त कर ली जाएगी। पर जैसा शुनज़ी ने समझाया, नेता या सहभागी ज़बरदस्ती नहीं बनाया जा सकता। यह तभी संभव है जब व्यक्ति स्वयं चाहे और वह कर्म में प्रकट हो।

संवाद में भी इसका उल्लेख है: “नेता जो चाहता है, उसे अपने भीतर खोजता है; सहभागी उसे दूसरों में खोजता है।” “नेता अपनी क्षमता को स्वयं परखता है; सहभागी इससे तय होता है कि दूसरे उसे मान्यता देते हैं या नहीं।” “नेता दाओ की चिंता करता है; सहभागी निर्धनता की चिंता करता है।” यदि किसी व्यक्ति का सीधे मूल्यांकन करना कठिन हो, तो उसके आसपास के लोगों को देख लेना पर्याप्त है। शुनज़ी अपने अध्याय “मानव-स्वभाव अशुभ है” में आसपास के लोगों को देखने को कहते हैं: “जानना चाहते हो कि कोई व्यक्ति कैसा है, तो उसके मित्रों को देखो। जानना चाहते हो कि कोई राजा कैसा है, तो उसके मंत्रियों को देखो।”

4) मानव-स्वभाव का उद्देश्य: जीवन के अर्थ की खोज बनाम व्यक्तिगत सुख की खोज

पश्चिम का सामाजिक अनुबंध का सिद्धांत हो या पूर्व का चरित्र-निर्माण, दोनों का उद्देश्य मानव-समाज का प्रबंधन है। इसका सीधा संबंध इस प्रश्न से है कि मानव-स्वभाव कैसे बना है और उसका उपयोग कैसे किया जाए। मानव-स्वभाव के आलोक में, पूर्व और पश्चिम की सभ्यताओं में मनुष्य क्या चाहता है और क्या खोजता है? पूर्व और पश्चिम के मानव-स्वभाव सिद्धांतों के आरंभ-बिंदु में अंतर है: परिवर्तन का दर्शन और सत्ता का दर्शन। इसके अनुसार पूर्व और पश्चिम की सभ्यताओं में मनुष्य जिन उद्देश्यों की खोज करता है, वे भिन्न हो जाते हैं। हमें इसकी ठोस पड़ताल करनी होगी कि मन नहीं, बल्कि मानव-स्वभाव से, यानी सहज वृत्ति और बुद्धि से, बना मनुष्य क्या खोजता है।

प्रकाशित धर्म इस आधार-वाक्य पर टिका है कि ईश्वर की इच्छा मनुष्य के मन से ऊपर है। पर पश्चिमी बुद्धिवाद इस दिशा में बढ़ता है कि ईश्वर द्वारा मनुष्य को दिया गया मन ईश्वर जैसी क्षमता दिखा सकता है। पूर्व अपनी सभ्यता का आधार उस मानव-स्वभाव सिद्धांत को बनाता है जिसमें मन और सहज वृत्ति जुड़े हैं। इस मानव-स्वभाव सिद्धांत में पूर्व का उद्देश्य मनुष्यों के बीच अर्थ खोजना है। स्वर्ग या सुख की खोज करने वाले व्यक्तिवाद (Individualism) से भिन्न, संबंधवाद (Relationalism) जीवन के अर्थ की खोज करता है। जीवन का अर्थ, दूसरों के साथ मेरे संबंध को केंद्र में रखकर, नैतिकता पर आधारित है: “यदि स्वयं स्थापित होना चाहते हो, तो दूसरों को भी स्थापित करो।” जीवन के अर्थ की खोज करने वाला पूर्वी जीवन पश्चिम के व्यक्त के सिद्धांत पर आधारित आदर्श-लोक को साकार करने की दृष्टि से भिन्न है। आदर्श-लोक की खोज के प्रयास कभी-कभी महान फल भी देते हैं, पर आसानी से नैतिकता की उपेक्षा करने वाले मानवकेंद्रवाद में फिसल जाते हैं।

महान समुद्री खोजों के युग का पश्चिम मनुष्य के मन की महानता का विस्तार करना चाहता था। मन-पूजा की अपनी सभ्यता पर और अधिक आश्वस्त पश्चिम एक आदर्श संसार का सपना देखने लगा। विज्ञान की आश्चर्यजनक प्रगति के बल पर वह इस उत्साह से भर उठा कि मनुष्य एक आदर्श संसार रच सकता है। एक विशाल दार्शनिक व्यवस्था खड़ी हुई: मनुष्य आदर्शों की खोज के लिए जन्मा है और उन्हीं के लिए अस्तित्व में है। इस काल में आधुनिक पश्चिम ने मानव-इतिहास में दुर्लभ प्रगति की। नियंत्रण और संतुलन के सिद्धांत की स्थापना से सत्ता का शांतिपूर्ण परिवर्तन साकार हुआ, और कला, संगीत, खेल और विज्ञान, सभी क्षेत्रों में मानवता को आश्चर्यजनक प्रगति मिली। पश्चिम की विश्व-विजय के साथ पश्चिमी मन की महानता का बखान करने वाली दार्शनिक व्यवस्थाएँ खड़ी हुईं, और अधिकांश पश्चिमी लोग उनसे सहमत हुए। पश्चिम को केंद्र में रखकर इसे संसार भर में फैलाने का विचार उफान पर आ गया। वे पश्चिमी लोगों के लिए, और संसार के लिए, एक आदर्श संसार का सपना देखने लगे।

यह विचार कि मन द्वारा संचालित आदर्श-लोक को मानव-समाज में साकार किया जा सकता है, एक असंभव सपना है। चूँकि सहज वृत्ति प्रकाश का स्रोत है और मन दर्पण, इसलिए सहज वृत्ति की उपेक्षा करने वाला आदर्श-लोक मानव-समाज में साकार नहीं हो सकता। पूर्व के परिवर्तन के दर्शन के अनुसार, मानव-समाज में कुछ समय आदर्श-लोक से चिपके रहने के काल और उसे ढहा देने वाले विनाश के काल बस बारी-बारी से आते हैं। ऐतिहासिक रूप से, आदर्श-लोक बनाने का मनुष्य का विचार “सामाजिक डार्विनवाद” से जुड़कर विचारधाराओं का युग खोल देता है। इस प्रकार पश्चिमी विचारधारा ने बीसवीं शताब्दी में नैतिक रूप से भयावह स्थितियाँ उत्पन्न करने वाले तरह-तरह के मतवाद रचे, और मानवता अपना सब कुछ झोंककर उनमें कूद पड़ी। उसके विनाशकारी परिणामों को देखकर पश्चिमी दर्शन ने सामाजिक डार्विनवाद का मिथ्यापन जाना, और धीरे-धीरे मनुष्य के मन की सीमाएँ भी जानीं।

पश्चिमी सभ्यता अब कहाँ जाएगी? उसे बस यह स्वीकार करना है कि मनुष्य का मन ईश्वर के, या प्रकृति के, नियम के अधीन विद्यमान है। समस्या यह है कि पश्चिम प्रकाशित धर्म के ईश्वर की ओर लौट भी नहीं सकता। क्योंकि चमत्कार करने वाले और मानवीय मामलों का संचालन करने वाले ईश्वर का प्रश्न प्रबोधन-काल में निपटा दिया गया। तब मानवीय मामलों का संचालन न करने वाले ईश्वर तक स्पिनोज़ा द्वारा सुझाए ढंग से, यानी ईश्वर और प्रकृति को एक मानकर, पहुँचा जा सकता है। यह ढंग अंततः उस दाओ के प्रकृति-दर्शन को स्वीकार करने का मार्ग बन जाता है जिस पर पूर्वी सभ्यता टिकी है। पर प्रकृति-दर्शन हज़ारों वर्षों से पश्चिमी सभ्यता पर छाई रही मूल धारा, मन-पूजा के विचार, से मूलतः भिन्न है, इसलिए यह भी आसान नहीं। यहीं वह मूलभूत समस्या प्रकट होती है कि पश्चिमी सभ्यता अपना आगे का मार्ग नहीं खोज पा रही।

प्रबोधन-काल के बाद के पश्चिम में, मन के ईश्वर का स्थान लेने के साथ, दर्शन नैतिकता की नींव खोजने पर केंद्रित हुआ। देववाद की व्यवस्था के भीतर कांट ने यह दर्शन सामने रखा कि मानव-स्वभाव के भीतर नैतिकता की खोज करने वाला स्वभाव विद्यमान है। “मन” पर आधारित कांट का यह नैतिक कर्तव्यवाद प्रकाशित धर्म में ईश्वर द्वारा आदेशित “विधान” पर आधारित नैतिक कर्तव्यवाद से कहीं कम विश्वसनीय है। इसलिए नैतिक कर्तव्य-बोध के कमज़ोर पड़ जाने पर पश्चिमी लोग यह प्रश्न सोचने लगे कि “मनुष्य को क्यों जीना चाहिए?”

यहाँ पश्चिमी लोग जिस पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वह सुख का सिद्धांत है। वे मन पर आधारित “कर्तव्य के सिद्धांत” से अधिक जीवन के “सुख के सिद्धांत” पर ध्यान केंद्रित करने की प्रवृत्ति दिखाने लगते हैं। बेंथम का मानना था कि चूँकि मानव-स्वभाव अंततः सुख खोजता है, इसलिए सुख की खोज से ही नैतिकता नामक लक्ष्य उपजता है। 324 पश्चिम में जीवन का उद्देश्य सुख की खोज में खोजने की लंबी परंपरा है। यह थेल्स और सुकरात से एपिक्यूरस होते हुए आधुनिक काल में बेंथम के उपयोगितावादी नीतिशास्त्र तक आती है। थेल्स ने सुख के महत्त्व पर बल दिया: “सबसे सुखी व्यक्ति वह है जिसका शरीर स्वस्थ, मन समृद्ध और स्वभाव भली-भाँति सधा हुआ हो।” सुकरात मानते थे कि ज्ञान सुख लाता है: “मनुष्य की भूलें अज्ञान से आती हैं। ज्ञान सद्गुण है। सद्गुण सुख है।”

पश्चिमी सभ्यता “प्रत्येक के अपने सुख” की खोज करने वाले व्यक्तिवाद पर आधारित है। पूर्व में भी कभी-कभार व्यक्तिवाद का प्रतिपादन करने वाले हुए। युद्धरत राज्यों के काल में होड़ करने वाले सौ विचार-संप्रदायों में से एक, यांग झू (楊朱) का विचार, पश्चिमी व्यक्तिवाद से बहुत मिलता-जुलता है। उसने सारे कर्म को अपने लिए करने पर केंद्रित किया, और सामाजिक नीति के प्रति उदासीन रहा। केवल अपने लिए जीने वाला “मेरे लिए” (爲我) का सिद्धांत, और मानव-स्वभाव को प्रकृति जैसा बनाया उसी रूप में बनाए रखने वाला “स्वभाव को अखंड रखना और सत्य को सुरक्षित रखना” (全性保眞) का सिद्धांत, यांग झू के विचार का केंद्र हैं। यांग झू के विपरीत मोज़ी (墨子) के विचार का भी युद्धरत राज्यों के काल में बड़ा प्रभाव रहा। मोज़ी ने सार्वभौमिक प्रेम (兼愛) और आक्रमण-निषेध (非攻) का प्रतिपादन किया। उनका बल दूसरों से प्रेम करने पर था, और उनका तर्क था कि किसी भी स्थिति में आक्रमण नहीं करना चाहिए। निरंतर युद्धों वाले युद्धरत राज्यों के काल में मोज़ी का विचार लोकप्रिय हुआ। पर यांग झू और मोज़ी के विचारों में अपनी-अपनी अंतर्दृष्टि होते हुए भी, दोनों एक-एक ओर झुके हुए विचार हैं।

कन्फ़्यूशियस के कन्फ़्यूशियसवादी विचार ने ऐसे संबंधवाद का प्रतिपादन किया जो यांग झू की तरह स्वयं पर बल देने और मोज़ी की तरह दूसरों पर बल देने, दोनों को समेटता है। यह स्वयं और दूसरों को जोड़ने का प्रतिपादन है। कन्फ़्यूशियस के विचार का संबंधवाद यह अवधारणा है कि यदि दूसरे सुखी नहीं, तो कोई अकेला सुखी नहीं हो सकता। अंततः कन्फ़्यूशियस का विचार कन्फ़्यूशियसवाद के रूप में पूर्वी चिंतन का केंद्र बना। चूँकि पूर्वी सभ्यता “हम” के संबंधवाद को महत्त्व देती है, इसलिए वह मनुष्य और किसी परम सत्ता के संबंध को नहीं, बल्कि मनुष्य और मनुष्य के बीच के संबंध को महत्त्व देती है।

जब तुम मनुष्यों की सेवा भी ठीक से नहीं कर पाते, तो आत्माओं की सेवा कैसे करोगे? जब अभी जीवन को ही ठीक से नहीं जानते, तो मृत्यु पर कैसे विचार करोगे? (संवाद 11:12)

कन्फ़्यूशियसवाद जिसे सर्वोच्च नैतिकता मानता है, वह रेन (仁) ठीक मनुष्य-मनुष्य के संबंध पर केंद्रित संबंधवाद की ओर उन्मुख है। केंद्र में धर्म या तत्त्वमीमांसा द्वारा प्रतिपादित “सत्य” नहीं, बल्कि मनुष्य-मनुष्य के संबंध को सर्वोच्च मूल्य मानने वाला “दूसरे भी जिएँ और मैं भी जिऊँ” का संबंधवाद है:

स्वयं स्थापित होना चाहता है, तो दूसरों को भी स्थापित करता है; स्वयं पहुँचना चाहता है, तो दूसरों को भी पहुँचाता है। (संवाद 6:30)

संबंधवाद में सुख भी अकेले अनुभव नहीं किया जा सकता: बात यह है कि दूसरों के साथ मिलकर सुख की भावना, सकारात्मक मनोविज्ञान, का अनुभव किया जाए। इसलिए पूर्व और पश्चिम की सभ्यताओं की तुलना में पश्चिमी व्यक्तिवाद के सामने खड़े पूर्वी दर्शन को कबीलावाद नहीं, संबंधवाद कहा जा सकता है। पर “संबंधवाद” की अवधारणा पश्चिमी दार्शनिक व्यवस्था में प्रयुक्त नहीं होती। इसलिए मानना होगा कि पश्चिमी भाषाओं में पूर्वी संबंधवाद को व्यक्त करने वाली कोई दार्शनिक अवधारणा नहीं है। पश्चिम में महत्त्वपूर्ण वह व्यक्तिवाद है जिसमें धार्मिक सत्य, दार्शनिक सत्य या वैचारिक सत्य मेरे लिए दूसरों के साथ मेरे संबंध से ऊपर होता है। पर पूर्वी संबंधवाद वह दर्शन है जो मनुष्य-मनुष्य के संबंध को महत्त्व देता है, और जिसका अर्थ है दूसरे का ध्यान रखकर अपने हित की रक्षा करना। संबंधवाद का दार्शनिक अर्थ इस सरल सत्य से मेल खाता है: “तुम नहीं, तो मैं नहीं।”

पश्चिमी व्यक्तिवाद में अनुभव किया जाने वाला सुख क्षणिक है। सुख की अनुभूति टिकती नहीं। सुख खोजने वाले जब सुखी नहीं होते, तो स्वयं को दुखी अनुभव करते हैं। समस्या ढाँचे के निर्धारण में है। सुख और दुख बहुत हद तक शून्य-योग का खेल है। पूर्व की तरह जीवन का अर्थ खोजने वाले उसे दूसरों के साथ संबंधों या अध्ययन में मापते हैं। संबंधवाद शून्य-योग के खेल से बाहर है। अर्थ की खोज निरंतर और क्रमिक है; उसमें मात्रा के अंतर होते हैं। चूँकि सुख की खोज शून्य-योग है, इसलिए जो स्वयं को सुखी नहीं बल्कि दुखी अनुभव करते हैं, वे आसानी से नशीले पदार्थों में या बाहर कहीं समस्या का समाधान खोजने लगते हैं। अर्थ खोजने वाले उसे दूसरों के साथ संबंधों या अध्ययन के फलों से मापते हैं, इसलिए अर्थ और फल भीतर से मापे जाते हैं।

पूर्व में मेंशियस या शुनज़ी की नैतिक दृष्टि सुख या एपिक्यूरस के आनंद से दूर है। दाओ की सभ्यता में जन्मे विचारक के रूप में मेंशियस मानते थे कि जीवन का उद्देश्य सुख या आनंद की खोज में नहीं है। पूर्वी सभ्यता के विचारकों का एक ही लक्ष्य था: राजनीतिक नैतिकता की खोज करते हुए “नेताओं (君子)” का अच्छी तरह चयन करना। यह कन्फ़्यूशियसवाद की विशेषता है, एक ऐसा लक्ष्य जो कन्फ़्यूशियस, मेंशियस और शुनज़ी, सबमें साझा था। दाओवाद का मूल उद्देश्य राजनीति में सीधे भाग लेने से बचना और प्रकृति के दाओ में गहरे उतरना है, फिर भी दाओवाद भी मनुष्यों को ज्ञानी (聖人) और जनता में बाँटते हुए ज्ञानी के नेतृत्व को समझाता है।

इस अर्थ में कन्फ़्यूशियसवाद का नेता-सहभागी विभाजन और दाओवाद का ज्ञानी-जनता विभाजन इस बात में मिलते-जुलते हैं कि दोनों अंततः वांछनीय “नेता” की छवि प्रस्तुत करते हैं। अर्थ की खोज करने वाला पूर्वी जीवन संबंधवाद के आधार पर प्रकृति और दूसरों के साथ संबंधों में अर्थ खोजना चाहता है। वह व्यक्तिगत सुख पर नहीं, बल्कि साथ जीने की नैतिकता पर केंद्रित मानववाद पर आधारित होता है। चूँकि इसमें दूसरा और मैं (彼我), दोनों शामिल हैं, इसलिए यह स्वार्थ का त्याग नहीं, बल्कि प्रबुद्ध स्वार्थ, यानी संबंधवाद की अभिव्यक्ति है।

पश्चिम व्यक्तिगत सुख को और पूर्व संबंधमूलक अर्थ की खोज को जीवन का लक्ष्य बनाता है। रेन (仁) “दूसरों का ध्यान रखना” है, यानी करुणावाद (compassionism)। नैतिकता “संबंधमूलक” है: उसे अकेले प्राप्त नहीं किया जा सकता। यदि सुख व्यक्तिवाद पर आधारित है, तो रेन उस संबंधवाद पर आधारित है जो अनिवार्य रूप से दूसरों से जोड़ता है। संबंधवाद दूसरे के प्रति ध्यान को महत्त्व देता है, क्योंकि वह सुख की नहीं, बल्कि जीवन में “अर्थपूर्ण जीवन” या “सार्थक जीवन” (worthiness या worthwhileness) की खोज करता है। क्योंकि यदि पड़ोसी दुखी है, तो व्यक्ति के रूप में मैं अकेला सुखी नहीं हो सकता।

यह दिखाता है कि पूर्वी संबंधवाद पश्चिमी समुदायवाद से भिन्न है। पश्चिमी समुदायवाद व्यक्तिवाद के स्थानापन्न के अर्थ में प्रयुक्त होता है, पर पूर्वी संबंधवाद व्यक्तिवाद को अपने भीतर समेटता है। चूँकि पूर्वी संबंधवाद पश्चिमी व्यक्तिवाद को नकारता नहीं, इस दृष्टि से पूर्वी संबंधवाद को पश्चिमी व्यक्तिवाद और समुदायवाद को मिलाने वाला दर्शन माना जा सकता है।

सुख के प्रति पश्चिमी लोगों का लगाव असाधारण है। क्योंकि सत्ता के दर्शन के आधार पर वे मानते थे कि सुख रुक-रुककर और अस्थायी रूप से नहीं आता, बल्कि शाश्वत सुख संभव है। पूर्व के परिवर्तन के दर्शन के अनुसार सुख की परिभाषा बदल जाती है। सुख महत्त्वपूर्ण है, पर ब्रह्मांड की हर वस्तु की तरह वह भी मनुष्य के पास रुक-रुककर ही आ सकता है और अस्थायी ही हो सकता है। इसलिए पूर्वी चिंतन ने सीमित अवधि वाले “सुख” के महत्त्व को उभारकर नहीं देखा। बल्कि उसने मानवीय मामलों में, परिवार, मित्रों, अध्ययन और प्रकृति में, पाए जाने वाले जीवन के यथार्थ “अर्थ” को महत्त्व दिया।

कन्फ़्यूशियस ने संवाद के “योंग ये” खंड में समझाया: “जानने से अच्छा है प्रेम करना, और प्रेम करने से अच्छा है उसमें आनंद लेना” (अध्याय 18)। जानना (知), प्रेम करना (好) और आनंद लेना (樂) पश्चिम के सुख-सिद्धांत से भिन्न हैं। कन्फ़्यूशियस की व्याख्या उस प्रक्रिया का वर्णन है जिसमें व्यक्ति अपने प्रयास से बोध तक पहुँचता है। इसका अर्थ है कि किसी वस्तु को केवल जानने पर नहीं रुकना चाहिए, बल्कि उससे प्रेम करना और उससे आगे बढ़कर उसमें आनंद ले पाना चाहिए, तभी सच्ची उपलब्धि और बोध तक पहुँचा जा सकता है।

सुख के सिद्धांत का प्रतिपादन करने वाले यूनानी दार्शनिकों में एपिक्यूरस प्रसिद्ध हैं। एपिक्यूरस का सुख-सिद्धांत आनंद है। पर उनका सुख-सिद्धांत गतिशील आनंद नहीं, बल्कि “मन की शांति” (ataraxia) है। उन्होंने प्रतिपादित किया कि इच्छाओं का संयम करके, मित्रता और विश्वास को महत्त्व देकर, प्रज्ञापूर्ण जीवन के द्वारा मन की शांति प्राप्त करके सुख तक पहुँचना चाहिए। सुख के प्रति पश्चिम का यह आग्रह पूर्वी सभ्यता में नहीं है। पश्चिम में यह प्राचीन काल के अरस्तू और एपिक्यूरस से आधुनिक काल के जेरेमी बेंथम और जॉन स्टुअर्ट मिल तक चलता है। आधुनिक काल में सुख के सिद्धांत को मनुष्य और समाज के अस्तित्व का कारण बताया गया। उन्होंने व्यक्ति से आगे बढ़कर पूरे समाज के सुख का प्रतिपादन करते हुए सुख के सूचकांक को राजनीतिक स्तर तक विकसित किया।

प्रकृति ने मानवता को दो प्रभुसत्ता-संपन्न स्वामियों, दुख और सुख, के शासन के अधीन रखा है। हमें क्या करना चाहिए, यह बताना, और हम क्या करेंगे, यह तय करना, केवल उन्हीं का काम है। एक ओर उचित और अनुचित का मानदंड, और दूसरी ओर कारण और परिणाम की शृंखला, उनके सिंहासन से बँधे हैं। हम जो कुछ करते हैं, जो कुछ कहते हैं, जो कुछ सोचते हैं, उन सबमें वे हम पर शासन करते हैं: उनकी अधीनता से मुक्त होने के लिए हम जो भी प्रयास कर सकते हैं, वह उसे सिद्ध और पुष्ट करने का ही काम करेगा। 325

बेंथम (1748-1832) का तर्क था कि नैतिकता उपयोगिता के कारणों से उपजती है। बेंथम का मानना था कि नैतिकता उद्देश्य के अनुसार उपजती है। उपयोगितावादी नीतिशास्त्र का उद्देश्य है कि “नीति अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख है”। मिल (1806-1873) भी उपयोगितावादी थे, पर बेंथम से भिन्नता दिखाते हैं। बेंथम के “मात्रात्मक सुखवाद” के सामने मिल “गुणात्मक सुखवाद” का प्रतिपादन करते हैं: उनका कहना है, “संतुष्ट सूअर होने से असंतुष्ट सुकरात होना बेहतर है।”

वे मानते थे कि न्याय, साहस, निष्ठा और सत्यवादिता जैसे सद्गुण “व्यक्ति” का सुख (या व्यक्तियों को जोड़कर बना उपयोगितावादी सुख) लाते हैं। मानवता, न्याय, रीति और प्रज्ञा जैसे सद्गुण पूर्व में भी महत्त्वपूर्ण हैं। पर पूर्व मानता है कि ये सद्गुण “व्यक्ति” अकेले नहीं खोजता, बल्कि उनकी खोज दूसरों के साथ या प्रकृति और मनुष्य के बीच के “संबंधों” में की जा सकती है। इसलिए पूर्व “व्यक्तिगत सुख” की नहीं, बल्कि “संबंधों के अर्थ की खोज करने वाले मनुष्य” की तलाश करता है। जीवन के अर्थ का आशय है कि मनुष्य प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करे, और मित्रता, परिवार और अध्ययन में दूसरों के साथ सामंजस्य स्थापित करे। पूर्व में जीवन का अर्थ संबंधमूलक (relationalistic) है। जीवन में प्रकृति या दूसरों के साथ होने का अर्थ मिलता है। इसके विपरीत पश्चिमी सुख व्यक्तिगत (individualistic) है। व्यक्ति अकेले सुखी होता है। यूनानियों द्वारा परिभाषित सर्वश्रेष्ठ सुख स्वयं देवताओं की तरह सुखी हो जाना है।

सुख पश्चिमी लोगों के जीवन का लक्ष्य बन गया है। यह अवधारणा पूर्व में भी फैल रही है। लोग सत्य, धन, सम्मान, प्रेम आदि की खोज करते हैं, और उन्हें पा लेने पर उस समय सुख अनुभव करते हैं। पर सुख बहुत हद तक क्षणिक है, और विशेष रूप से व्यक्तिगत। इसीलिए पूर्व सुख को जीवन का उद्देश्य नहीं बनाता। पूर्वी लोग सार्थक, यानी अर्थपूर्ण, जीवन जीना चाहते हैं। बात यह है कि अकेले मैं नहीं, बल्कि दूसरों के साथ होने का अर्थ अनुभव किया जाए। महत्त्वपूर्ण मेरा अपना सुख नहीं, बल्कि यह है कि मुझसे जुड़े लोगों, परिवार, मित्रों, सहकर्मियों, और प्रकृति के साथ मैं कैसे संबंध बनाता हूँ और हमने साथ मिलकर क्या प्राप्त किया। वहीं जीवन की सार्थकता अनुभव होती है। यहीं नैतिकता के महत्त्व पर बल दिया जाता है।

पश्चिम और पूर्व में नशीले पदार्थों की समस्या की स्थिति सुख की खोज की समस्या को उजागर करती है। पश्चिमी लोग कारण क़ानूनों और कार्रवाई के अंतर में, और तस्करी तथा आपूर्ति-तंत्र के अंतर में खोजना चाहते हैं। पश्चिम, विशेष रूप से अमेरिका, समस्या का समाधान नशा करने वाले भीतरी पक्ष में नहीं, जो समस्या की जड़ है, बल्कि बाहर से आने वाली नशीले पदार्थों की “आपूर्ति” में खोजने का प्रयास करता है। पूर्व में क़ानून और कार्रवाई पश्चिम से कमज़ोर हों, या तस्करी और आपूर्ति-तंत्र खुले हों, तब भी नशीले पदार्थों की समस्या पश्चिम की तरह बड़ी नहीं होती। पूर्वी लोग व्यक्तिगत सुख या दुख में नहीं, बल्कि परिवार, मित्रों और अध्ययन में जीवन का अर्थ खोजते हैं। जब इसमें कमी होती है, तो वे पारिवारिक और व्यक्तिगत संबंधों को सुधारने और अध्ययन के फल को बढ़ाने में समाधान खोजते हैं। नशीले पदार्थ इसका स्थान नहीं ले सकते। पूर्व और पश्चिम को अलग करने वाली चिंतन-व्यवस्थाओं में व्यक्तिवाद और संबंधवाद नामक दार्शनिक व्यवस्थाओं का यह अंतर भी है।

टिप्पणियाँ

  1. 303

    Isaiah Berlin, Karl Marx, Shin Bok-ryong द्वारा कोरियाई अनुवाद, Kal Mareukeuseu (कार्ल मार्क्स), Pyeongminsa, 1982, पृ. 284।

    ↩
  2. 304

    Thomas Hobbes, Leviathan (Mobile Reference) 1,307, Kindle Edition:

    “ऐसी अवस्था में उद्योग के लिए कोई स्थान नहीं होता, क्योंकि उसका फल अनिश्चित होता है; इसलिए न भूमि की खेती होती है; न नौवहन, न समुद्र के रास्ते आयात की जा सकने वाली वस्तुओं का उपयोग; न सुविधाजनक भवन; न बहुत बल माँगने वाली चीज़ों को हिलाने और ढोने के उपकरण; न पृथ्वी के धरातल का ज्ञान; न समय की गणना; न कलाएँ; न साहित्य; न समाज; और सबसे बुरा, निरंतर भय और हिंसक मृत्यु का संकट; और मनुष्य का जीवन एकाकी, दरिद्र, घिनौना, पाशविक और अल्पकालिक होता है।”

    ↩
  3. 305

    John Locke, Works of John Locke: Including Two Treatises of Government, An Essay Concerning Human Understanding and More (2008), 15,037–38, Kindle Edition.

    ↩
  4. 306
  5. 307
  6. 308

    Mancur Olson, Power and Prosperity; Outgrowing Communist and Capitalist Dictatorships, Basic Books, 2000, p7

    ↩
  7. 309

    Mancur Olson, “Dictatorship, Democracy, and Development,” The American Political Science Review 87 (Sept. 1993): 568.

    ↩
  8. 310

    Mancur Olson, Dictatorship, Democracy, and Development, American Political Science Review Vol. 87, No. 3 September 1993

    http://www.svt.ntnu.no/iss/Indra.de.Soysa/POL3503H05/olson.pdf

    ↩
  9. 311

    Mancur Olson, “Dictatorship, Democracy, and Development,” The American Political Science Review 87 (Sept. 1993), पृ. 574–575।

    ↩
  10. 312

    कबीलावाद पश्चिमी लोकतांत्रिक बाज़ार-अर्थव्यवस्था के लिए कैसे ख़तरा है, इसकी व्याख्या अध्याय 3, खंड 2–3 में की गई है।

    ↩
  11. 313

    सभी पश्चिमी देशों में अमीर-ग़रीब की खाई तेज़ी से बढ़ रही है। यदि यह जारी रहा, तो कुछ दशकों में सभी पश्चिमी सरकारें ऋण से हाँफती, शक्तिहीन सरकारें बनकर रह जाएँगी। दलों और व्यापार का गठजोड़ उस स्वार्थ को बढ़ावा देने से, अर्थात लोभ से, उपजता है जो हम सबके साझे मानव-स्वभाव में है। लोकतंत्र भी इसी तर्क के वश में है। दल को चुनकर जिताने वाले साधारण निवासी हैं। पर निवासी मितव्ययिता माँगने वाले दल के बजाय सरकारी ऋण से अनुदान बाँटने वाले दल को पसंद करने की प्रवृत्ति रखते हैं। अंततः लोकतंत्र का सिद्धांत भी मानव-स्वभाव के अनुसार सफल या विफल होता है। लोकतंत्र नामक संस्था वैधता के साथ मानव समाज पर शासन नहीं करती; मानव समाज पर आत्म-रक्षा का सिद्धांत शासन करता है। यह स्थिति दिखाती है कि मानव-स्वभाव का वह सिद्धांत, जिसके अनुसार सहज वृत्ति प्रकाश का स्रोत है और बुद्धि दर्पण, सामाजिक अनुबंध के सिद्धांत या तत्त्वमीमांसीय आदर्शों के आधारभूत मानव-स्वभाव के सिद्धांतों से अधिक यथार्थवादी है।

    ↩
  12. 314

    संश्लेषणवाद, मिश्रणवाद, समन्वयवाद और पूरकतावाद, सबको अंग्रेज़ी में syncretism कहा जा सकता है। पूरकता पश्चिमी सभ्यता में कठिनाई से मिलती है, पर पूर्वी सभ्यता का केंद्रीय तत्त्व है। धर्म के संदर्भ में कोरियाई में आमतौर पर जेसोल जोंगहाप-जुई (諸說綜合主義, सब मतों का संश्लेषणवाद) अनुवाद प्रयुक्त होता है। पर इस पुस्तक में सभी विचारधाराओं के उपयोग के लिए मैं समन्वयवाद (融合主義) शब्द का, और मानव-स्वभाव में सहज वृत्ति और मन के संयुक्त उपयोग के लिए पूरकता (補完論) शब्द का प्रयोग करता हूँ।

    ↩
  13. 315

    Bertrand Russell, Human Society in Ethics and Politics, Kim Tae-gil (金泰吉) द्वारा कोरियाई अनुवाद, Ingan sahoe jilseoron (मानव समाज की व्यवस्था का सिद्धांत), Bakyoungsa, पृ. 9।

    ↩
  14. 316

    Noyes और Kolb, पूर्वोक्त, पृ. 14।

    ↩
  15. 317

    Fritjof Capra, The Tao of Physics, पूर्वोक्त, पृ. 55।

    ↩
  16. 318

    Carl Sagan, Cosmos, पूर्वोक्त, पृ. 216।

    ↩
  17. 319

    Carl Friedrich von Weizsäcker, पूर्वोक्त, पृ. 216।

    ↩
  18. 320

    सहज वृत्ति को प्रकाश का स्रोत और मन को दर्पण मानने वाला पूर्व का मानव-स्वभाव का सिद्धांत कुछ बातों में पश्चिम के अस्तित्ववाद के मानव-स्वभाव के सिद्धांत से मिलता है, पर उससे भिन्न है। इनमें समानताएँ भी हैं और अंतर भी। पूर्व के मानव-स्वभाव के सिद्धांत में मन सहज वृत्ति की सीमाओं के भीतर अपनी भूमिका निभाता है। इस बात में कि मन के चुनाव से बचा नहीं जा सकता, यह अस्तित्ववाद की इस दृष्टि से मिलता है कि मनुष्य “स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त” है। पर यह उस अस्तित्ववादी दर्शन से भिन्न है जिसके लिए अस्तित्व सार से अधिक महत्त्वपूर्ण है। पश्चिम का पारंपरिक दर्शन पहले मनुष्य के सार को परिभाषित करना चाहता था, पर अस्तित्ववाद “अस्तित्व सार से पहले आता है” की प्रस्थापना पर बल देते हुए मानव-स्वभाव का ऐसा सिद्धांत रखता है जिसमें मनुष्य जन्म से कोई तय सार लेकर नहीं आता, बल्कि अपने चुनावों और कर्मों से अपना सार गढ़ने वाला प्राणी है। यही पूर्व के मानव-स्वभाव के सिद्धांत से अंतर है। पूर्व के मानव-स्वभाव के सिद्धांत का केंद्र यह है कि सार और अस्तित्व जुड़े हुए हैं, इसलिए अस्तित्व (मन) सार (सहज वृत्ति) की सीमाओं के भीतर काम करता है।

    ↩
  19. 321

    Noyes और Kolb, पूर्वोक्त, पृ. 15।

    ↩
  20. 322

    चीन के युद्धरत राज्यों के काल में पश्चिमी धर्म की अच्छाई और बुराई की अवधारणा पूर्व में अभी नहीं आई थी। मेंशियस के शुभ-स्वभाव सिद्धांत का सही पाठ यह नहीं कि मानव-स्वभाव बुराई के विपरीत अच्छाई के अर्थ में शुभ है, बल्कि यह कि वह भला, सदय है। यदि पश्चिम की अच्छाई और बुराई की अवधारणा लाकर अच्छाई को बुराई का निरपेक्ष विपरीत मानकर विश्लेषण शुरू करें, तो मेंशियस के विचार को ग़लत पढ़ेंगे। शुनज़ी के अशुभ-स्वभाव सिद्धांत के साथ भी ऐसा ही है। 惡 अक्षर के दो पाठ हैं: è (कोरियाई में अक, बुराई) और wù (कोरियाई में ओ, घृणा करना)। शुनज़ी की मानव-स्वभाव की व्याख्या 性惡說 को “स्वभाव अशुभ है” के बजाय “स्वभाव वह है जिससे घृणा की जाए” पढ़ना तर्कसंगत लगता है। पर हम शुनज़ी के “मानव-स्वभाव अशुभ है” वाले पाठ के बहुत अभ्यस्त हैं। इसलिए मैं वही अभिव्यक्ति बनाए रखता हूँ।

    ↩
  21. 323

    ईश्वर द्वारा रचे गए मनुष्य का प्रयोजन स्पष्ट और “कर्म” निश्चित होना चाहिए: अर्थात कर्म (यू वेई) को महत्त्व दिया जाता है। अव्यक्त दाओ में विश्वास करने वाली सभ्यता अकर्म (वू वेई) को महत्त्व देती है। अकर्म का शाब्दिक अर्थ “कर्म का अभाव” है, पर उसका आशय उचित समय पर गति, अर्थात “करते हुए भी न करना” (爲無爲), है।

    ↩
  22. 324

    नैतिकता का स्रोत खोजने के पश्चिमी प्रयास में पुनरुत्थान और अतिमानव के सिद्धांत भी आते हैं। दोस्तोयेव्स्की ने पुनरुत्थान (resurrection) के सिद्धांत का प्रतिपादन किया: ईश्वर को मरना नहीं चाहिए, इसलिए उसे फिर जन्म लेना होगा। नीत्शे ने अतिमानव (Übermensch) के सिद्धांत का प्रतिपादन किया: मनुष्य को नैतिक रूप से प्रकाशित धर्म के ईश्वर का स्थान लेना चाहिए। पर विचारधाराओं के युग की विफलता के बाद अतिमानव का सिद्धांत लगभग मिट गया। पुनरुत्थान का सिद्धांत, विशेषकर पारंपरिक प्रकाशित धर्म के प्रभाव के कारण, जीवित है।

    ↩
  23. 325

    Jeremy Bentham, An Introduction to the Principles of Morals and Legislation (White Dog Publishing, 2010), Kindle edition, locations 236–240.

    ↩